Monday, 31 December 2018

1 जनवरी ईश माता का पर्व 2019 Hindi Reflections from Atma ki Talwar

l1 जनवरी ईश माता का पर्व
2019

आज हम नये साल की शुरूआत ईष माता मरियम के पर्व के साथ करते हैं। मा मरियम कृपाओं से भरपूर की गयी थी। उनको प्राप्त सब कृपाओं में ईष्वर की माता बनना सबसे श्रेष्ठ था। मरियम की महानता इसमें है कि उनके हाँ कहने पर हमारी मुक्ति का द्वार खुल गया। उन्होंने कहा ‘‘देख, मैं प्रभु की दासी हूँ तेरा कथन मुझमें पूरा हो जाए’’ और उसी क्षण शब्द ने उनके गर्भ में देहधारण किया; उसी क्षण ईष्वर का शब्द उनके गर्भ में शरीर धारण कर मनुष्य बन गया। इस प्रकार मरियम ईष्वर की माता बन गई; हमारे मुक्तिदाता की माता बन गई और हमारी मुक्ति में एक महान सहायक बन गई।

ईष-माता का समारोह यद्यपि कलीसिया के आरम्भ से  मनाया जाता रहा है किंतु इसे हमारे काथलिक धर्मसिद्धांत के रूप में मान्यता एफेसुस की परिषद में सन् 431 में दिया गया। हम संत योहन के सुसमाचार में पढते हैं कि - ‘‘आदि में शब्द था, शब्द ईष्वर के साथ था और शब्द स्वयं ईष्वर था। उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ........।(और उसी) शब्द ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया।’’ (योहन 1:14 )याने प्रभु येसु, पिता के एकलौते पुत्र अनादि वचन है जो आदि में पिता के साथ विद्यमान था, जिसे ‘‘समय पूरा हो जाने पर ईष्वर ने इस संसार में भेजा। वह एक नारी से उत्पन्न हुआ और संहिता के अधीन रहा, जिससे वह संहिता के अधीन रहने वालों को छुडा सकें और हम ईष्वर के दत्तक पुत्र-पुत्रियां बन जाये’’ ( गला 4:4-5) इसका मतलब ये हुआ कि प्रभु येसु स्वयं ईष्वर थे जो अनन्तकाल से विद्यमान है। तथा मानव मुक्ति के लिए वे स्वयं एक मनुष्य बन गये। मनुष्य बनने के लिए ईष्वर ने एक कुँवारी को अपने बेटे की माँ बनने के लिए चुना। इसलिए माँ मरियम ईष्वर की माँ है। उनके शरीर में रहकर ईष्वर जो अदृष्य थे; जिसका शरीर नहीं था एक शरीर धारण करते हैं। यही कलीसिया का विष्वास है; यही पवित्र बाईबल हमें सिखलाती है।  परन्तु कई विश्वासी भाई बहनें मरियम को ईश् माता के रूप में समुचित आदर सम्मान नहीं देते। एक बार एक कैथोलिक भाई किसी नयी जगह पर गया। वहां सन्डे को प्रार्थना के लिए चर्च ढ़ुढ़ते-ढुंढ़ते एक चर्च गया। उनसे प्रार्थना का समय पूछा। वे अंदर गए और उन्होंने उस चर्च के पास्टर से पूछा कि आपके चर्च में माता मरियम के लिए कोई जगह नहीं है क्या। वे बोले जी नहीं। हम मरियम को कोई जगह नहीं देते। तो कैथोलिक भाई बोला- जहाँ प्रभु की माँ के लिए जगह नहीं वहाँ मेरे लिए भी जगह नहीं। इस पर उस कलीसिया के व्यक्ति ने उसे समझाते हुए कहा- देखो हम ये तो मानते हैं कि मरियम येसु की माँ है। पर येसु को जन्म देने के बाद उनका रोल या फिर उनकी भूमिका खत्म हो जाती है। जैसे चूजा निकलने के बाद अंडे के छिलके का क्या कोई महत्व नहीं वैसे ही येसु के जन्म के बाद मरियम का कोई महत्व तो नहीं रह जाता। ईश्वर  की योजना में मुक्तिदाता को जन्म देने लिए एक नारी का होना था। और वह योजना  मसीह के जन्म के साथ पुरी हो जाती है। उसके बाद मसीह का काम शुरू होता है।

क्या यह तर्क सही है?  क्या मरयम महज एक अंडे का छिलका है? क्या परम् पिता ईश्वर की निगाह में यह नारी बस एक अंडे के छिलके के बराबर है? क्या ईश्वर के आदेश पर ही गेब्रियल दूत मरियम को प्रणाम नहीं करता? (लूक 1,28); क्या एलिज़ाबेथ पवित्र आत्मा से भरकर यह नहीं कहती - आप नारियों में धन्य है, और धन्य है आपके गर्भ का फल। मुझे यह सौभाग्य कैसे मिला कि मेरे प्रभु की माँ मुझसे मिलने आयी? क्या वास्तव में उनका रोल जन्म के बाद ख़त्म हो जाता है। तो फिर जन्म के बाद हेरोद जब शिशु येसु को मारना चाह रहा था तब कौन योसेफ के साथ बालक को मिस्र देश लेकर भागती हैं? संत लुकस के अनुसार कौन येसु को मन्दिर में समर्पित करती है? (लूक 2,22-23) कौन तीन दिन तक येसु को खोजते हुए येरूसलम मन्दिर तक जाती है?(लूक 2,48); कौन येसु की सेवकाई के समय उनसे मिलने जाती थी? (मत्ती 12,46-50); किसके कहने पर येसु ने काना के विवाह में अपना पहला चमत्कार दिखाया?(योहन 2,1-12); कौन क्रूस ढोते येसु के साथ-साथ चली? और कौन कलवारी पहाड़ी पर क्रूस के नीचे बेटे येसु के साथ खड़ी रही(19,25) और वो कौन थी जिसे येसु ने क्रूस से योहन को अपनी माता के रूप में दे दिया? (योहन 19,27)। प्रभु के स्वर्गारोहण के बाद कौन शिष्यों को एक साथ लेकर पवित्रात्मा के अभिषेक के लिए तैयार करती है? (प्रे.च. 1,12-14)।

अब बताईये क्या येसु के जन्म के बाद मरियम की भूमिका ख़त्म हो जाती है? कोई कितना भी विरोध कर ले, कितने भी तर्क लगाले, पर मरियम का आदर व सम्मान हर विश्वासी को करना चाहिए। क्योंकि वह येसु (ईश्वर )की माँ है। और क्योंकि पवित्र बाइबिल में भी उन्हें सम्मान का दर्ज़ा मिला है।
ईश माता होने के साथ ही साथ वो हम सब की, सारी कलीसिया की माँ है।  क्योंकि स्वयं येसु ने क्रूस पर से उन्हें हमारी माता के रूप में हमें सौंपा है। हम संत योहन के सुसमाचार में पढते हैं येसु संत योहन से कहते हैं - ‘‘यह तुम्हारी माता है’’ और माँ मरियम से कहते हैं - ‘‘यह आपका पुत्र है’’ (यो 19ः27)। और वचन आगे कहता है उस समय से उस शिष्य ने अपने यहाँ उसे आश्रय दिया।’’ संत योहन ने क्या किया? तब से माँ मरियम को अपने घर में जगह दी। अपनी ही माँ के रूप में, अपने ही परिवार के एक सदस्य के रूप में। हम सब यदि यसु की माँ को अपनी माता मानते हैं, स्वीकरते हैं तो हमें भी उन्हें अपने घरों में ले जाना होगा। माता मरियम को हमारे परिवारों में जगह देना होगा; हमारे परिवार के ही एक सदस्य के रूप में माँ को स्वीकार करना होगा। क्योंकि उनके पुत्र की यही आखिरी ख्वाहीश थी अपनी माँ को लेकर कि उसका हर अनुयायी उनकी माँ को अपनी माँ समझे व उसे अपने घर ले जाये। उसने अपनी माँ को हमें इसलिए दे दिया कि वह हमारे साथ रहकर हमारी ज़रूरतों में हमारे लिए प्रार्थना करती रहे। वह हमारी परिवार में रहकर हमारे परिवारों को नाज़रेथ के पवित्र परिवार की तरह एक पवित्र व आदर्श परिवार बनानें में हमारी मदद करे। हमें धर्म मार्ग पर चलाये व शैतान के प्रलोभनों से हमारी रक्षा करे क्योंकि ईष्वर ने शैतान की सारी शक्तियों को माँ मररियम के पैरों तले डाल दिया है।
ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों प्रभु येसु द्वारा हमें प्रद्त इस अमुल्य उपहार को हम हमारे घरों में, हमारे परिवारों में कैसे रख सकते हैं। मैं सोचता हूँ पवित्र रोज़री माला से उत्तम और कोई साधन नहीं जिसके द्वारा हम माँ मरियम को अपने घरों में बुला सकते हैं उनका आह्वान कर सकते हैं, उनसे प्रार्थना की अरज कर सकते हैं। जिस घर में रोज़री माला विनती होती है माँ मरियम उस घर में रहती है, उस घर का, उस परिवार का एक अभिन्न अंग बनकर। उनकी प्रार्थनायें माँ प्रभु तक जल्दि पहुँचा देती है।

आईये हम माँ मरियम को अपने घरों में जगह दें, रोज उनका स्मरण करें, वो ईष्वर की माता व हम सब की माता है।
आमेन।

May you have a year filled with mighty anointing of the Spirit of God who came upon Mary to make her the Mother of God.
Happy New Year to all.

Saturday, 15 December 2018

आगमन का तीसरा रविवार 16 दिसम्बर 2018


सफनिया ३ः१४-१८
फिल ४ः४-७
लुक ३ः१०-१८
आगमन का तीसरा रविवार आनंद के विषय पर ज़ोर देता है। यह आनन्द का रविवार कहलाता है।
इंसान जब तक इस संसार में है, खुशी तलाशता है। हम बीमार होने पर इलाज़ करवाते हैं, चोट लगने पर मरहम लगाते हैं। क्योंकि हम जीवन में दुःख और दर्द नहीं चाहते। ख़ुशी चाहते हैं। खुशी और आनंद के लिये इंसान क्या क्या नहीं करता। पर सच्ची ख़ुशी हर किसी के नसीब नहीं होती। क्योंकि यह कोई पैसे से मिलने वाली चीज़ नहीं है। खुशियाँ कभी  किसी अरबपति के घर से नदारद तो किसी कंगाल के घर में भरपूर होती है।
क्योंकि आनंद ईश्वर का दिया उपहार है। पवित्र आत्मा का दिया फल है। गलतियों 5,22 में हम पढ़ते हैं आत्मा का फल है प्रेम, आनन्द शांति आदि। इसलिए यदि कोई इस संसार में सच्ची खुशी और आनंद चाहता है तो संत पौलुस आज हमसे कहते हैं आनंद मनाईये, प्रभु में सदा आनंद मनाईये। खुश या आनन्दित रहने के लिए यूँ तो इंसान कई जतन करता है पर वास्तिवक ख़ुशी मिलती नहीं। न पैसा, ना दौलत, न शौहरत, ना पार्टी, और न ही दोस्ती सच्ची ख़ुशी दे सकते है। जब तक हम प्रभु में अपनी ख़ुशी नहीं तलाशते हम अधूरे ही रहेंगे। इस लिए सन्त पौलुस कहते हैं - प्रभु में आनंन्द मनाइये। हमारी खुशियाँ उन्हीं में परिपूर्ण हो सकती है। सन्त योहन 15, 11 में प्रभू अपने शिष्यों से कहते हैं मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा कि तुम मेरे आनंद के भागिदार बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो। जब तक हम प्रभु के आंनद के भागीदार नहीं बनते हमारी ख़ुशी हमारा आनंद अधूरा है।
प्रभु के आनंद को हमारे जीवन में अनुभव करने के लिये हमें प्रभु येसु जैसा हृदय चाहिए। क्योंकि "कोई भी पुरानी मशकों में नई अंगूरी नहीं भरता।" (सन्त मारकुस 2,22) नयी अंगूरी के लिए नयी मशकें चाहिए। प्रभु के आनंद के लिए, उसके  काबिल एक दिल चाहिए।
मनुष्यों के जीवन से उनकी खुशियाँ चुराने वाला शैतान है। और हमारे पाप हमारे जीवन में सच्ची ख़ुशी पाने में एक बाधा।

इसलिए ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों, जब सारी मानवता पाप, दुःख व कष्टों में कराह उठी थी। जब शैतान ने इंसान से सच्चे आनंद व् ख़ुशी को छीन लिया था  तब प्रभु येसु, ‘अनादि शब्द’ व ‘पिता के एकलौते पुत्र,‘ ने इस धरा पर इन्सान बनकर, एक गरीब गौशाला में कुँवारी मरियम से जन्म लिया। रोमियों को लिखे अपने पत्र अध्याय 3:23-24 में प्रभु का वचन हमसे कहता हैं - ‘‘क्योंकि सबों ने पाप किया और सब ईष्वर की महिमा से वंचित किये गये।’’ पिता ईष्वर  ने इंसान को अपने ही प्रतिरूप बनाया; उसे ईष्वर की महिमा का भागीदार बनाया; ईश्वर ने इंसान को अपने आनंद का भागीदार बनाया था। पर पाप ने उस आनंद से हमें वंचित कर दिया। उस महिमा को अथवा उस प्रभु को पुनः पाने के लिए सन्त योहन बपतिस्ता आज के सुसमाचार में कहते हैं - ‘‘जिनके पास दो कुरते हों, वह एक उसे दे दे, जिसके पास नहीं है और जिसके पास भोजन है वह भी ऐसा ही करे।’’ वे नाकेदारों से कहते हैं ‘‘जितना तुम्हारे लिये नियत है उससे अधिक न लो’’ याने बेईमानी से लोगों को मत ठगो; व सैनिकों से कहते हैं  -‘‘किसी पर अत्याचार मत करो व झूठा दोष मत लगाओ।’’ हम भी जब उसी प्रभु के हमारी जिंदगी में आने की राह देख रहे हैं तो प्रभु का वचन हमसे भी यही कहते हैं कि जरूरत से ज्यादा अपने पास मत रखो, उसे गरीबों को दे दो। वचन तो कहता है कि यदि तुम्हारे पास दो कुरते हों तो एक उसको दे दो जिसके पास कुुछ भी नहीं है। एक दे देने के बाद भी तुम्हारे पास कम से कम एक और है परन्तु उस गरीब भीखारी, गरीब बच्चे के पास तो कुछ भी नहीं है, वो नंगा घूम रहा है, वो फटेहाल है। हम सब ने रेलवे स्टेशन व गलियों में अर्धनग्न अवस्था में घुमते इंसानों को देखा है। और हमने उनको कुछ देने की जगह उन्हें भला-बूरा भी कहा है। जब हमारे पास किसी गरीब ने आकर हाथ फैलाया तो हमने उससे अपनी नज़रें दूसरी तरफ फेरीं है। जहाँ नाम, सम्मान और पहचान मिलती है वहाँ हम दान-पुण्य तो करते ही हैं परन्तु प्रभु आज हमसे कहते हैं कि रात के अंधेरे में जाकर फूटपाथ पर पडे ठिठूरते हुवे किसी अभागे को एक कंबल ओढा दो।, रोटी के एक निवाले के लिए तरसते किसी गरीब को कुछ खाने को दे दो, वहाँ आपकी तारिफ करने वाला शायद कोई नहीं होगा परन्तु ‘‘तुम्हारा पिता जो सब कुछ देखता हे तुम्हें पुरस्कार देगा’’ (मत्ती 6ः4),  वह हमसे कहेगा - ‘‘जब मैं भूखा था तब तुमने मुझे खिलाया; प्यासा था तब क्या तुमने मुझे खिलाया; नंगा था तब तुमने मुझे पहनाया; और जब मैं बंदी, बिमार व परदेषी था तो  तुम मुझसे मिलने आये‘‘ इसलिये आकर उस अंनंत आनंद के स्थान में प्रवेश करो जो संसार के प्राम्भ से तुम्हारे लिए तैयार किया गया है। (मत्ती 25:35-36)। कुछ त्यागने, और दूसरों को देने में जो आनंद मिलता है वह इक्कठा करने, जमा कर करके खज़ाना भरने व सिर्फ अपनी जेब व् पेट का ख्याल रखने में नहीं मिलता।
मुक्ति प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग प्रेममय सेवा ही है। पवित्र काथलिक कलीसिया की धर्मषिक्षा में हम दया के कार्यों के बारे में सिखते हैं। ये दया के कार्य, प्रेममय सेवा के कार्य हैं जिनके द्वारा हम हमारे पडोसियों की शारीरिक व आध्यात्मिक ज़रूरतों में मदद करते हैं। भ्रमितों का मार्गदर्शन करना, अज्ञानियों को षिक्षा देना, पापियों को सचेत करना, पीडितों को सांत्वना देना, अपराधियों को क्षमा करना, धैर्य के साथ अन्याय को सहन करना व मृतकों व जीवितों के लिए प्रार्थना करना ये सब दया के आध्यात्मिक कार्य हैं। तथा भूखों को खिलाना, प्यासों को पिलाना, वस्त्रहीन को पहनाना, बेघरों को आश्रय देना, बिमारों की सेवा करना, उनसे मिलने जाना, कैदियों से मिलने जाना, व मुर्दाें को दफनाना ये सब दया के शारीरिक कार्य हैं। इन सब में गरीबों को दान देना किसी के प्रति दया दिखाने का सबसे उत्तम कार्य है; यह न केवल सेवा का परन्तु न्याय का कार्य भी है। (कैथोलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा,2447)
मदर तेरेसा कहती हैं कि एक बार वो ऐसे हिंदू परिवार से मिली जिसने कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया था। मदर ने उन्हें थोडा चावल दिया। उस परिवार की माँ ने जो किया उसे देखकर मदर स्तब्ध रह गयी। उसने उस चावल को दो हिस्सों में बाँट दिया व उसका आधा हिस्सा लेकर वह अपने मुसलिम पडोसी के घर गई और उन्हें दे दिया। यह देखकर मदर ने उससे पुछा यह क्या किया तुमने अब तुम्हारे परिवार के लिए कितना बचा है? क्या इतना आप लोगों के लिए पर्याप्त होगा?’’ इस पर उस औरत ने जवाब दिया - ‘‘लेकिन उन लोगों ने भी तो कई दिनों से कुछ भी नहीं खाया है।’’ इसे कहते हैं शेयरिंग एंड कैरिन्ग या मिल-बाँट कर खाना। हमें सारे संसार की समस्याओं को समाप्त करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए हम व्यक्तिगत रूप से पूरी दुनिया की गरीब तो मिटा नहीं पायेंगे। एक बार किसी ने मदर तेरेेसा से व्यंग्यात्मक रूप से पुछा कि संसार में इतने सारे भूखे लोग हैं उन सबको वह कैसे खिलाइगी। इस पर मदर ने शाँतभाव से कहा -‘‘एक-एक करके’’। जि हाँ हम कमसे कम जब भी हमें किसी एक भी गरीब की मदद करने का अवसर मिलता है तो हमें ज़रूर उसकी मदद करना चाहिए। मदर तेरेसा ने प्रभु की दया व करूणा को वस्त्र की तरह धारण कर लिया था। वह इस दुनिया में प्रभु की दया का एक जीवन्त उदाहरण थी, तथा हम सब ख्रीस्तीयों के लिए एक आदर्ष भी। हम जहाँ गरीब, गंदे व मटमेले बच्चों से कतरा कर निकल जाते हैं वहीं मदर ने ऐसे बच्चों को उठाकर गले से लगा लिया व उन्हें प्रेम  से चूम लिया; किसी का सडा हुआ घाव देखकर हम आँखें फेर लेते हैं, व बदबू से नाँक बंद कर लेते हैं, पर वहीं मदर ने अपने हाथों से ऐसे घावों को धोया व उनकी मरहम पट्टी की।
 आज का सुसमाचार भी दया के कार्य करने को हमें सिखलाता तो आईये इस बार हम ‘दया का क्रिसमस मनायें।’ हर ख्रीस्त जंयति हम हमारी ही खुशी के लिए मनाते हैं, आईये इस बार हम इस दूसरों की खुशी के लिए ख्रीस्तजंयति मनायें। हर क्रिसमस पर हम हमारे लिए नये ब्रांडेड कपडे ज़रूर खरीदते हैं तो इसके साथ ही, आईये हम किसी गरीब नंगे तन को भी ढँक दें; हर क्रिसमस पर हमारे घरों में तरह-तरह के पकवान जरूर बनते हैं व सपरिपवार हम इसका लुफ्त उठाते हैं तो आईये इस बार हम हमारे पकवान गरीबों के भी साथ बाँटे। ख्रीस्त जंयति की खशी को हम अपने ही घर की दिवारों तक सीमित न रखें। किसी मुरझााये, दुखित चेहरे को मुस्कुराहट प्रदान करें; किसी बुझते चिराग को प्रभु की ज्योति से पुनः आलोकित करें। इससे हमें जो आनन्द व आध्यात्मिक लाभ होगा शायद वह क्रिसमस को अपने घरों की चार दिवारों में मनाने से नहीं मिलेगा।

आमेन

Friday, 7 December 2018

आगमन का दूसरा रविवार 9 दिसम्बर 2018 रविवारीय प्रभु वचनो पर मनन


बारूक 5ः1-9
फिलि. 1ः4-6,8-11
लुक 3ः1-6
इस्राएली लोग ईष्वर की चुनी हुई प्रजा थी। ईष्वर ने उन्हें सभी राष्ट्रों व देषों में से अपनी निजी प्रजा के रूप में चुन लिया था। वे नबियों के द्वारा उनसे कहते हैं - ‘‘चाहे पहाड टल जाये और पहाडियाँ डाँवाडोल हो जायें किंतु तेरे प्रति मेरा प्रेम नहीं टलेगा और तेरे लिए मेरा शाँति विधान नहीं डाँवाडोल होगा’’ (इसा. 42ः6)। ‘‘तुम मेेरी दृष्टी में मुल्यवान हो और महत्व रखते हो और मैं तुम्हें प्यार करता हूँ’’ (इसा. 43ः4)। ‘‘क्या स्त्री अपना दूधमुहा बच्चा भुला सकती है? कया वह अपनी गोद के पुत्र पर तरस नहीं खायेगी? यदि वह भुला भी दे, तो भी मैं तुम्हें कभी नहीं भुलाऊँगा’’ (इसा. 49ः15)। ऐसा अटल व घनिष्ट प्रेम था यहोवा का अपनी प्रजा के प्रति।
लेकिन इस्राएली प्रजा एक धोखेबाज प्रजा निकली। दूसरा इतिहास ग्रंथ 36ः14 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘याजकों के नेताओं और जनता में भी बहुत अधिक अधर्म फैल गया, क्योंकि उन्होेंने गैर-यहूदी राष्ट्रों के घृणित कार्यों का अनुकरण किया और प्रभु द्वारा प्रतिष्ठित येरूसालेम मंदिर को अपवित्र कर दिया।’’उन्होंने अपने प्रेमी ईष्वर को भूला कर देवी-देवताओं की पूजा की। उन्होंने उस प्रेमी पिता के प्यार को ठुकरा दिया। उन्होंने ईष्वर से बेवफाई की। उन्होंने वो सारे चिन्ह और चमत्कार भूला दिये जिसे ईष्वर ने उनकी आँखों के सामने किये थे। वचन आगे कहता है कि कई नबियों ने उन्हें बार-बार चेतावनी दी कि पाप व बुराई के जिस मार्ग पर तुम चल रहे हो वह सही नहीं है; ईष्वर के धार्मिकता के मार्ग से भटक कर शैतान के मार्ग पर तुम्हारा जाना सही नहीं है। यह ईष्वर को कतई पसन्द नहीं है। तुम लौटकर वापस आ जाओ। अपना कुमार्ग त्यागकर अपने प्रेमी पिता के पास वापस आ जाओ। पर इस्राएलियों ने नबियों की बातों पर ध्यान नहीं दिया। उल्टे उन पर अत्याचार किये व कईयों को मार डाला। तब ईष्वर जो कि अब तक अपनी प्रजा के साथ था; युद्ध के समय उनकी तरफ से लडता था; शत्रुओं से उनकी रक्षा करता था; उन्हें उनसे भी अधिक शक्तिषाली राजाओं के विरूद्ध विजय दिलाता था; अब इन्हें त्याग देता है। प्रभु ने अपनी चुनी हुई प्रजा को अपने ही भाग्य पर छोड दिया। इसके विषय में प्रभु का वचन इतिहास ग्रंथ 36ः15 में कहता है - ‘‘प्रभु उनके पूवर्जाें का ईष्वर उनके पास अपने दूतों को निरन्तर भेजता रहा; कयोंकि उसे अपने मंदिर तथा अपनी प्रजा पर तरस आता था। किंतु उन्होंने ईष्वर के दूतों का उपहास किया, उसके उपदेषों का तिरस्कार किया और उसके नबियों की हँसी उडाई। अंत में ईष्वर का क्रोध अपनी प्रजा पर फूट पडा और उसे बचने का कोई उपाय नहीं रहा।’’
तब खल्दैयियों के राजा ने उन पर आक्रमण किया; उनकी आस्था व धार्मिकता के प्रतीक येरूसालेम मंदिर को तहस-नहस कर दिया; ईष्वर के मंदिर को सुपूर्दे खाक कर दिया। सारे देश को उजाड दिया; कईयों का वध कर दिया; व बाकि लोगों को बंदी बनाकर बाबुल देश उनकी गुलामी करने ले जाया गया। वहाँ करीब पचास साल तक वे बाबुल के निर्वासन में रहे; उनकी गुलामी करते रहे। वहाँ से इन्होंने प्रभु को पुकारा, इन्होंने अपने किये पर पश्चताप किया; इन्होंने प्रभु को अपनी दुर्दषा में पुकारा और प्रभु ने उनकी सुध ली। क्योंकि स्तोत्र 103ः 10-12 में वचन कहता है ‘‘प्रभु दया और अनुकम्पा से परिपूर्ण है; वह सहनषील और अत्यंत प्रेममय है; वह सदा दोष नहीं देता और चिरकाल तक क्रोध नहीं करता।’’ और प्रव. 17ः20-23 में वचन कहता है - ‘‘ईष्वर पश्चताप करने वालों को अपने पास लौटने देता और निराष लोगों को ढारस बंधाता है।’’ इसलिए प्रभु आज के पहले पाठ में उन्हें सांत्वना भरे शब्दों में कहता है - ‘‘येरूसालेम! अपने शोक और संताप के वस्त्र उतार और सादा के लिए ईष्वर की महिमा का सौंदर्य धारण कर...येरूसालेम! उठ खडा हो जा, पर्वत पर चढ़ कर पूर्व की ओर दृष्टि लगा। देख, प्रभु की आज्ञा से तेरे पुत्र पष्चिम और पूर्व से एकत्र हो गये हैं। वे आनन्द मना रहे हैं, क्योंकि ईष्वर ने उनकी सुधी ली है...दयामय तथा न्यायी ईष्वर इस्राएल को आनन्द प्रदान करेगा और अपनी महिमा के प्रकाष से उसका पथप्रदर्षन करेगा।’’
बपतिस्मा ग्रहण करके हम सभी प्रभु की चुनी हुई प्रजा बन गये हैं। हम सब नये येरूसालेम यानी प्रभु की कलीसिया के सदस्य हैं; हम सब नयी इस्राएली प्रजा कहलाते हैं। प्रभु ने हम सब से अनन्त प्रेम से प्रेम किया है। जो प्रेमभरे वचन प्रभु ने इस्राएली जनता से कहे थे वे आज हमसे भी कहते हैं। तुम मेरी दृष्टि में मुल्यवान हो...चाहे माँ अपने दुधमुँहे बच्चे को भूला भी दे तो भी मैं तुम्हें नहीं भूलाऊँगा आदि। आईये हम अपने आप का जाँच करके देखें कि हम उन इसा्रएली लोगों से कितने भिन्न हैं। क्या हम, भी हमसे प्रेम करने वाले ईष्वर को त्याग कर बुराई के मार्ग पर नहीं चलते? क्या हम भी हमारे कार्यों द्वारा उनको अप्रसन्न नहीं करते? क्या हमने भी जानबुझकर हमसे अनन्त प्रेम करने वाले ईष्वर के दिल को नहीं तोडा? क्या हमने उनको अपने पापों के कारण दुःख नहीं पहुँचाया?
तो आईये हम भी प्रभु के पास वापस लौट चलें। यह आगमन का समय हमारे लिए प्रभु के पास पुनः लौट आने का उचित समय है। आज के पहले पाठ  में बारुक 5, 7 में प्रभु ने अपनी प्रजा को आदेश दिया है कि यदि  वे  प्रभु सुरक्षा में आगे बढ़ना चाहते हैं तो उन्हें हर एक ऊँचा पहाड़ व चिरस्थाई घाटी को समतल करना होगा। हर ऊँचा पहाड़ और चिरस्थाई घाटी याने हमारे जीवन के वे पाप, हमारी वे बुराइयां जो हमें हिमालय जैसे ऊँचे या कभी न भरने वाली गहरी घाटी सामान लगती हों हमें उन्हें समतल करना होगा। दूसरे शब्दों में प्रभु का आदेश है कि हम इस अगमनकाल  में उन बुराइयों को छोड़ दें जो हमारे जीवन में चिरस्थायी घाटी या ऊँचा पहाड़ बनकर बैठी हैं। 
आज के सुसमाचार में संत योहन बपतिस्ता हमें अपने पापों पर पश्चताप करते हुए प्रभु के लिए अपने आपको तैयार करने को कहते हैं। वे कहते हैं ‘‘प्रभु का मार्ग तैयार करो’’ हम सब को प्रभु के लिए मार्ग तैयार करने की ज़रूरत है। योहन बपतिस्ता का काम था प्रभु के रास्ते को सीधा करना। हमें भी पश्चताप, क्षमा, शाँति, प्रेम व पवित्रता के जीवन द्वारा प्रभु के रास्ते को सीधा करना है। ‘‘हर पहाड व पहाडी समतल की जाये’’ हमें हमारे जीवन से घमंड के पहाडों को खोदकर समतल करना है। ‘‘हर घाटी भर दी जाये’’ घाटी को भरना अथवा खाई को पाटना, हमें याद दिलाता है हमारी खोखली धार्मिकता की। जिस विष्वास की हम घोषणा करते हैं और जिस प्रकार का जीवन हम रोज वास्तव में जीते हैं इसके बीच एक बहुत बडी खाई है, जिसे हमें समतल करना है। हमें हमारे विष्वास व दैनिक जीवन के बीच की खाई को भरकर दोनों में समानता लाना है। हमारी कथनी व करनी में समानता लाना है। ‘‘टढे-मेढे रास्ते सीधे कर दिये जायेंगे’’ हमारे पापमय रास्ते, बुराईयों भरे रास्ते को हमें सीधा करना है। बुराईयों के टेढे-मेढे रास्ते को सुधारकर हमें सीधा करना है। याने हमारे जीवन में सुधार लाना है।
यह सब करना तभी संभव है जब हमें हमारी गलतियों का आभास होगा। जब हमें लगेगा कि हाँ मैं सचमुच प्रभु से दूर हो गया हूँ, मुझे जब ये लगने लगेगा कि हाँ मुझे प्रभु के पास लौट आना चाहिए। और इसके लिए सच्चे मन से पश्चताप करते हुवे पापस्वीकार संस्कार के द्वारा प्रभु से व अपने पडोसियों से मेलमिलाप करने व पवित्र युखरिस्त में भाग लेने से बेहतर रास्ता और क्या हो सकता है। माता कलीसिया इस आगमनकाल में हमें पश्चताप करने व अपनी पापमय जिंदगी से मन फिराकर प्रभु के पास लौटने का एक सुअवसर प्रदान करती हैं। आईये हम इस पवित्र समय का पूरा लाभ उठायें। व प्रभु के लिए स्वयं को अच्छी तरह से तैयार करें।

आमेन।  

I humbly look forward to your comments and valuable suggestions for improvement and corrections. 

May God Bless us all. 




Friday, 30 November 2018

आगमन का पहला रविवार वर्ष - स


आगमन का पहला रविवार वर्ष - स 
पहला पाठ यिरिमियाह ३३,१४-१६ 
दुसरा  पाठ थेसलनिकयों  ३, १२. ४,२ 
सुसमाचार लुकास २१, २५-२८.-३६  

आज से पवित्र माता कलीसिया पवित्र आगमन काल की शुरूआत कर रही है। नबी यिरिमियाह के ग्रंथ से लिए आज के पहले पाठ में हम पढते हैं - प्रभु कहता है: वे दिन आ रहे हैं... नबियों के ग्रंथ में यह वाक्यांश कई बार आता है। नबी इन शब्दों के द्वारा इस्राएली जनता के उद्धार की भविष्यवाणियां करते हैं खासकरके मसीहा के आगमन के विषय में। जब हम मसीहा के आगमन की चर्चा करते हैं तो पवित्र बाइबल हमें उनके दो आगमनों के बारे में बतलाती है। एक उनका देहधारण करके मनुष्य बनकर इस दुनियां में आना व दूसरा उनका अंतिम महिमामय आगमन जब वो इस दुनिया का न्याय करने आयेंगे। इन दोनों घटनाओं की याद दिलाने के लिए माता कलीसिया ने पवित्र आगमनकाल निर्धारित किया है। चार सप्ताहों का यह समय हमें प्रभु के आने की याद दिलाता है कि प्रभु येसु परम पिता का इकलौता बेटा हमें पापों की दासता से छुडाने और हमें पिता के पास वापस ले जाने इस दुनिया में आया जिसे हम मसीह का प्रथम आगमन कहते हैं. और जिसे हम ख्रीस्त  जयंति के रूप में प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर को मनाते हैं। इस मान से आगमनकाल ख्रीस्त जयंति मनाने की तैयारी का समय होता है। इस तैयारी के तीन मुख्य पहलू होते हैं-
 1. हमारी मुक्ति की वह घटना जब शब्द देह बना। हम इस महान रहस्यमय ईश-प्रेम  की घटना पर मनन-चिंतन करते हैं कि किस प्रकार से ईश्वर ने अपने अनंत प्रेम से प्रेम किया है. (यिरिमियाह 31,3)। 

2. वही प्रभु येसु मेरे व्यक्तिगत जीवन में एक जीवित सच्चाई बनकर आना चाहता है। तो इस आगमनकाल में यही जीवित येसु मेरी सारी तैयारियों का केंद्र होना चाहिए। जब मैं क्रिस्मस के बारे में एक पल आँखें मूंद कर कल्पना करूं तो मेरे जेहन में क्या चित्र उभरता है? ईमानदारी से कहूँ तो - गौशाला, बहुत सारी सजावट, बहुत बडी भीड, पकवान आदि। क्योंकि बचपन से ही मैं क्रिस्मस पर यही सब देखता आ रहा हूँ। यदि बालक येसु के बारे में कुछ सोचूं तो बालक येसु की मूर्ति दिमाग में आती है जिसे लेकर कैरोल के लिए जाते हैं या फिर क्रिब में रखते हैं और जिसका हम चुम्बन करता हैं। ये सब बातें बालक येसु के पास जाने के माध्यम हो सकते हैं कि लेकिन बालक येसु इन सब से परे एक जीवित सच्चाई है। वह एक जिंदा खुदा है, जो मेरे जीवन में आने वाला है। मैं मूर्ती वाले बालक येसु की नहीं पर मरियम की कोख से जन्में जीवित येसु, जो कि पवित्र साक्रामेंट में मेरे दिल में आने वाले हैं उनकी राह देखता हूँ। जितना अधिक मुझे मेरे येसु से प्यार है उतना ही अधिक मैं उनके आने के इंतजार में बेचैन व बेताब रहुंगा। जितनी अधिक मुझे मुक्ति की जरूरत है उनता अधिक मैं  मेरे मुक्तिदाता से मिलने को आतुर रहूंगा। मुझे भोर की प्रतीक्षा करने वाले पहरेदारों से भी अधिक प्रभु की प्रभु की राह देखना चाहिए जैसा कि स्तोत्र 130, 6 में लिखा है। या फिर जल के सूखी संतप्त भूमि की तरह, प्रभु दर्शन के लिए मेरे आत्मा तरसना चाहिए जैसा कि स्तोत्र 63, 2 में स्तोत्रकार कहता है। 

3. तीसरा पहलू है प्रभु येसु का अंतिम आगमन।ख्रीस्त जंयति के लिए हमारी जो तैयारी है वह हमें मसीह के अंतिम आगमन की याद दिलाती है कि जैसे प्रभु येसु 2000 साल पहले पिता ईश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार इस दुनिया में मानव बनकर आये थे वैसे ही वे अपनी प्रतिज्ञानुसार हमें अपने साथ ले जाने फिर आयेंगे। प्रभु का वचन आज के पहले पाठ में कहता है - ’’मैं दाऊद के घराने के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पूरी करूंगा। प्रभु अपना वादा पूरा करेंगे जैसा उन्होंने संत योहन 14,3 में कहा है - ’’मैं वहाँ जाकर तुम्हारे लिए स्थान का प्रबंध करने के बाद फिर आऊँगा और तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊगा, जिससे जहाँ मैं हूँ वहाँ तुम भी रहो।’’ अपने पहले आगमन में येसु हम मनुष्यों को जो कि अपने पापमय  स्वभाव के कारण पिता के घर का रास्ता भटक गये थे, उन्हें पिता के घर का रास्ता बताने आये। पिता के घर हमें वापस ले जाने के लिए, इस नश्वर संसार से व उजड जाने वाले इस घर से हमें अपने वास्तविक घर में, ले जाने के लिए येसु स्वयं रास्ता बन गये। (संत योहन 14,6) हमें स्वर्ग तक ले जाने के लिए वे एक सीढी बन गये। (संत योहन 1, 51) और हमें अपने साथ वापस ले जाने के लिए वे दूसरी बार फिर आएंगे. 
तो जब हम इस आगमन काल में प्रभु येसु के आने की तैयारी कर रहे हैं हमें उनके दोनों आगमनों को  गंभीरता से लेने की ज़रूरत है। और शायद उनके अंतिम आगमन को और भी ज्यादा गंभीरता से लेना चाहिए। क्योंकि आज का सुसमाचार हमें बतलाता है कि ‘‘कहीं ऐसा न हो कि भाग-विलास, नशे और इस संसार की चिंताओं से तुम्हारा मन कुंठित हो जाये और वह दिन फन्दे की तरह अचानक तुम पर आ गिरे। क्योंकि  वह दिन समस्त पृथ्वी के सभी निवासियों पर आ पडेगा।’’

इसलिए मसीह के अगामन की तैयारी में हमें क्या करना चाहिए आज का वचन हमें बतलाता है - संत लूकस 21,36 - ‘‘जागते रहो और सब समय प्रार्थना करते रहो।’’ हमें सजग रहकर प्रार्थना में लगे रहना चाहिए। आगमनकाल में हम अधिक समय प्रार्थना में बिताना चाहिए। संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमें कहते हैं - ‘‘आपका प्रेम एक दूसरे के प्रति और सबों के प्रति बढता और उमडता रहे। इस प्रकार वह उस दिन तक अपने हृदयों को हमारे पिता ईश्वर के सामने पवित्र और निर्दोष बनाये रखें, जब हमारे प्रभु ईसा अपने सब संतों के साथ आयेंगे।’’ यही है आगमन की सच्ची तैयारी। प्रभु के प्रेम में व एक दूसरे के प्रेम में बढते हुए हर रोज पवित्र बने रहें। क्योंकि जो पवित्र हैं वे ही प्रभु के दर्षन कर पायेंगे। (संत मत्ती 5, 8)। 

आइये इस आगमनकाल में हम जीवित येसु से मिलने के लिए अपने आपको तैयार करें। आमेन।


आत्मा की तलवार, प्रभु का वचन आपको आगमनकल में अच्छी तैयारी करने का सामर्थ्य प्रदान करें ।



Saturday, 15 April 2017

पास्का पर्व , 2017

मेरे प्रिय भाईयों बहनों आज की पूजनविधि में  हम प्रभु के पुनरूत्थान पर मनन चिंतन करेंगे। योहन  11,33 में वचन कहता है - पुनरूत्थान और जीवन मैं हूँ। .......
हमने बीते दिनों में प्रभु येसु के दुखभोग एवं मरण की यादगारी मनाई। उनकी मृत्यु के बाद  उनके कुछ शिष्यों  ने उनकी पवित्र लाश  उतारी और उन्हें कब्र में रख दिया। प्रभु येसु के विरोधियों ने उनकी कब्र पर बडा सा पत्थर रखकर उस पर मूहर लगा दी यह सोचकर कि इसने पहले से कहा था कि वह तीसरे दिन जी उठेगा। न जाने कब उन के शिष्य आयेंगे और इसकी लाश  को ले जायेंगे। प्रभु के विरोधियां ने सोचा सारी कहानी का अंत वहां हो गया। सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन हम प्रेरित चरित  2, 24 में हम पढते हैं, जहां संत पेत्रुस कहते हैं  - ‘‘ ईश्वर  ने मृत्यु क बंधन खोलकर उन्हें पुनर्जीवित किया। यह असंभव था कि प्रभु येसु मृत्यु के वश  में रहे।’’ मृत्यु के अधीन, उसके अधिकार में उसके बंधन में रहना प्रभु येसु के लिए असंभव था।

प्रभु येसु के शिष्यों के अंदर भी डर था। और इसिलिए वे लोग भी सोच रहे थे कि सारी कहानी खत्म हो गई है, और वे जाकर एक कमरे में अपने-आप को बंद कर के छिप गये। अपने आप में ग्लानी महसूस कर रहे थे। अपने किये कार्यों पर ग्लानी व दुःख महसूस कर रहे थे कि दुखित क्षणों में हमने प्रभु को छोड दिया। हमने प्रभु का तिरस्कार किया। सबों पर उदासी छायी हुई थी। सब डरे हुए थे एक बंद कमरे में, मानो वे मरे हुए थे। 

संत योहन 20, में हम पढते हैं उनके बंद कमरे में पुनर्जिवित प्रभु येसु प्रवेश करते  हैं। और पुनर्जिवित प्रभु येसु का सामर्थ्य उस कमरे में भर जाता है। उनका प्रकाश  उस कमरे में भर जाता है। उनका जीवन उस कमरे में भर जाता है। इस तरह 2 तिमथी 1,10 में वचन कहता है - ‘‘ईसा ने मृत्यु का विनाश किया और अपने सुसमाचार के द्वारा अमर जीवन को अलोकित किया है।’’ जो शिष्य डरे हुए थे, असुरक्षा मसूस कर रहे थे कमरे में बंद थे, उन में प्रभु येसु ने एक नये जीवन का संचार किया। वे मरे -मरे थे उन पर प्रभु येसु ने जीवन का संचार किया। उनके उपर जो ग्लानी की भावना थी दुख से भरे थे, उन्हें प्रभु येसु ने आनन्द से भर दिया। जैसे कि एक पौधा, जो पानी के आभाव में मुरझा रहा हो, सूखने-सूखने को हो और अचानक उसे पानी किल जाए तो  वह फिर से खिल उठता है। हरा-भरा हो जाता है वैसे ही प्रभु के  शिष्यों में नई जान आ जाती है।

हम सुसमाचार में पढते हैं कि प्रभु येसु के प्रिय  शिष्याओं  में से एक मरियम मगदलेना और कुछ नारियां प्रभु येसु की कब्र की ओर जाती है। प्रातः का समय था वे आपस में सोच रहे थे कि हमारे लिए कौन कब्र को खोल देगा ताकि हम उनकी लाश  पर इत्र लगाएं। और ऐसा सोचते हुए वे कब्र के पास जा रही थी, सुसमाचार हमें बताता है कि जब वे वहां पहुंचती है तो कब्र खुली हुई थी। मरियम दौड कर आयी पेत्रुस और योहन को बुला लाई उन्होंने भी देखा कि कब्र खुली है और येसु की लाश  उसमें  नहीं है। और वह वहीं खडी रह गई और रोने लगी। तो स्वर्ग दूतों ने पूछा नारी क्यों रोती हो। उसने कहा कि क्योंकि वे मेरे गुरू की लाश  को ले गए हैं और  मैं नहीं जानती कि वह कहां है। बाद में प्रभु येसु स्वयं उससे पूछते हैं, नारी तुम क्यों रोती हो! और वह वही जवाब देती है। अंत में प्रभु येसु उन्हें नाम लेकर उसे पुकारते हैं "मरियम " और मरियम प्रभु येसु को पहचान लेती है। पुनर्जीवित प्रभु येसु का सामार्थ्य उसके अंदर प्रवेश  कर जाता है।

इस तरह हम देखते हैं कि सुसमाचार में पढते हैं कि करीब चालिस दिनों तक प्रभु येसु अपने शिष्यों के साथ रहे और उनको बार-बार विविध रूपों में दर्शन  देते हुए इस बात का अनुभव करा रहे थे कि देखो मैं मर गया था लेकिन अभी जी गया हूँ। जैसा कि प्रकाशना 1 :18 ग्रंथ में हम पढते हैं - ‘‘जीवन का स्रोत मैं हूँ। मैं मर गया था और देखो, मैं अनन्त काल तक जीवित रहूँगा। मृत्यु और अधोलोक की कुंजियां मेरे पास है।  तो इस प्रकार करीब चालिस दिन तक प्रभु येसु ने बारम्बार अपनेशिष्यों को दर्शन  देकर इस बात का अनुभव कराया कि वे  जीवित हैं  और पुनरूत्थान पर उनका विश्वास  दृढ करवाया। और उनका जीवन परिवर्तित हो गया। 

प्रभु येसु के पुनरूत्थान ने उनके जीवन को परिवर्तित कर दिया। उनका जीवन दर्षन ही बदल गया। जीवन को देखने का नज़रिया बदल गया। उनके लिए जीवन का एक नया रास्ता खुल गया। और प्रभु के पुनरूत्थान का अनुभव इतना गहरा था कि हमें वचन बताता है कि वे जाकर प्रचार करने लगे।  फिलिपियों 3,10 में संत पौलुस कहता है - "मैं यही चाहता हूं कि येसु मसीह को जानूं और उनके पुनरूत्थान के सामार्थ्य का अनुभव करूं।’’
संत पेत्रुस प्रे. च. 2, 23-24 में प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देते हैं। यह पहला उपदेश  था और प्रभु के शिष्यों का  पहला प्रचार। उनके उपदेश की विषय-वस्तु और केंद्र प्रभु का पुनरूत्थान था। वे पुनर्जीवित प्रभु का गहरा अनुभव लोगों के साथ बांटते हैं। प्रे. च. 4, 35 में हम पढते हैं - प्रभु येसु के शिष्य बडे सामार्थ्य के साथ प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देते थे और उन पर बडी कृपा बनी रहती थी। जब हम भी पुनर्जीवित येसु का साक्ष्य देंगे हम पर भी प्रभु की कृपा बनी रहेगी।

 हम ईसाईयों को चाहिए कि हम पुनर्जीवित मसीह का साक्ष्य देंवे। कभी-कभी देखने में आता है कि हम प्रभु मसीह के क्रूस पर बलिदान तक ही अपने साक्ष्य को सीमित रखते हैं। और प्रभु येसु के बलिदान के बारे में हम साक्ष्य देते हैं। पर सच्चे  मसीही वो हैं जो प्रभु येसु के पुनरूत्थान के बारे में साक्ष्य देते हैं। आज गैर ख्रीस्त  से भी यदि हम पूछें कि आप ईसा मसीह के बारे में क्या जानते हैं तो वे बतायेंगे कि उन्होंने सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम व क्षमा के मार्ग की न केवल शिक्षा  दी परन्तु अपने जीवन में उसे आत्मासात भी किया। उन्होंने क्रूस पर मरते समय भी अपने विरोधियों को क्षमा दी आदि। पर बहुत ही विरले हम उनके मुख से प्रभु के पुनरूत्थान के बार में सुनेंगे। क्यों? क्यों लोग प्रभु के पुनरूत्थान से अनभिज्ञ है? क्योंकि हम पुनर्जीवित प्रभु का साक्ष्य नहीं देते।    1 कुरिं 15,17 में वचन कहता - ‘‘यदि येसु मसीह का पुनरूत्थान नहीं हुआ है तो हमारा विश्वाश  व्यर्थ है।’’ हम मसीहियों के विश्वाश  का आधार है प्रभु येसु का पुनरूत्थान। हम किसी मरे हुए व्यक्ति की आराधना नहीं कर रहे हैं। हम पत्थरों अथवा मूर्तियों की नहीं,  हम एक ज़िदा खुदावन्द की आराधना करते हैं।  हम पुनर्जीवित येसु मसीह की आराधना करते हैं। जितनी यह बात  हमारे जीवन मजबूत होती जायेगी उतना आधीक हम प्रभु येसु के जीवन  का अपने जीवन में अनुभव करने लगेंगे। तो हम हर मसीही पुनर्जीवित येसु के साक्षी हैं। और हमें प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देना है।

यह साक्ष्य हमें  हमारे कर्मों एवं वचनों दोनों से देना है। हमें पुनर्जीवित मसीह की घोषणा करना है। हमें लोगों को यह बतलाना है कि हमारा प्रभु जिंदा खुदा  है। और अपने कर्मों द्वारा भी यह दिखलाना है कि हमारा प्रभु हममें, हमारे अन्दर, हमारे जीवन में जिंदा है। गलातियों  को लिखे  पत्र 
2 :20 में  में संत पौलुस कहते हैं - ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर मर गया हूँ। मैं अब जीवित नहीं रहा, बल्कि मसीह मुझ में जीवित है।’’ पुनर्जीवित मसीह मुझमें जीवित है। वो मेरे अंदर कार्य कर रहा है। वो मेरे अंदर अपने राज्य के फल उत्पन्न कर रहा है। कब्र से निकलकर वो मेरे जीवन में समाहित हो गया है। हम सब संत पौलुस के साथ आज यही बोलें - मुझमें अब से येसु जिंदा है। मेरा प्रभु मुझमें ज़िंदा है. मसीह का जीवन मुझमें मुझमें है।  मसीह का खून मेरे रगों में बह रहा है.  और यदि मसीह मुझमें जीवित है तो फिर मेरे कार्य, मेरी बातें, मेरा व्यवहार और मेरे विचार भी मसीह की तरह ही होना चाहिए। प्रभु का पुनरूत्थान मनाते समय यही भावना और यही घोषणा हम सब की होनी चाहिए। आमेन।

Saturday, 8 April 2017

Introduction for Palm Sunday Liturgy in Hindi

दुःखभोग अथवा खजूर रविवार


आज से वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पुण्य सप्ताह आरंभ होता है। विशेषकर अगला गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार तथा रविवार वर्ष-भर में सबसे पवित्र दिन हैं। इन दिनों में घटी मानव इतिहास की सबसे मुख्य व केंद्रिय घटना ईशपुत्र येसु मसीह के दुःखभोग, मरण एवं पुनरूत्थान को माता, कलीसिया पुनः हमारे सामने रखती है। हम ख्रीस्तीय न केवल इन घटनाओं को ही देखें, परन्तु प्रार्थना तथा दृढ़निश्चय के साथ पूरी तरह उनमें सक्रिय रूप भाग लें।
आज का दिन प्रभु के दुःखभोग का खजूर रविवार कहा जाता है। हम पवित्र सप्ताह केवल प्रभु येसु मसीह की येरूसालेम यात्रा के ही कारण नहीं, वरन् उनके मनुष्य रूप में आने के उद्देश्य याने उनके दुःखभोग,मरण और पुनरूत्थान के कारण ही मनाते हैं। बेथानिया से जुलूस में राजा अपने राजाभिषेक एवं गद्दी पर बैठने येरूसालेम आये,परन्तु इस राजा का मुकुट काँटों का मुकुट है और उसकी गद्दी क्रूस है।

आज की प्रार्थनाएँ, भजन, पाठ तथा क्रियाएँ, यह सब बताती हैं कि हम सबके सामने प्रभु के प्रति अपना विश्वास व श्रद्धा प्रकट करते हैं। हम अपने उस राजा के साथ जुलूस में जाते हैं जिन्होंने हमारे लिए एक घमासान लड़ाई लड़ी। इसीलिए खजूर, जो विजय का चिह्न है, अपने हाथ में लेकर हम जुलूस निकालते हैं।

आज की धर्म-विधि में सब से पहले खजूरों को आशिष दी जाती है।तब पवित्र सुसमाचार से प्रभु येसु के येरूसालेम प्रवेश का वर्णन पढ़ा जाता है।
सचमुच हम आज भी उसी येसु मसीह के जुलूस में जाते हैं जिनके साथ उस पहले खजूर रविवार के दिन यहूदी लोग गए थे। येसु हमारे बीच तीन प्रकार से उपस्थित हैं-क्रूस पर चिन्ह के रूप में, उनके प्रतिनिधि पुरोहित के रूप में और हम सब के रूप में जो उनके नाम पर यहाँ एकत्रित हुए हैं।

यह जुलुस हमारे उस अंतिम जुलूस की निशानी है जिसमें हम प्रभु येसु के साथ स्वर्गीय येरूसालेम में सदा के लिए प्रवेश करेंगे।

अब हम उस प्रथम खजूर रविवार की याद करें जिस दिन प्रभु येसु मसीह स्वयं अपने शिष्यों के साथ बेथानिया से येरूसालेम गये थे। वे क्यों वहाँ गए? राजा बनने? किसी भी हालत में, सांसारिक राजा बनने नहीं।
उनका मुकुट काँटों का मुकुट था। वे हमारे लिए दुःख भोगने और मर जाने के लिए गए और अपने इस घोर दुःखभोग एवं मरण द्वारा पुनरूत्थान के लिए गए। हमारी मुक्ति उनका अनुसरण करने पर निर्भर है, यदि हम उनके साथ जी उठना चाहते हैं तो हमें उनके साथ मरना भी है। इसीलिए आज की मिस्सा की पहली प्रार्थना में हम इस प्रकार निवेदन करते हैंः-
‘‘उनके दुःखभोग के अनुसार चलने पर हमें उनके पुनरूत्थान के भी भागी बना दें।’’

खजूर की डालियों के साथ भजन गाते हुए हमारा जुलूस, आज की मिस्सा का प्रवेश गान है। मिस्सा हमें कलवारी पहाड़ी पर हुए मुक्ति कार्य की याद दिलाती व उसे सांस्कारिक चिन्हों के रूप में सजीव करती है, जबकि खजूरों के साथ जुलूस, मुक्तिदाता के पुनरूत्थान का विजय-स्मृति चिन्ह है। घर जाकर हम अपनी खजूर की डालियाँ आदर के साथ कमरों में लगे क्रूस पर लगा देंगे क्योंकि उन्हें धर्म-मण्डली की विशेष आशिष मिली है। वहाँ से ये हमें प्रभु येसु के प्रति अपनी भक्ति व श्रद्धा की याद दिलाती रहें।
पास्का का अपना पाप-स्वीकार हमें पुण्य बृहस्पतिवार के मिस्सा के पूर्व ही करना चाहिए। शनिवार तक ठहरना पवित्र सप्ताह की कृपाओं से अपने आप को वंचित रखना होगा।

खजूर रविवार, २०१७ का प्रवचन



इसायाह ५०, ४-७
फिलिपियों २,६-७
मत्ती २६, १४-६६

येसु का येरूसलेम में प्रवेश  करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह यहूदियों के पास्का पर्व का समय था। प्रभु येसु येरूसलेम में प्रवेश  करते हैं क्योंकि उनका समय आ चुका था। 21 मार्च 2017 को न्युयाॅर्क के एक यहूदियों के प्रार्थना गृह में बम होने की अपवाह के बाद उस प्रेमिस से प्री-सकूल के बच्चों को आनन-फानन में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। इस प्रकार की कई घटनाओं के बारे में हम पढते और सुनते हैं। कहीं तुफान अथवा भूकम्प की से बचने के लिए लोग अपने घरों को अपने आशियांनों को छोडकर सुरक्षित स्थानों पर जाते हैं तो कहीं आतंकियों या फिर विरोद्धी सेना से बचने के लिए सुरिक्षत स्थानों को तलाशते हैं। क्योंकि हम सब मौत से डरते हैं। हम मरने से डरते हैं। कोई ज़्याद तो कोई कम, पर मौत से डर हर-किसी को लगता है। साधरणतः सभी अपने जीवन को सुरक्षित रखना चाहते हैं। हम जीना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि हम कब तक जीयेंगे पर जीवन से हमें प्रेम है। परन्तु प्रभु येसु इस संसार में इस लिए आये कि वे मारे जायें। वो मौत को गले लगाकर मौत को हराने के लिए इस संसार में आये। वे इसलिए आये कि उनके मारे जाने से हमें जीवन मिले। उन्होंने मरना स्वीकार किया ताकि हम जीवित रहें।
वे इस मौत को एक मज़बूरी के तौर पर नहीं, परन्तु पिता की मर्जी व उसकी को योजना को पूर्णता तक पहुुँचाने के लिए स्वीकार करते हैं। उनके जीवन का मकसद ही यह था कि वो अपने स्वर्गीक पिता की इच्छा को पूरा करे। संत योहन 4, 34 में वे कहते हैं - ‘‘जिसने मुझे भेजा है उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है।’’ पिता की इच्छा को, पिता की मरजी़ को, पिता की चाह को पूरा करना ही प्रभु येसु का भोजन था। पिता की इच्छा क्या थी? संत पौलुस हमें बतलाते हैं रोमियों 3, 25 में - ‘‘ईश्वर ने चाहा कि ईसा अपना रक्त बहा कर पाप का प्रायष्चित करें और हम  विश्वास  द्वारा उसका फल प्राप्त करें।’’ यह है पिता ईश्वर  की इच्छा। प्रभु येसु अपने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए व्याकुल थे। संत लूकस 12,50 में प्र्रभु कहते हैं - ‘‘मुझे एक और बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ।" हम सब जानते हैं कि प्रभु येसु ने अपनी सेवकाई प्रारम्भ करने के पहले यर्दन नदी में योहन बपतिस्ता से बपतिस्मा लिया था जो कि जल का बपतिस्मा था। अब वे रक्त का बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए व्याकुल थे। एक ऐसा बपतिस्मा जो सारे संसार के पापों की क्षमा के लिए वे लेने वाले थे। वे इस दुनिया के, व सारी मानव जाती के नये पुराने सब पापों को सूली पर अपना खून बहाकर माफ करने वाले थे। व सबके पापों का दाम चुकाने वाले थे। इस पवित्र बलिदान के द्वारा वे पिता से हम  सब का पुनः मेल कराने वाले थे। सारी कायनात के उद्धार को संपन्न करने वाले थे। एक महान बलिदान देने वाले थे। इसलिए जब समय पूरा हुआ तो वे अपने इस अंतिम मिशन  की ओर चल पडते हैं। योहन 13, 1 में हम पढते हैं - ‘‘ईसा जानते थे कि मेरी घडी आ गयी है और मुझे यह संसार छोडकर पिता के पास जाना है। वे अपनों को, जो इस संसार में थे, प्यार करते आये थे और अब अपने प्रेम का सब से बडा प्रमाण देने वाले थे।’’ आज हम उस दिन की याद करते हैं जब प्रभु अपने प्रेम का सब से बडा प्रमाण देने के लिए येरूसलेम की ओर बढते हैं। हमारे प्रति पिता के प्रेम का सबूत देने के लिए वे उस नगर में प्रवेश  करते हैं जहाँ उनके प्राणों के दुश्मन उन्हें  क्रूरतापूर्वक मार डालने की योजनायें बना रहे थे।
आज प्रभु येसु, सुसमाचार की सच्चाई को अपने आपमें धारण करते हैं और उसकी घोषणा करते हैं। उन्होंने अपने षिष्यों से कहा था - ‘‘जब तक गेहूं  का दाना जमीन पर गिरकर मर नहीं जाता वह तब तक अकेला रहता है, पर जब वह मर जाता है तब वह बहुत फल उत्पन्न करता है।’’ येसु स्वयं वह बीच है जो येरूसलेम की उस प्रचीन भूमि पर गिरा। ये वही गेंहूँ का दाना है जो मरकर बहुत फल उत्पन्न करता है, जो मुक्ति के फल उत्पन्न करता है। अतः मानवों की मुक्ति के लिए उनका मरना आवश्यक  था ।
हम हमारी मृत्यु से दूर भागते हैं। परन्तु प्रभु येसु अपनी मौत को ख़ुशी  से गले लगाने के लिए येरूसालेम में प्रवेश  करते हैं। वे मौत के भय से पीछे नहीं हटते। क्योंकि वे अपनी मौत की कीमत जानते थे। वे जानते थे कि उनका हर दुख, हर दर्द, हर एक कोडों की मार, उनका हर घांव, काटों वो ताज, और हाथ पैरों की वो कीलें ये सब मानव के पापों की मुक्ति के लिए आवश्यक  हैं। प्रभु येसु के लिए अपने मानवीय जीवन से महान है पापी आत्माओं का उद्धार।
प्रभु येसु स्वर्ग के राज्य की स्थापना करने के लिए इस जहान में आये थे। जब यर्दन नदी में अपने बपतिस्मा के बाद उन्होंने सुसमाचार का प्रचार प्रारम्भ किया उनका पहला सन्देश यही था। पश्चाताप करो, स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। विभिन्न कहानियों एवं दृष्टांतों द्वारा वे इस राज्य के बारे में लोगों को समझते रहे। पर लोग उन्हें सही अर्थों में समझ नहीं पाये। क्योंकि ईश्वर  का राज्य संसार के राज्यों और ईश्वर  का शासन सांसारिक राजाओं के शासन से बहुत ही भिन्न है। यह हिंसा एवं खुन खराबे के साथ सत्ता हासिल करने वाला राज्य नहीं। यह निर्बलों पर निरंकुष शासन करने वाला राज्य नहीं। यह गरीबों और बेसहारों का शोषण करने वाला राज्य नहीं। परन्तु यह है विनम्रता, अंहिसा, प्रेम, दयालुता और क्षमा का राज्य। दुनिया के राजा अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए हथियार बंद सेनाओं के साथ अपने दुष्मनों पर चढाई करते हैं। पर आज सारी दुनिया का राजा निहत्थे ही महज बारह अनुयायों के साथ पूरे संसार पर विजय पाने चल पडा है। उनको रथ, घोडों अथवा पालकी की ज़रूरत नहीं क्योंकि उनका राज्य इस दुनिया के दिखावटी वैभव पर टिका हुआ नहीं है। ये विनम्रता का राज्य है इसलिए उनके लिए एक तुच्छ समझा जाने वाला जानवर, गधा ही काफी था। वे गधे की सवारी करते हुए, विनम्रता का पाठ पढाते हुए वे येरूसलेम की ओर निकल पडे हैं। आज के दूसरे पथ में संत पौलुस हमें बताते हैं - "उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया है। और मनुष्यों का रूप धारण करने के बाद वह मरण तक, हाँ क्रूस के मरण तक, आज्ञाकारी बन गये ओर इस प्रकार उन्होंने अपने को और भी दीन बना लिया है। इसलिए ईश्वर  ने उन्हें महान बना दिया है।"
जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया है कि ये सब उस समय सम्पन्न होता है जब यहूदी लोग अपना वार्षिक पास्का पर्व मनाने पवित्र नगरी येरूसलेम आते हैं। यह पर्व मिस्र देश  से उनकी आज़ादी की धार्मिक यादगारी पर्व है जब ईश्वर  ने उन्हें मेमने के रक्त के चिन्ह द्वारा दूत की तलवार एवं फिराऊँ की गुलामी से बचाया था। ये उनकी मुक्ति का पर्व था। नये विधान का मेमना, प्रभु येसु शैतान रूपी फिराऊँ और पाप रूपी मिस्र से सारी मानव जाती को छुडाने के लिए इसी समय को चुनता हैं। हज़ारों यहूदी तीर्थ यात्रा करते हुए येरूसलेम पहुंच रहे थे। उसी बीच गधे पर सवार यहूदियों का राजा येरूसलेम की ओर बढ़ता है। तीर्थ यात्री उनके सामने रास्ते पर अपने कपडे बिछाते एवं जैतुन की डालियां लहराते हुए अपने राजा का स्वागत करते व भजन गाते हुए कहते हैं - होसन्ना, होसान्ना, होसान्ना, धन्य है वह जो प्रभु के नाम पर आते हैं स्वर्ग प्रभु को होसान्ना!!!
आज हम प्रभु येसु के साथ उस भीड में  उनके पीछे-पीछे येरूसलेम की पवित्र नगरी मेंप्रवेश  करें। आज से हम पवित्र सप्ताह का आरम्भ कर रहे हैं। यह वास्तव में अति पवित्र सप्ताह है। यह वह मुल्यवान समय है जब हमारी मुक्ति का कार्य सम्पन्न हुआ। विभिन्न प्रकार के लोग इस भीड मे प्रभु के साथ येरूलेम में प्रवेश  कर रहे हैं। हम भी इस भीड के साथ पवित्र नगरी मेंप्रवेश  करें। और हमारी मुक्ति के उन मुल्यवान पलों को हमारे जीवन में जिंदा करें। सैकडों की भीड जो आज होसान्ना गा रही है, जो आज प्रभु की तारीफ कर रही है, तीन दिनों के बाद - इसे क्रूस दो, इसे क्रूस दो कह कर चिल्लाएगी। तीन सालों तक उनके करीब रहकर उनके वचनों को सुनने वाले व चिन्ह और चमत्कार देखने वाले शिष्य  भाग खडे होंगे, सबसे भरोसेमंदशिष्य  पेत्रुस, याकूब और योहन गेथसेमनी की प्राणपीडा के समय प्रार्थना करके उन्हें ढाढस बंधाने की जगह, सो जायेंगे। पिलातुस उन्हें निर्दोष मानकर रिहा करने का मन बनाने पर सारे यहूदी नेता और भीड उनके विरूद्ध एक स्वर में उन्हें क्रूस देने की गुहार लगाएंगे। उनके साथ मर जाने की बात कहने वाला पेत्रुस उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देगा। उनका ही करीबी मित्र चाँदी के चंद सिक्कों के बदले उन्हें बेच देगा। झूठादोषारोपण, अन्यायपूर्ण दंड़, सैनिकों की क्रूरता, उनके द्वारा किया गया अपमान, सब के द्वारा ठुकराया गया एक अभागे इंसान से येसु कलवारी के पहाड़ पर मुक्ति का महायज्ञ सम्पन्न करने जा रहे हैं। उनके इन अत्यंत दुःखमयी पलों में उनकी प्यारी माँ मरिया, कुछ धार्मिक स्त्रियाँ, संत योहन, अरिमिथिया का युसूफ एवं निकोदेमुस उनके आस-पास रहते हैं। जब हम प्रभु के साथ मुक्ति के इन पलों को मनाने जा रहे हैं तो हम अपने आप से पुछें कि मैं किसका किरदार अदा करने जा रहा हूँ? उस धोखेबाज भीड का जो कभी होसन्ना तो कभी क्रूस देने की बात कहती है? या उन शिष्यों  का जो डर के मारे उन्हें छोडकर भाग खडे होते हैं अथवा उन्हें पहचाने से भी इनकार कर देते हैं? या फिर उन सैनिकों का जो अपने ही प्रभु ईश्वर पर हाथ उठाते हैं, जो अपने ही मुक्तिदाता पर कोडे बरसाते हैं? या फिर माता मरियम, धार्मिक नारियों एवं संत योहन का जो कि प्रभु के इन असहय दुखों की घडी में उनके साथ रहे व उनके दुखों में भागीदार हुए? या फिर उस भले डाकू का जो यह कहता है कि प्रभु आप जब अपने राज्य में आयेंगे तो मुझे याद कीजिएगा। सारी जिंदगी बुराईयों में बिताने के बाद भी अंतिम क्षणों का उसका पश्चाताप उसे स्वर्ग दिला देता है। प्रभु उससे कहते हैं आज ही तुम मेरे साथ स्वर्ग में होंगे। उसने विश्वास  किया कि येसु उसको अनन्त मृत्यु से बचा सकते हैं। वचन कहता है रोमियों 3, 25 में - ‘‘ईश्वर  ने चाहा कि ईसा अपना रक्त बहा कर पाप का प्रायष्चित करें और हम विष्वास द्वारा उसका फल प्राप्त करें।’’ आइये हम हमारे कमजोर टूटे व जर्जर विश्वास  को बटोरते हुए, अपनी बिखरी हुई मानवता को समटते हुए इस पवित्र एवं मुक्ति के सप्ताह में प्रवेश करें। प्रभु के साथ हमारी मुक्ति के उन पलों को सजीव करें, जब हमारे प्रभु येसु ने दुःख भोगा, क्रूस पर चढाये गये मर गये, दफनाये गये व तीसरे दिन वे फिर जी उठे।
आमेन।