Saturday, 16 February 2019

वर्ष का 6 वां रविवार:हिंदी मनन चिन्तन (February 17, 2019)



यिरमियाह 17,5-8
1कोरिंथियों 15,12.16,20
लूकस 6,17.20-26

प्रभु ने इंसान को सृष्टि का शीर्ष बनाया और उसे प्रज्ञा व ज्ञान से नवाजा। ईष्वर द्वारा प्रदत प्रज्ञा व ज्ञान की बदौलत इंसान ने इतिहास में कई प्रकार की खोजें और आविष्कार किये हैं। जिसने मनुष्य के जीवन को कई मायनों में एक आरामदायक व सुख-सुख सुविधाओं से सम्पन्न बना दिया है। कभी कई किलोमिटर पैदल यात्रा करने वाला मानव आज हवाई जहाज में बैठकर हजारों मील महज घंटों में तय कर लेता है। कई बिमारियां जो लाईलाज थी आज उनका इलाज खोज लिया है। मृत्यु दर परिणामस्वरूप कम हो गई है। कई प्रकार की मशिनों ने जटिल से जटिल कामों को आसान कर दिया है। कम्युटर विज्ञान की क्रांति ने तो हर दिशा में विसमयकारी काम किया है। आजकल अर्टिफिष्यल इंटेलिजेंस याने कृत्रिम दिमाग का विकास किया जा रहा है। याने मानव ऐसी मशीन अथवा रोबोट बना रहा है जो मनुष्य की तरह काम कर सकता है। अप्राकृतिक रूप से अर्थात कृतिम तरीकों से बच्चे पैदा करने के भी कई जुगाड मानव ने किये हैं। अंतरिक्ष की उडान भरकर इंसान चांद तारों की सैर करके भी आया है। और एक दिन वहां पर दुनिया बसाने के ख्वाब भी देख रहा है। ज्ञान और विज्ञान ईष्वर द्वारा प्रदत्त एक अमुल्य दान है। परन्तु इस पर मनुष्य की निर्भरता और भरोसा इतना अधिक हो गया है कि वे इसके स्रोत ईष्वर को ही भूल रहे हैं। किसी को अपने ज्ञान का गुरूर है तो किसी को अपनी संपत्ति का, किसी को  अपनी शारीरिक शक्ति का भरोसा है तो किसी को किसी व्यक्ति विषेष पर भरोसा है। प्रभु अपने वचन द्वारा हमें चेतावनी चेतावनी देते हैं सूक्ति ग्रंथ 3,5 में - ‘‘तुम सारे हदय से प्रभु का भरोसा करो। अपनी बुद्धी पर निर्भर मत रहो’’। संत लूकस 12,13 में हम मूर्ख धनी का दृष्टांत सुनते हैं जिसे अपने धन पर इतना भरोसा होता है कि वह पूरी जिंदगी ऐशो- आराम में गुजारने के ख्वाब देखता है। पर प्रभु उससे कहते हैं रे मूर्ख तेरे प्राण आज ही तुझसे ले लिये जायेंगे तो फिर तेरी इस संपत्ति का क्या होगा जिसे तूने इकट्ठा किया है?
आज के पहले पाठ में प्रभु मनुष्यों पर भरोसा रखने वालों को धिक्कारते हुए कहते हैं - ‘‘धिक्कार उस मनुष्य को, जो मनुष्यों पर भरोसा रखता है।’’
परन्तु जो ईश्वर पर भरोसा रखता है उसे प्रभु धन्य कहते हुए कहते हैं - ‘‘धन्य है वह मनुष्य जो प्रभु पर भरोसा रखता है, जो प्रभु का सहारा लेता है। वह जलस्रोत के किनारे लगाये गये वृक्ष के सदृश्य है, जिसकी जडें पानी के पास फैली हुई हैं। वह कडी धूप से नहीं डरता, उसके पत्ते हरे भरे बने रहते हैं। सूखे के समय भी उसे कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उस समय भी वह फलता है।’’
फलिप्प्यिों को लिखे पत्र 4,6 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘किसी बात की चिंता न करें हर जरूरत में प्रार्थना करें और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईष्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत करें।’’
जो मनुष्य अपने सभी कामों में ईश्वर पर भरोसा रखता है उसकी जडें ईश्वर  में है और उसे किसी भी प्रकार की प्रतिकूल अथवा विकट परिस्थिति में भी डरने व घबराने की कोई जरूरत नहीं। क्योंकि इस दुनिया का धन, इस दुनिया की ताकत, इस दुनिया की तकनीकियां, व इस दुनिया की दवाईयां हमें कुछ क्षणों का आराम व सकून तो दे सकती हैं परन्तु हमेशा की जिंदगी नहीं दे सकते। हमेशा की जिंदगी सिर्फ येसु ही दे सकता है। संत योहन 10,10 में प्रभु हमसे कहते हैं - ‘‘चोर केवल चुराने मारने एवं नष्ट करने आता है। मैं इसलिए  आया हूं कि वे जीवन प्राप्त करे, परन्तु हमेशा का जीवन प्राप्त करे।’’ इसलिए मसीह पर हमारा भरोसा केवल इस दुनिया के लिए नहीं परन्तु इस दुनिया के बाद आने वाले जीवन के लिए है। इसलिए आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस हमें बतलाते हैं - यदि मसीह पर हमारा भरोसा केवल इस जीवन तक ही सीमित है तो हम मनुष्यों में सबसे दयनीय हैं।’’ (1 कुरिंथयों 15, 19)
प्रभु येसु हमें इस दुनिया की ही खुशी, आनन्द और जीवन देने नहीं परन्तु इस दुनिया से परे, हमारे धन-दौलत से परे, हमारे ज्ञान-विज्ञान से परे, व हमारी बुद्धी से परे एक ऐसा जीवन देने आये जिसकी खुशी का, जिसके आनन्द का कोई अंत नहीं। क्योंंकि सारी खुशी, शांति और आनन्द का स्रोत ईश्वर स्वयं वहां उनके साथ रहेगा। इसलिए प्रभु येसु आज के सुसमाचार में गरीबों को धन्य कहते हैं जो अपने धन पर नहीं परन्तु ईष्वर पर व उसकी कृपा पर आश्रित रहते हैं। उनका भरोसा ईश्वर पर रहता है। और ऐसे लोगों के लिए ईश्वर ने स्वर्ग राज्य देने का वादा किया है। प्रभु इन्हें धन्य कहते हैं जो अभी भूखे हैं वे तृप्त किये जायेंगे, जो अभी रोते हैं वे हँसेंगे।
  प्रभु पर भरोसा व विश्वास करने के  कारण लोगों के बैर के शिकार व निंदा सहने वालों से प्रभू कहते हैं-
आनन्दित होना, क्योंकि देखो, तुम्हेँ स्वर्ग में बड़ा पुरस्कार प्राप्त होगा।
परन्तु जो जो इस दुनियां में अपना सुख खोजते व ईश्वर को त्यागकर दुनियांवी चीजों पर भरोसा रखने वालों को येसु कहते हैं-
धिक्कार तुमको जो धनवान हो, क्योंकि तुम अपनी शान्ति यहीं पर पा चुके हो।
धिक्कार तुम को जो अभी तृप्त हो, तुम भूखे रहोगे: धिक्कार तुम को; जो अब हंसते हो, तुम शोक करोगे और रोओगे।
प्यारे विश्वासियों आज निर्णय करिये कि हमें इस दुनियां के सुखों, इस दुनियां की ताकतों, व इस दुनियां के साधनों पर भरोसा रख कर क्षणिक सुख और शांति पाना है या फिर प्रभु पर भरोसा रख कर कभी न खत्म होने वाली खुशी व आनंद पाना है। प्रभु हम हैं सही चुनाव करने की कृपा दे आमेन।


Saturday, 9 February 2019

वर्ष का पाँचवा, रविवार हिंदी मनन चिंतन (February 10, 2019)

इसायाह 6,1-2.3-8
1कुरिन्थियों 15, 1-12
मत्ती 5, 1-11
Homily Reflections by Rev.  Fr. Pius Lakra SVD

‘‘मैं किसको भेजूं, मेरा संदेश कौन लेके जाएगा,

फिर मैंने कहा - मैं यहाँ प्रस्तुत हूँ मुझे लीजिए।’’

आज सामान्य काल का पांचवाँ रविवार है। आज के पाठों के द्वारा प्रतीत होता है कि अपने सन्देश/सुसमाचार को दूसरों तक पहुँचाने के लिए, ईश्वर को हमारी आवश्यकता है - चाहे वह एक सहभागी के तौर पर हो या फ़िर शिष्य के तौर पर या एक सन्देशवाहक के तौर पर।

पहले पाठ में नबी इसायाह के दिव्य दर्शन या बुलावे के बारे में वर्णन है तो वहीं आज दूसरे पाठ में संत पौलुस उनकी खुद की बुलाहट का वर्णन करते हैं और सुसमाचार में हम येसु के प्रारंभिक शिष्यों के बुलावे का वर्णन पाते हैं।

ईसा पूर्व सातवीं सदी में तत्कालीन यूदा के राजा उज़्ज़ीया के मृत्यु वर्ष में, नबी इसायाह को बुलावा मिला। इस पाठ के अनुसार नबी इसायाह को ईश्वर का दर्शन मिलता है और इसका संदर्भ है मंदिर का वातावरण तथा पूजा अर्चना का मुहूर्त। नबी इसायाह को एहसास होता है कि ईश्वर अति पवित्र, शक्तिशाली, और मनुष्य से परे है। उनकी वाणी से सब कुछ काँपता है वे सर्वशक्तिमान है। धुआँ उनकी पूर्ण उपस्थिति को प्रतीत करता है । ईश्वर के पवित्र होने के ठीक विपरीत, नबी इसायाह को अपनी मानवीय स्थिति जो कि बिल्कुल पापमय, अपवित्र है का एहसास होता है। लेकिन स्वर्ग दूत, नबी इसायाह की जिव्हा में अंगार से स्पर्श कर उन्हें पवित्र करते हैं तथा उन्हें नबी बनने के लिए आह्वान करते हैं। ईश्वर अति पवित्र है, और पवित्रतम् ईश्वर के कार्य करने के लिए पवित्र व्यक्ति चाहिए, शुध्दीकरण नितांत आवश्यक है।

संत पौलुस कहते हैं, “मैं जो हूँ वह प्रभु की कृपा से, और ईश्वर की कृपा मेरे प्रति व्यर्थ नहीं”। दूसरा पाठ कुरिन्थयों के पहले पत्र अध्याय 15:1-11 से लिया गया है जहाँ हम पाते हैं कि प्रभु येसु ख्रीस्त ने संत पौलूस को सुसमाचार की घोषणा करने के लिए चुन लिया है और जो सुसमाचार वह घोषित करता है वह उन्हें ईसा मसीह से मिला है और यह ईश्वर की कृपा है तथा इस बुलावे को क्रियान्वित करने के लिए वह लगन से परिश्रम करता है। प्रभु की कृपा से कोई भी सुसमाचार प्रचारक बन सकता है इसके लिए प्रभु का बुलावा आवश्यक है साथ-साथ जीवन में परिवर्तन या बदलाव भी जरूरी है।

प्रभु अयोग्य को भी योग्य बनाता, जो अपने आप को खाली, नगण्य करता उसे ईश्वर संपूर्ण करता है। “जाल गहरे पानी में डालो”। संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 5:1-11 में संत लूकस येसु के प्रारंभिक शिष्यों के बुलावे के बारे में वर्णन करते हुये बताते हैं कि वे व्यवसाय से मछुवारे थे। चमत्कारिक तरीके से, येसु के आदेशानुसार, "आपके कहने पर..." जाल डालने पर उन्हें अनोखा अनुभव होता है।

येसु मसीह सभी व्यवसाय में माहिर हैं पारिवारिक पेशे से बढ़ाई होते हुए भी उन्हें मछली मारने का सूत्र और मंत्र मालूम है। इससे हमें येसु सिखाते है कि वे हमारे जीवन में चमत्कार करते हैं, यदि हम उनकी सुनते हैं।

इस घटना के द्वारा उन्होंने येसु को पहचान लिया और सब कुछ छोड़ कर येसु के शिष्य हो गये और उनके पीछे हो लिये। इसके पूर्व वे किसी और व्यवसाय, धन्धे के पीछे जाते थे। अब वे येसु के पीछे जाएगें और उनकी बातों पर ध्यान देगें। ईश्वर जिनको चाहता है उनको बुलाता है किसी भी परिस्थिति में और परिस्थिति से। येसु के हस्तक्षेप के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिये। ईश्वर हमें अपने व्यवसाय के लिए कुशल और खुशहाल बनाते हैं। ईश्वर आपको भी बुला रहे हैं; क्या आप ईश्वर को एक मौका देगें?

✍ -फादर पयस लकड़ा एस.वी.डी

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Praise the Lord!

Saturday, 2 February 2019

वर्ष का ४ था रविवार: हिंदी प्रवचन (February 10, 2019)



मसीही प्रेम 

येरमियाह १:५,१७-१९ 
१ कुरिन्थियों १२:३१-१३:१३ 
लूकस ४: २१-३० 

प्रभु के  वचन में आज हम सुनते हैं संत पौलुस हम से कहते हैं - ‘‘मैं अब आप लागों को सर्वोत्तम मार्ग दिखाना चाहता हूँ।"  (१ कुरिन्थियों १२,३१) वह मार्ग क्या है? - वह मार्ग है प्रेम का मार्ग - वचन कहता है प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या  करता है, न डिंग मारता, न घमंड करता है। प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम  न तो झुँझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है। वह दूसरों के पापों से नहीं बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। वह सब कुछ ढाँक देता है, सब कुछ पर विश्वास  करता है सब कुछ की आशा  करता और सब कुछ सह लेता है’’ (1 कुरिन्थियों 13,4-7).  अक्सर  
ये सुनने को मिलता है कि बस-बस अब सहा नहीं जाता, बहुत हुआ अब।  पति पत्नि के बारे में, भाई बहन के बारे में, दोस्त दोस्त के बारे में यही कहा करते हैं। हम प्रभु येसु मसीह के प्रेम को देखें। उनका प्रेम सहनशील प्रेम हैं। उन्होंने कितना सहा उसका कोई अंदाजा नहीं है। उनका एक शिष्य  था यूदस स्कारियोति। उसके अंदर धन को लेकर इतना लालच था  और वह बहुत ही महत्वकांक्षी था। प्रभु येसु को ये मालुम था फिर भी सुसमाचार में हम पढते हैं कि प्रभु ने उसके हाथ में धन की जिम्मेदारी दी। प्रभु को मालुम था यूदस ही उन्हें पकडवायेगाा फिर भी उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में तक अपने अंतिम भोजन के समय यूदस को अपनी थाली में से लेकर रोटी खिलाई और अपना प्रेम दिखाया। कितना बडा प्रेम! कितन सहनशील प्रेम! प्रभु येसु का प्रेम दयालु प्रेम है। उन्हें करूणा का सागर कहा जाता है। सच्चा प्रेम डिंग नहीं मारता है। घमंड नहीं करता। प्रभु येसु में कोई घमंड नहीं था। मत्ती 11,28 में प्रभु येसु स्वयं कहते हैं मुझसे सिखो, मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूं। प्रभु येसु की नम्रता के बारे में फिलिपियों 2,-6-10 में हम पढते हैं कि वे ईष्वर थे और ईष्वर की बराबरी करने का उसको पूरा अधिकार था। पर उन्होंने अपने आपको दास बनाया। उन्होंने हर प्रकार के रोगी को चंगा किया। बडे बडे चमत्मार दिखाये; उन्होंने मूर्दों को जिलाया; उनके अंदर सामर्थ्य  था, शक्ति थी परन्तु कभी घमंड नहीं किया, वे नम्र थे विनीत थे। कभी डिंग नहीं मारते थे। वे लोगों के सामने अपने आपको छोटा बनाते थे। सच्चा प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। सम्मान करता  है। आज प्रेम के नाम पर कितने ही अशोभनीय  व्यवहार हो रहे हैं. प्रभु येसु ने सबों का सम्मान किया। संत लूकस19 में हम पढते हैं ज़केयुस जो कि एक पापी और बदनाम व्यक्ति था प्रभु येसु ने उसे इब्राहिम का पुत्र कहा। वे उसके घर गये और उनके यहां भोजन किया। जो भी उनके पास गया उनको उन्होंने ईष्वरीय प्रेम का एहसास दिया, सम्मान दिया। समाज से बहिष्कृत कोढियों को बडी ही नम्रता से स्पर्ष कर उन्हें चंगा किया। सच्चा प्रेम बुराई का लेखा नहीं रखता। मत्ती 18,21 में प्रभु येसु का शिष्य  पेत्रुस उनके पास आता और पूछता है कि प्रभु यदि कोई उनके विरूद्ध अपराध करता जाये तो उन्हें कितनी बार तक माफ किया जाये, सात बार तक। प्रभु उनसे कहते हैं कि सत्तर गुना सात बार माफ करना चाहिए। याने प्रभु पेत्रुस से कहा रहे हैं कि आप दूसरों के अपराधों का लेखा क्यों रखते हो? प्रभु हमारे अपराधों का लेखा नहीं रखता। और प्रभु हमारे अपराधों को नज़रअंदाज़ करता है। आगे हम पढते हैं कि सच्चा प्रेम दूसरों के पाप से नहीं उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। संत योहन 8  में हम एक पापिनी स्त्री के बारे में पढते हैं। सारे फरिसी उसके पापों को उजागर कर रहे थे। उसकी पापमय जिंदगी को उजागर कर रहे थे। परन्तु प्रभु येसु उसके पापों को ढंक देते और उससे कहते हैं - मैं भी तुम्हें दंड नही दूँगा शांति ग्रहण कर जाओ। हम तो फरसियों की तरह दूसरों की बुराईयों को जाहिर करने, दूसरों की कमियों को उजागर करने में माहीर हैं। प्रभु हमारी बुराईयों को नज़रअंदाज कर देते हैं। छोटा बना देते हैं। प्र्भु येसु के प्रेम में हम वे सारे गुण पाते हैं जो संत पौलुस के इस पत्र में बतलाए गये हैं। इस वचन के आधार पर हम अपने प्रेम को परखें। मेरा प्रेम कैसा  है? मेरे प्रेम  में कितनी सच्चाई है। आज हम प्रभु येसु मसीह से एक सच्चे प्रेम की सबक सिखें उनका पूरा जीवन एक मसीही के लिए, एक विश्वासी  के लिए एक आदर्श  हैं। एक मसीही या ईसाई  वही है जो मसीह का अनुसरण करता है और उनका अनुकरण करता है।  
अपने जीवन के अंतिम पलों में प्रभु येसु ने अपने शिष्यों  को बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी जिसे हम संत योहन अध्याय 13 से लेकर 17 तक में पाते हैं. 13,34 में प्रभु कहते हैं - 
मैं तुम लोगों को एक नयी आज्ञा देता हूँ। तुम एक दूसरे को प्यार करो जिस प्रकार मैं ने तुम लोगों को प्यार किया उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे तो उसी से लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे  हो।  संत योहन के सुसमाचार 13,4 से लेकर हम पढते हैं प्रभु येसु अपने शिष्यों  के पैर धोते हैं,. यहूदी प्रथा में यह काम एक सेवक अथवा नौकर का है। वे कहते हैं कि तुम मुझे गुरू और प्रभु कहते हो और गुरू और प्रभु होते हुए भी यदि मैं ने तुम्हारे पैर धोये हैं तो तुम्हें भी अपने भाई बहनों के पैर धोना चाहिए। इतना बडा उदाहरण देने के बाद येसु ने कहा मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ - ‘‘एक दूसरे को प्यार करो, जैसे मैंने तुम्हें प्यार किया है वैसे ही तुम दूसरों को प्यार करो। क्यों जिससे कि लोग यह जान जायें कि तुम मेरे शिष्य  हो। येसु के शिष्य  होने की पहचान क्या है? गले में क्रूस या रोज़री पहनने से कोई ईसाई बनता है?, महज बपतिस्मा ग्रहण करने से क्या कोई येसु का शिष्य  बनेगा? ईसाई नाम रख लेने से  क्या कोई येसु का शिष्य बनेगा? मसीही होने की पहचान क्या है प्रभु स्वयं हमें बतलाते हैं। तुम्हारे प्रेम के द्वारा लोग  जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। प्रेम करना कितना कठीन है। वास्तव में प्रेम एक आध्यात्मिक गुण है। और वही व्यक्ति प्रेम कर  सकता है,  प्यार कर सकता है जो आध्यात्मिक है। और यही कारण है कि जिन स्थानों में आध्यात्मिकता नहीं है। जहाँ बहुत ज्यादा भौतिकतावाद है, उपभौतिकतावाद है, जहाँ शरीर पर ज्यादा जोर दिया जाता है, सांसारिकता पर ज्यादा जोर दिया जाता है वहाँ लोग प्रेम नहीं कर पाते हैं। और न ही उनका प्रेम टिकता है। हम अक्सर  जो करते हैं वो प्रेम नहीं है, प्यार नहीं है। अंग्रजी में दो शब्द हैं - एक है लव और दूसरा है लाइक।   हम जो अधिकतर करते हैं वो है लाइक करना, हम लव नहीं करते। अक्सर जिसको हम प्यार समझ रखें हैं वो प्यार नहीं, पसंद है। हमें कोई पसंद है क्योंकि हमें उसका शरीर पसंद है; उसकी नाक पसंद है; उसका चेहरा पसंद है; उसका हाव-भाव या फिर अदायें पसंद है; उसकी आँखें हमें पसंद हैं; उसकी बोली हमें पसंद है; उसकी चाल हमें पसंद है; उसकी प्रतिभायें हमें पसंद है; उसका व्यवहार हमें पसंद हैं। अक्सर जिसे हम प्यार कहते हैं वो वास्तव में पसंद है। ईश्वर  के प्रेम और संसार के प्रेम में  क्या अंतर है? एक विश्वासी  के प्रेम और एक अविष्वासी के प्रेम में क्या अंतर है? संत मत्ती के सुसमाचार 5,46-47 में प्रभु हमें समझाते हैं - यदि तुम उन्हीं से प्यार करते हो जो तुम्हें प्यार करते हैं तो इसमें पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? गैरयहूदी भी तो ऐसा ही करते हैं। याने गैर ईसाई भी तो ऐसा ही करते हैं। और यदि तुम अपने ही भाईयों को नमस्ते करते हो तो इसमें कौन सा बडा काम करते हो? गैर यहूदी भी तो ऐसे ही करते हैं। हम अक्सर प्यार करते हैं। लेकिन किसको? अपने ही लोगों को। अपने माता-पिता को, अपने भाई-बहनों को, अपने बच्चों को, अपने रिश्तेदारों को, अपने परिजनों को, अपने गोत्र के लोगों को, अपनी भाषा या बोली वाले लोगों को। हम उनके यहाँ आना जाना करते हैं जो हमारे यहाँ आते जाते हैं। हम उनकी मदद करते हैं जो हमारी मदद करते हैं। हम उनका भला चाहते हैं जो हमारा भला चाहते हैं। हम उनको बढावा देते हैं जो हमें बढावा देते हैं। क्या यह ईश्वरीय  प्रेम है? प्रभु येसु ने कहा कि जिस प्रकार मैं ने तुम्हें प्यार किया वैसे ही तुम एक दूसरों को प्यार करो। ईष्वर ने हमें किस प्रकार प्यार किया? योहन 3,16 में हम पढते हैं - ‘‘ईष्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया ताकि जो कोई उसमें विश्वास  करे उसका विनाश  न हो बल्किा वह अनन्त जीवन प्राप्त करे। ईष्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसके लिए अपने एकमात्र बेटे को कुर्बान कर दिया। वास्तव में प्रभु येसु ने सारे संसार के लिए अपने आपको आर्पित कर दिया। इसी बात को प्रभु येसु संत योहन 15,13 में कहते हैं -  प्रे‘‘इससे बडा कोई प्रेम नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित कर दे।’’ इससे बडा कोई प्रेम हो सकता है क्या? प्रभु ने हमसे कोई मीठी बोली नहीं बोली, प्रभु ने हमें कोई संदेश  मात्र नहीं दिया। हमे प्रेम  का प्रवचन मात्र नहीं दिया, हमें उन्होंने प्रेम का सिर्फ वरदान ही नहीं दिया परन्तु उन्होंने अपने का प्रमाण अपने प्राणों की बली देकर दिया। स्तोत्र 103, 11 में वचन हम से कहता है - ‘‘आकाश पृथ्वी के ऊपर जितना ऊँचा है, उतना महान है अपने भक्तों के प्रति प्रभु का प्रेम।" प्रभु येसु बिल्कुल निर्दोष थे, उनका कोई दोष था। फिर भी उन्हें  पर चढाया गया। उन वेदना भरे क्षणों में भी उन्होंने अपने विरोधियों और अत्याचारियों को यह कह कर माफ कर दिया - हे पिता इन्हें क्षमा कर कि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। उनको सताने वाले उन पर जुल्म ढाने वालों की वे भलाइ्र्र की बात करते हैं। उन्हें दंड से व मौत से बचाने का वे पिता से निवेदन करते हैं। कितना महान प्रेम!  यदि हम अपने को ईसाई मानते हैं  तो हमें सच्चे प्रेम की राहों को अपनाना होगा , लोग हमें  नाम से नहीं हमारे जीने के तरीके से  जाने कि हम ईसाई  हैं।  लोग हम में येसु के प्यार की झलक देखें। आमेन   

Saturday, 26 January 2019

वर्ष का तीसरा रविवार 27 जनवरी 2019


नहेमिया 8,2-6.8-10
1 कोरिंथियों 12, 12-30


 लूकस ,1-4. 4,14-24

इस्राएली लोगों को प्रभु ने अपनी चुनी हुई व निजी प्रजा बना लिया था। इनके ऊपर ईष्वर ने अपना असीम प्रेम उँडेल दिया था। पर इस प्रजा ने प्रभु के प्रेम को ठुकरा दिया व पराये दावताओं की पूजा आराधना की। तब प्रभु ने अपने लोगांे को शत्रुओं के हाथों दे दिया और ये लोग करीब पचास सालों तक अपने देष, अपने मुल्क से निर्वासित होकर बाबुल देष में बंदी व गुलाम बनाकर ले जाये गये थे। वहाँ से वापस लौटने पर शास्त्री व पुरोहित एज्ऱा इन्हें प्रभु की वाणी सुनाते हैं। आज के पहले पाठ में हमने सुना कि जब धर्मग्रंथ खोला गया तो सारी प्रजा उठ खडी हुई। तब एज्ऱा ने प्रभु, महान ईष्वर का स्तुतिगान किया और सब लोगों ने हाथ ऊपर उठाकर उत्तर दिया, ‘‘आमेन, आमेन’’! इसके बाद वे झूककर मूँह के बल गिर पडे और प्रभु को दंडवत किया। ये लोग संहिता का पाठ सुन कर रोते थे। वे प्रभु की वाणी को सुनकर बहुत की भावुक हो गए थे। बडे दिनों के बाद उनके लिए प्रभु की ओर से चिट्ठी मिली थी, धर्म ग्रंथ उनके लिए ईष्वर द्वारा दिया गया एक प्रेम पत्र था जिसे पढने व सुनने को ये लोग तरस रहे थे। इस दिन के विषय में नबी आमोस ने भविष्यवाणी करते हुए कहा था -  ‘‘वे दिन आ रहे हैं, जब मैं इस देष में भूख भेजूँगा-रोटी की भूख और पानी की प्यास नहीं, बल्कि प्रभु की वाणी सुनने की भूख और प्यास’’ (आमोस 8ः11) प्रभु की वाणी सुनने के लिए भूखे और प्यासे थे। और जब प्रभु की वाणी उन्हें पढकर सुनाई गई तो वे उठ खडे हुए, हाथ खडे कर ईष्वर की आराधना की व मूह के बल गिरकर प्रभु के वचन के प्रति आदर व सम्मान दिखाया। उन्हें मूसा द्वारा कहे गये ये शब्द याद आये कि ‘‘ये तुम्हारे लिए निरे शब्द नहीं है, इन पर तुम्हारा जीवन निर्भर है।’’ (वि.वि. 32ः47)। हम दो क्षण के लिए आँखें बंद करें व अपने घरों में रखे पवित्र बाइबल को देखें, कितनी कोपियाँ है बाइबल की हमारे घरों में, वे कहाँ पर रखीं है। किस पेटी में है? ताक में है? या फिर अल्तार पर रखी है? उसके ऊपर कितनी धूल है, उसके अन्दर हमने क्या-क्या रखा है? हम खुद से आज एक सवाल पुछंे कि हम हमारे धार्मिक ग्रंथ का कितना आदर करते हैं? क्या हम प्रभु की वाणी को सुनकर भावुक हो जाते हंै? क्या प्रभु की वाणी पढते समय हमें ये लगता है कि सचमुच प्रभु स्वयं हमसे बातें कर रहे हैं। क्या प्रभु के वचन हमारे अस्तित्व को प्रभावित करते हैं? क्या प्रभु की वाणी हमारी अंतर आत्मा को चिरने वाली दुधारी तलवार की तरह हमारे अंदर प्रवेष करती है? यदि इन सब प्रष्नों का उत्तर ‘‘नहीं’’ है, तो इसका मतलब ये हुआ कि हमने प्रभु के वचन को प्रभु द्वारा हमें लिखा गया एक प्रेम पत्र नहीं माना है। प्रभु ने अपने प्रेम का  इज़हार पवित्र बाइबल के माध्यम से किया है, ठीक उसी प्रकार जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका को खत लिखता है। यदि कोई किसी को प्रेम-पत्र लिखता है और सामने वाला बदले में उससे प्रेम नहीं करता है, तो वह या तो उस पत्र को पढ़ेगा ही नहीं। यदि पढेगा भी तो जो उसमें लिखा है, वह उसे प्रभावित नहीं करेगा; उसे स्पर्ष नहीं करेगा। यदि हम पवित्र बाइबल को नहीं पढ़ते या फिर पढ़ने पर भी वचन हमें प्रभावित नहीं करता, वचन हमारे दिल को नहीं छूता है तो यह साफ ज़ाहिर है कि हमारे दिल में प्रभु के प्रति प्रेम की कमी है। यदि हम सचमुच में प्रभु से प्रेम करते हैं तो हम उनकी वाणी को सुनने के लिए तरसेंगे। शायद तेरे नाम फिल्म का यह गाना आप सबों ने सुना होगा तुम से मिलना बातें करना बडा अच्छा लगता है। जब कोई सच्चे दिल से प्रेम करता है। तो ऐसा होता है। उससे मिलना व बातें करना बडा अच्छा लगता है। क्या इस प्रकार के भाव पवित्र बाइबल पढने के लिए हमारे मन में आते हैं। जिस तरह से ये प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए ये गीत गाता है, क्या हम प्रभु के लिए ऐसे ही गा सकते हैं - ‘‘बाइबल खोलना, और वचन पढना बडा अच्छा लगता है, क्या है ये क्यों है जो भी हो हाँ मगर बडा अच्छा लगता है।’’ यदि ऐसा नहीं है तो हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि हमारे दिल में प्रभु के प्रति पे्रम की कमी है। हम प्रभु को बस दुख के समय पुकारते हैं। उस समय उनसे कहते हैं प्रभु मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तू मेरी परेषानी को दूर कर। हम घूटने टेकते हैं, मिस्सा चढाते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हंै। और फिर आफत टलने पर प्रभु को फिर भूल जाते हैं। यह कोई प्यार नहीं। यह बस धोखा है प्रभु के प्रति। लेकिन हम प्रभु को कभी धोखा नहीं दे सकते।
मंै ये सब किसी पर दोष लगाने के लिए नहीं कह रहा। परन्तु इसलिए कह रहा हूँ कि हम सब प्रभु के प्रेम को समझें। एक तरफा प्यार में कोई मज़ा नहीं। यदि प्रभु हमसे प्रेम करते हैं तो हमें भी उनसे वैसे ही प्यार करना चाहिए। और यदि हम प्रभु से सच्चे हृदय से प्यार करेंगे तो हम उनकी वाणी को सुनने, उसके वचनों को पढने के लिए तरसेंगे। प्रभु की वाणी हमारे हृदयों का स्पर्ष करेगी और हम उनकी वाणी पर कान देकर उनकी मरज़ी के अनुसार आचरण करेंगे।
विधि विवरण ग्रंथ 6ः6 में प्रभु का वचन कहता है- ‘‘जो शब्द मैं तुम्हें आज सुना रहा हूँ, वे तुम्हारे हृदय पर अंकित रहें।’’ और विवि 11ः18-21 में वचन कहता है ’’तुम लोग मेरे ये शब्द हृदय और आत्मा में रख लो। इन्हें निषानी के तौर पर अपने हाथ में और षिरोबन्द की तरह अपने मस्त्क पर बाँधे रखो। इन्हें अपने बाल- बच्चों को सिखाते रहो और तुम चाहे घर में रहो, चाहे यात्रा करो- सोते-जागते समय इनका मनन करते रहो। तुम इन्हें अपने घरों की चैखट और अपने फाटकों पर लिख दो।’’
क्योंकि ’’ये हमारे लिए निरे शब्द नहीं इन पर हमारा हमारा जीवन निर्भर है’’ (वि.वि. 32ः47)। मत्ती 4ः4में वचन कहाता है - ‘‘मनुष्य सिर्फ रोटी से नहीं जीता, वह ईष्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है।’’ प्रभु का वचन ही हमारे जीवन का वास्तविक स्रोत है। हमारे प्रोटेस्टेंट भाई-बहन शायद इस बात को हमसे ज्यादा समझते हैं। उन्हें पवित्र बाइबल के कई वचन मुह जबानी याद होते हैं। हम वचन को जितना अधिक पढेंगे, जितना अधिक उस पर मनन करेंगे, हम ईष्वर को व अपने-आपको अधिक गहराई से समझेंगे। हम हमारे जीवन का राज समझ जायेंगे; हमारे जीवन का मकसद हम पर प्रकट हो जायेगा; हम प्रभु के करीबी हो जायेंगे; हमें स्वर्ग की रोहें साफ-साफ नज़र आने लगेंगी; तब हम इस दुनियाई, खोखलेपन, भौतिक सुखों व सांँसारिक माया-मोह से ऊपर उठकर ईष्वर की व स्वर्ग की बातें सोचेंगे, हम एक अर्थपूर्ण व सच्चा मसीही जीवन जीयेंगे।
प्रभु के वचन में ही हमारा सब कुछ निहित है। एक बार चख कर तो देखो, प्रभु कितना मधूर है। (स्तोत्र 34ः8) नबी एज़ेकिएल को एक दिव्य दर्षन में प्रभु का वचन दिया गया और कहा गया -‘‘मानवपुत्र! मैं जो पुस्तक तुम्हें दे रहा हूँ, उसे खाओ और उस से अपना पेट भर लो।’’ नबी कहते हैं - ‘‘मैंने उसे खा लिया; मेरे मुँह में उसका स्वाद मधु जैसा मीठा था।’’
आईये हम प्रभु के वचन के प्रति हमारे दिलों में प्यार जगायें। रोज़ प्रभु के वचनों को हमारे घरों में पढें व उस पर मनन चिंतन करें तथा उनपर आधारित जीवन व्यतित करें। यही प्रभु की मरजी है। यही प्रभु की ख्वहीष है, हम सब के लिए। जब हम ऐसा करेंगे तो हम पवित्र कलीसिया में एक ही शरीर के अंगों के रूप में जीवन बितायेंगे। आज दूसरा पाठ हमसे कहता है कि हम सब एक ही शरीर के अंग है। हमारे शरीर के किसी भी अंग में परेषानी या पीडा होती है तो सारा शरीर उस पीडा व दर्द में भाग लेता है। वैसे ही जब हम प्रभु के वचनों पर चलेंगे, तो हमारे भाई का दर्द मेरा दर्द होगा; सिरिया में गला रेतकर मारे गये लोगों का दर्द में अपने शरीर में अनुभव करूँगा; कंधमाल में यातना सहने वाले भाईयों और बहनों की पीडा मेरी पीडा बन जायेगी। प्रभु के मार्ग से भटकते किसी भी विष्वासी की मुझे वैसे ही चिंता होगी जैसे मैं अपने स्वयं की चिंता करता हूँ। यह कलीसिया की एकरूपता व सच्चा भात्र प्रेम सिर्फ प्रभु के वचनों को पढने, सुनने व उनको हमारे जीवन में उतारने पर ही आयेगा। 

आमेन।      
  










Saturday, 19 January 2019

वर्ष का दूसरा रविवार



इसायाह ६२:१-५ 
१ कोरिंथियों १२: ४-११ 
योहन २:१-११ 
वर्ष का पहला रविवार 

प्रभु अपनी प्रजा को एक नया नाम देगा, जो उनके पवित्र मुख से उच्चारित होगा. पवित्र बाइबिल में नाम का बड़ा महत्व है।   ईश्वर के लिए नाम बहुत मायने जखता है।  उत्त्पति ग्रन्थ १७ में हम पाते हैं कि अपना  विधान अब्राम  के साथ स्थापित करते समय ईश्वर ने उसे एक नया नाम दिया - 'इब्राहिम' जिसका मतलब है राष्ट्रों का पिता।  याकूब को भी ईश्वर एक नया नाम देते हैं - इस्राएल जिसका अर्थ है - प्रभु विजयी हो।  होशिआ के ग्रन्थ १,४ में हम पढ़ते हैं - "प्रभु ने उससे कहा, उसका नाम यिज्रएल रखना;" उसी प्रकार मसीहा के विषय में भी इसायाह ने भविष्यवाणी की कि उसका नाम इम्मानुएल रखा जायेगा जिसका मतलब है ईश्वर हमारे साथ है।  वही ईश्वर हमसे यह कहता है - हे इस्राएल तेरा रचने वाला और हे याकूब तेरा सृजनहार यहोवा अब यों कहता है, मत डर, क्योंकि मैं ने तुझे छुड़ा लिया है; मैं ने तुझे नाम ले कर बुलाया है, तू मेरा ही है।" नाम लेकर बुलाने का अपना एक महत्व है।  उसने हमें हमारा नाम लेकर बुलाया है, याने वह हमें जनता है। हमें व्यक्तिगत रूप से जनता है।  यदि हमारे देश का प्रधान मंत्री मुझे नाम से जनता है तो में इसे बड़े गर्व की बात मानुगा । पर  यह तो सिर्फ एक देश का शासक है। यहाँ तो पुरे ब्रह्माण्ड का रचने वाला मुझे व्यक्तिगत रूप से जनता है।  इससे बड़ा सौभग्य और क्या हो सकता है? किसी को नाम से बुलाने में अपनेपन की भावना होती है।  जब प्रभु आज अपने वचन में हमसे कहते हैं कि वे हमें एक नया नाम देने जा रहे हैं,याने वे हमें अपनाने जा रहे हैं, हमें अपना बनाने जा रहे हैं।  हमें एक नयी पहचान देने जा रहे हैं। अपने बेटे बेटियों के रूप में एक नई पहचान देने प्रभु हमें बुला रहे हैं। जिन्हें पिता अपने बेटे बेटियाँ बनाता है वह उन्हें अपना पवित्र आत्मा प्रदान करता है। वह कहता है संत लूकस 11, 13 में वह कहते हैं कि दुनिया के माता पिता बूरे होने पर भी अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीजें¬ प्रदान कर देते हैं तो मांगने पर स्वर्गिक पिता अपने बच्चों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा। पवित्र आत्मा के द्वारा पिता हमें अपने ईष्वरत्व में सहभागी बनाता है। पवित्र आत्मा के द्वारा वह किसी को प्रज्ञा, किसी को ज्ञान के शब्द, किसी को विशवास, और किसी को रोगियों को चंगा करने का, व किसी को चमत्कार दिखाने का, किसी को भविष्यवाणी करने का तो किसी को आत्माओं की परख करने व किसी को भविष्यवाणी करने का वरदान देता है जैसा कि संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमें बतलाते हैं। संत पौलुस कहते हैं कि ईष्वर अपने बच्चों को आत्मा के विभिन्न वरदान प्रदान करता है जिससे वे सबोें के हित के लिए पवित्र आत्मा को प्रकट करे।  उसी आत्मा से भरकर प्रभु येसु अपनी सेवकाई प्रारम्भ करते हैं और गलीलिया के काना में अपना प्रथम चमत्कार दिखाते हैं। और माता मरियम उसी आत्मा की प्रेरणा से उस परिवार के लिए मध्यस्थता करती है। प्रभु जिन्हें बुलाते हैं, उन्हें इस दुनिया में अपनी भुमिका अदा करने के लिए उन्हें पर्याप्त कृपा व सामर्थ्य प्रदान करते हैं। यदि हम अपने आपको चुनी हुई प्रजा मानते हैं तो हम उसके आत्मा के वरदानों से भर जाने के लिए लालायित रहें। वह हमें अपना आत्मा प्रदान करेगा और हमें उसके राज्य के प्रचार के लिए प्रज्ञा, ज्ञान, चंगा करने की शक्ति, और चमत्कार दिखाने की शक्ति प्रदान करेंगे। जिससे हममें भी काना के विवाह की तरह लोगों की समस्याओं को ईष्वर के आत्मा के सामाथ्र्य से सुलझाने  का सामर्थ्य मिलेगा। 
आमेन।     

Saturday, 12 January 2019

प्रभु येसु का बपतिस्मा: हिंदी प्रवचन

यशायाह ४२,१-४. ६-७ 
प्रे. च.  १०,३४-३८ 
लूकस ३, १५-१६. २१-२२  
आज हम उस महान घटना की याद करते हैं जब इस दुनिया का रचने वाला सारे ब्ररह्माण्ड का मालिक यर्दन नदी में, पापियों की भीड में पापी जगत के उद्धार हेतु अपने आपको अत्यंत विनम्र बनाते हुए, योहन के सामने सिर झुकाकर बपतिस्मा ग्रहण करते हैं। हम यह जानते हैं कि योहन बपतिस्मादाता का बपतिस्मा तो पापों के पश्चाताप का बपतिस्मा था। तो फिर येसु के द्वारा वह बपतिस्मा लेने का क्या औचित्य? वे तो निष्पाप थे! संत पेत्रुस जो स्वयं उनके साथ रहे अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं - ‘‘उन्होंने कोई पाप नहीं किया और उनके मुख से कभी छल कपट की बात नहीं निकली’’ (1 पेत्रुस 2,22)। संत योहन भी इस बात की पुष्टि करते हैं - ‘‘तुम जानते हो कि मसीह पाप हरने के लिए प्रकट हुए। उनमें कोई पाप नहीं है’’ (1योहन 3, 5)।  उनके इस दुनिया में आने  का उद्देष्य यही  था कि वे निर्दोष होते हुवे भी सारी मानवजाति के पापों का बोझ अपने ऊपर ले और अपने क्रूस बलिदान द्वारा सबों को पाप व मौत से छुटकारा दे सकें।  इसलिए उन्हें यर्दन किनारे देख योहन कहता है - ‘‘देखो- ईश्वर  का मेमना, जो संसार का पाप हर लेता है’’(योहन1,36)। वही योहन प्रकाशना ग्रंथ 5,9 में कहते हैं - ‘‘तू पुस्तक ग्रहण कर उसकी मोहरें खोलने योग्य है, क्योंकि तेरा वध किया गया है। तूने अपना रक्त बहा कर ईष्वर के लिए प्रत्येक वंश, भाषा, प्रजाती और राष्ट्र से मनुष्यों को खरीद लिया है।’’ उसने अपने लहू की कीमत चुका कर पापियों का उद्धार करने, उन्हें खरीद लिया है। यर्दन का यह बपतिस्मा कलवारी पर जो पूर्ण हुआ, उसका आगाज़ मात्र था। संत लूकस 12,50 में वे कहते हैं - ‘‘मुझे एक बपतिस्मा लेना है और जब तक वह पूर्ण नहीं हो जाता मैं कितना व्याकुल हूँ।’’ यर्दन नदी में जिसका आगाज़ हुआ वो कलवारी पर पूर्ण हुआ जहाँ पर उन्होंने वास्तव में एक बलित मेमना बनकर सारे संसारे के पापों को हर लिया। संत पौलुस रोमियों 8,3 में इस प्रकार कहते हैं - ‘‘इस प्रकार ईश्वर ने मानव शरीर में पाप को दंडित किया है, जिससे हम में जो कि शरीर के अनुसार नहीं, बल्कि आत्मा के अनुसार आचरण करते हैं- संहिता की धार्मिकता पूर्णता तक पहुंच जाये।"
यहाँ एक बात गौरतबल है कि हमारी मुक्ति के इस कार्य का आगाज, उसकी शुरूआत आत्मा के अभिषेक से होती है। ईष्वर का पुत्र यर्दन नदी में डूबकी लगाकर जैसे ही निकलता है और सारे संसार के लिए प्रार्थना में लीन रहता है उसी समय स्वर्ग खुल  जाता है। कितनी महान घटना है यह! आदि काल से पापी मनुष्यों के लिए बंद स्वर्ग आज खुल गया। पिता के घर के वे दरवाज़े जो हमारे पापों के परिणाम स्वरूप बंद हो गये थे, आज खुल गये। एक नये युग की शुरूआत हो गई; उद्धार का आगाज़ हो गया। और इस शुरूआत को मुकाम तक पहुंचाने में पवित्र आत्मा के अभिषेक की ज़रूरत थी। पिता ने अपने पुत्र के ऊपर वही आत्मा उतारा जिसकी प्रतिज्ञा व भविष्यवाणी वह आज के पहले पाठ में करते हैं - ‘‘यह मेरा सेवका है मैं इसे संभालता हूँ। मैं ने इसे चुना है। मैं इस पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। मैं ने इसे अपना आत्मा प्रदान किया है।" मुक्तिकार्य को संपन्न करने के लिए येसु को पवित्र आत्मा की विषेष ज़रूरत थी। आत्मा के सामर्थ्य से ही वे शैतान के कार्यों को समाप्त करते हुए सेवकाई करते थे व सुसमाचार का प्रचार करते थे। संत लूकस 4,18 में हम पढते हैं  - ‘‘ईश्व र  का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बंदियों को मुक्ति और अंधों को दृृष्टिदान का संदेष दूँ। दलितों को स्वतंत्र करूँ और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।’’

प्यारे विश्वासियों , मुक्ति कार्य पवित्र आत्मा की शक्ति व सामर्थ्य  से ही संपन्न हुआ है और उसका प्रभाव या उसका लाभ लेने के लिए हमें भी उसी आत्मा से भर जाने की ज़रूरत है। पवित्र आत्मा के अभिषेक के बिना यह असंभव है कि कोई येसु को पहचान सके या उसे जाने व स्वीकार करें। 1 कोरिंथियों 12,3 में वचन कहता है - ‘‘कोई पवित्र आत्मा की प्रेरणा के बिना यह नहीं कह सकता ईसा ही प्रभु हैं।’’ 
जितनी ईश  पुत्र प्रभु येसु को पवित्र आत्मा की ज़रूरत थी उससे कई गुना अधिक हमें जो कि उनके अनुयाई हैं आत्मा के अभिषेक की ज़रूरत है। स्वर्गीय पिता मांगने वालों को पवित्र आत्मा देने को सदा तत्पर हैं। लूकस 11,13 में वचन कहता है  ‘‘यदि बूरे होने पर भी यदि तुम अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीज़ें देते हो, तो मंागने पर तुम्हारा स्वर्गीक पिता तुम्हें पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?’’ प्रभु ने हमें हमारी प्रार्थनाओं में धन, दौलत, शौहरत और आराम की जिंदगी मांगने को नहीं कहा, पर पवित्र आत्मा मांगने को कहा है। प्रभु येसु ने स्वयं यह ज़रूरी समझा और हमें यह आश्वासन दिया कि वे हमारे लिए पिता से पवित्र आत्मा भेजने के लिए प्रार्थना करेंगे - ‘‘मैं पिता से प्रार्थना करूँगा और वह तुम्हें एक दूसरा सहायक प्रदान करेगा जो सदा तुम्हारे साथ रहेगा, वह सत्य का आत्मा है’’ (योहन14,15)। 
पवित्र आत्मा ईश्वर  की ओर से हमें दिया जाने वाला सबसे उत्तम दान है। इसलिए सात संस्कारों में सबसे पहले हमें बपतिस्मा दिया जाता है जिसमें  हमें पवित्र आत्मा प्रदान किया जाता है। मसीही जीवन की शुरूआत पवित्र आत्मा से होती है। पवित्र आत्मा की शक्ति व साम्थ्र्य से ही प्रभु येसु मनुष्य बने, आत्मा के अभिषेक के बाद ही कलीसिया का आरम्भ हुआ। 
ख्रीस्त में प्यारे विश्वासियों  इसिलिए यदि उद्धार का  जीवन जीना है, मुक्ति के मार्ग पर चलते हुए येसु मसीह के साथ अनंत जीवन में प्रवश करना है तो पवित्र आत्मा को अपना दोस्त बना लें। रोज़ आत्मा के नये अभिषेक के लिए प्रार्थना करें। उससे भरपूर होने के लिए तरसें। आत्मा से रोज बातें करें, एक दोस्त की तरह और वह तुम्हें ‘‘पूर्ण सत्य तक ले जायेगा।’’ योहन (16,13) 
आमेन। 


Saturday, 5 January 2019

प्रभु प्रकाश का पर्व, 2019, हिंदी मनन चिंतन

प्रभु प्रकाश  का पर्व, 2019

पहला पाठ इसायाह 60,1-22
दूसरा पाठ एफे. 3,1-13
सुसमचाचार मत्ती 2,1-12 

दुनिया की सबसे बडी समस्या क्या है? आतंकवाद? जनसंख्या वृद्धी? भ्रष्टाचार? बलात्कार? गरीबी? या फिर हत्या? ये सब अपने आप में बडी समस्यायें तो है, पर मैं इन में से किसी को भी बडी समस्या नहीं मानता हूँ। क्योंकि इन सबसे परे है एक समस्या है, जो बाकि सब समस्याओं की जनक है। और वह समस्या है - ‘‘ईश्वर  विहीनता’’। यह वह परिस्थिति है जिसमें हमारे आदि माता-पिता ने अपने प्रथम पाप के बाद प्रवेश  किया। ईश्वर  की योजना में तो ईष्वर ने इंसान को अपने साथ, अदन वाटिका में रहने के लिए बनाया था। उत्पत्ति ग्रंथ 3,8 में हम पढते हैं कि आदम और हेव्वा को बाग में टहलते ईष्वर की आवाज सुनाई पडी। पर पाप ने मनुष्य को ईष्वर की उपस्थिति से दूर कर दिया। यह पाप का परिणाम है। यह मृत्यु का अनुभव है। रोमियो 6,23 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘पाप का वेतन मृृत्यु है’’ यहाँ मौत के मायने खत्म हो जाना नहीं परन्तु अलग हो जाना है। कई बार लोग आपसी लडाई में बोलते हैं - तू मेरे लिए मर गया और मैं तेरे लिए। मरता कोई नहीं है बस आपसी संबंध तोडकर वे अलग हो जाते हैं। उत्पत्ति 3,3 में प्रभु ने आदम-हेवा से कहा कि वे वाटिका के बीच के पेड का फल न खायें क्योंकि यदि वे उसे खायेंगे तो वे मर जायेंगे3,6 में दोनों ने मौत के फल को खाया और वचन 23 में क्या होता है? वे प्रभु की उपस्थिति से दूर कर दिये जाते हैं । वे अदन वाटिका से बेदखल कर दिये जाते हैं। वे ईष्वर विहीन जीवन जीने के लिए छोड दिये जाते हैं।  वे ईष्वर से दूर एक ऐसे संसार में आ जाते हैं, जिसके विषय में आज का पहला पाठ कहता है - ‘‘पृृृथ्वी पर अंधेरा छाया हुआ है, और राष्ट्रों पर घोर अंधकार।" यह पाप, अज्ञानता, और बुराई का अंधेरा है। यह शैतान के राज्य का अंधेरा है जिसके आगोष में यह संसार  जी रहा है। प्रकाश की अनुपस्थिति ही अंधकार है। जहाँ ज्योति नहीं है वहाँ अंधेरा है। संत योहन 8, 12 मैं प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ। जो कोई मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी।’’ पहले पाठ इसा. 60,20 में प्रभु का वचन कहता है - तेरा सूर्य कभी अस्त नहीं होगा, क्योंकि ईष्वर ही तेरा सदा बना रहने वाला प्रकश  होगा। यह वादा ईष्वर ने अपनी चुनी हुई जाती इस्राएल के लिए किया था। ऐजे. 37,27 में वही यहोवा ईष्वर उनसे कहता है - ‘‘मैं उनके बीच निवास करूंगा, मैं उनका ईष्वर होऊंगा और वे मेरे प्रजा होंगे।’’ इस्राएली प्रजा का मानना था कि वे एक विषिष्ट प्रजा है जो ईष्वर द्वारा अपनी निजी प्रजा के रूप में चुनी गई हैं; ईष्वर ने नबियों और पूवर्जों द्वारा अपने आपको उन पर प्रकट किया, उन्हें अपना संदेष दिया कि वह उनका उद्धार करेगा। इसलिए वे गैरयहूदी जातियों को घृणित व तुच्छ मानते थे तथा उन्हें उद्धार से दूर मानते थे। 
परन्तु प्रभु येसु ने अपने देहधारण द्वारा अथवा अपने जन्म के द्वारा इस भ्रांति को दूर कर दिया। आज हम उस महान घटना को याद कर रहे हैं जब उन्होंने तीन गैर यहूदी ज्ञानियों पर अपने आप को प्रकट किया, अपने को प्रकाशित किया और यह साबित कर दिया कि वे केवल इस्राएलियों  के लिए नहीं वरन् हर इंसान के लिए आये हैं। 
आज का दूसरा पाठ ऐफे.3,1-13 में इस बात को स्पष्ट करता है - ‘‘सुसमाचार के द्वारा यहूदियों के साथ गैरयहूदी एक ही विरासत के अधिकारी है, एक ही शरीर के अंग हैं और ईसा मसीह - विषयक प्रतिज्ञा  के सहभागी।’’ 
इसलिए जो कोई भी उन ज्योतिषियों की तरह मुक्ति को तलाशते हैं, अथवा ईष्वर को खोजते हैं वे उसे प्राप्त करेंगे; वे अंधकार से प्रकाश में आ जायेंगे। तब वे मृृत्यु से  जीवन में आ जायेंगे - वे संसार के सारे बंधनों से मुक्त हो जायेंगे। वचन कहता है संत योहन 12, 32 में - ‘‘यदि तुम मेरी शिक्षा पर दृढ़ रहोगे, तो सचमुच मेरे शिष्य सिद्ध होंगे। तुम सत्य को पहचान जाओगे और सत्य तुम्हें स्वतंत्र कर देगा।’’ 
आज सारे संसार की ज्योति प्रभु येसु सारी मानव जाती के उद्धार के लिए प्रकट हो गये हैं। संत मत्ती 4,15-16 में वचन कहता है - ‘‘अंधकार में रहने वाले लोगों ने एक महत्ती ज्योति देखी है, मृत्यु के अंधकारमय प्रदेष में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है।’’ प्रभु येसु हमें मृत्यु के अंधकार से बाहर निकालकर ईष्वरीय उपस्थिति में ले जाने इस संसार में आये हैं। हमें हमेशा की 
ईश्व्रर रहित जिंदगी जो कि अनंत मृत्यु है, से बाहर  निकाल कर अपने साथ स्वर्ग ले जाने  आये हैं। 
हम उस ज्योति को खाजते हुए उसके पास जायें। वचन कहता है - "जब तुम मुझे ढूंढोगे तो मुझे पा जाओगे, यदि तुम मुझे सम्पूर्ण हृदय से ढूंढोगे तो मैं तुम्हें मिल जाऊंगा’’ (यरि. 29,13)।  हम प्रभु को पूरे दिल से खोजें और वह हमें मिल जायेगा। और हमें अंधकार से अपनी स्वर्गिक ज्योति की ओर ले जायेगा, हमें मृत्यु से जीवन की ओर तथा ईष्वर विहिन जिंदगी से अपनी पावन उपस्थिति में ले जायेगा। आमेन। 

प्रभु की स्तुति हो प्रभु येसु को धन्यवाद।