Saturday, 15 April 2017

पास्का पर्व , 2017

मेरे प्रिय भाईयों बहनों आज की पूजनविधि में  हम प्रभु के पुनरूत्थान पर मनन चिंतन करेंगे। योहन  11,33 में वचन कहता है - पुनरूत्थान और जीवन मैं हूँ। .......
हमने बीते दिनों में प्रभु येसु के दुखभोग एवं मरण की यादगारी मनाई। उनकी मृत्यु के बाद  उनके कुछ शिष्यों  ने उनकी पवित्र लाश  उतारी और उन्हें कब्र में रख दिया। प्रभु येसु के विरोधियों ने उनकी कब्र पर बडा सा पत्थर रखकर उस पर मूहर लगा दी यह सोचकर कि इसने पहले से कहा था कि वह तीसरे दिन जी उठेगा। न जाने कब उन के शिष्य आयेंगे और इसकी लाश  को ले जायेंगे। प्रभु के विरोधियां ने सोचा सारी कहानी का अंत वहां हो गया। सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन हम प्रेरित चरित  2, 24 में हम पढते हैं, जहां संत पेत्रुस कहते हैं  - ‘‘ ईश्वर  ने मृत्यु क बंधन खोलकर उन्हें पुनर्जीवित किया। यह असंभव था कि प्रभु येसु मृत्यु के वश  में रहे।’’ मृत्यु के अधीन, उसके अधिकार में उसके बंधन में रहना प्रभु येसु के लिए असंभव था।

प्रभु येसु के शिष्यों के अंदर भी डर था। और इसिलिए वे लोग भी सोच रहे थे कि सारी कहानी खत्म हो गई है, और वे जाकर एक कमरे में अपने-आप को बंद कर के छिप गये। अपने आप में ग्लानी महसूस कर रहे थे। अपने किये कार्यों पर ग्लानी व दुःख महसूस कर रहे थे कि दुखित क्षणों में हमने प्रभु को छोड दिया। हमने प्रभु का तिरस्कार किया। सबों पर उदासी छायी हुई थी। सब डरे हुए थे एक बंद कमरे में, मानो वे मरे हुए थे। 

संत योहन 20, में हम पढते हैं उनके बंद कमरे में पुनर्जिवित प्रभु येसु प्रवेश करते  हैं। और पुनर्जिवित प्रभु येसु का सामर्थ्य उस कमरे में भर जाता है। उनका प्रकाश  उस कमरे में भर जाता है। उनका जीवन उस कमरे में भर जाता है। इस तरह 2 तिमथी 1,10 में वचन कहता है - ‘‘ईसा ने मृत्यु का विनाश किया और अपने सुसमाचार के द्वारा अमर जीवन को अलोकित किया है।’’ जो शिष्य डरे हुए थे, असुरक्षा मसूस कर रहे थे कमरे में बंद थे, उन में प्रभु येसु ने एक नये जीवन का संचार किया। वे मरे -मरे थे उन पर प्रभु येसु ने जीवन का संचार किया। उनके उपर जो ग्लानी की भावना थी दुख से भरे थे, उन्हें प्रभु येसु ने आनन्द से भर दिया। जैसे कि एक पौधा, जो पानी के आभाव में मुरझा रहा हो, सूखने-सूखने को हो और अचानक उसे पानी किल जाए तो  वह फिर से खिल उठता है। हरा-भरा हो जाता है वैसे ही प्रभु के  शिष्यों में नई जान आ जाती है।

हम सुसमाचार में पढते हैं कि प्रभु येसु के प्रिय  शिष्याओं  में से एक मरियम मगदलेना और कुछ नारियां प्रभु येसु की कब्र की ओर जाती है। प्रातः का समय था वे आपस में सोच रहे थे कि हमारे लिए कौन कब्र को खोल देगा ताकि हम उनकी लाश  पर इत्र लगाएं। और ऐसा सोचते हुए वे कब्र के पास जा रही थी, सुसमाचार हमें बताता है कि जब वे वहां पहुंचती है तो कब्र खुली हुई थी। मरियम दौड कर आयी पेत्रुस और योहन को बुला लाई उन्होंने भी देखा कि कब्र खुली है और येसु की लाश  उसमें  नहीं है। और वह वहीं खडी रह गई और रोने लगी। तो स्वर्ग दूतों ने पूछा नारी क्यों रोती हो। उसने कहा कि क्योंकि वे मेरे गुरू की लाश  को ले गए हैं और  मैं नहीं जानती कि वह कहां है। बाद में प्रभु येसु स्वयं उससे पूछते हैं, नारी तुम क्यों रोती हो! और वह वही जवाब देती है। अंत में प्रभु येसु उन्हें नाम लेकर उसे पुकारते हैं "मरियम " और मरियम प्रभु येसु को पहचान लेती है। पुनर्जीवित प्रभु येसु का सामार्थ्य उसके अंदर प्रवेश  कर जाता है।

इस तरह हम देखते हैं कि सुसमाचार में पढते हैं कि करीब चालिस दिनों तक प्रभु येसु अपने शिष्यों के साथ रहे और उनको बार-बार विविध रूपों में दर्शन  देते हुए इस बात का अनुभव करा रहे थे कि देखो मैं मर गया था लेकिन अभी जी गया हूँ। जैसा कि प्रकाशना 1 :18 ग्रंथ में हम पढते हैं - ‘‘जीवन का स्रोत मैं हूँ। मैं मर गया था और देखो, मैं अनन्त काल तक जीवित रहूँगा। मृत्यु और अधोलोक की कुंजियां मेरे पास है।  तो इस प्रकार करीब चालिस दिन तक प्रभु येसु ने बारम्बार अपनेशिष्यों को दर्शन  देकर इस बात का अनुभव कराया कि वे  जीवित हैं  और पुनरूत्थान पर उनका विश्वास  दृढ करवाया। और उनका जीवन परिवर्तित हो गया। 

प्रभु येसु के पुनरूत्थान ने उनके जीवन को परिवर्तित कर दिया। उनका जीवन दर्षन ही बदल गया। जीवन को देखने का नज़रिया बदल गया। उनके लिए जीवन का एक नया रास्ता खुल गया। और प्रभु के पुनरूत्थान का अनुभव इतना गहरा था कि हमें वचन बताता है कि वे जाकर प्रचार करने लगे।  फिलिपियों 3,10 में संत पौलुस कहता है - "मैं यही चाहता हूं कि येसु मसीह को जानूं और उनके पुनरूत्थान के सामार्थ्य का अनुभव करूं।’’
संत पेत्रुस प्रे. च. 2, 23-24 में प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देते हैं। यह पहला उपदेश  था और प्रभु के शिष्यों का  पहला प्रचार। उनके उपदेश की विषय-वस्तु और केंद्र प्रभु का पुनरूत्थान था। वे पुनर्जीवित प्रभु का गहरा अनुभव लोगों के साथ बांटते हैं। प्रे. च. 4, 35 में हम पढते हैं - प्रभु येसु के शिष्य बडे सामार्थ्य के साथ प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देते थे और उन पर बडी कृपा बनी रहती थी। जब हम भी पुनर्जीवित येसु का साक्ष्य देंगे हम पर भी प्रभु की कृपा बनी रहेगी।

 हम ईसाईयों को चाहिए कि हम पुनर्जीवित मसीह का साक्ष्य देंवे। कभी-कभी देखने में आता है कि हम प्रभु मसीह के क्रूस पर बलिदान तक ही अपने साक्ष्य को सीमित रखते हैं। और प्रभु येसु के बलिदान के बारे में हम साक्ष्य देते हैं। पर सच्चे  मसीही वो हैं जो प्रभु येसु के पुनरूत्थान के बारे में साक्ष्य देते हैं। आज गैर ख्रीस्त  से भी यदि हम पूछें कि आप ईसा मसीह के बारे में क्या जानते हैं तो वे बतायेंगे कि उन्होंने सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम व क्षमा के मार्ग की न केवल शिक्षा  दी परन्तु अपने जीवन में उसे आत्मासात भी किया। उन्होंने क्रूस पर मरते समय भी अपने विरोधियों को क्षमा दी आदि। पर बहुत ही विरले हम उनके मुख से प्रभु के पुनरूत्थान के बार में सुनेंगे। क्यों? क्यों लोग प्रभु के पुनरूत्थान से अनभिज्ञ है? क्योंकि हम पुनर्जीवित प्रभु का साक्ष्य नहीं देते।    1 कुरिं 15,17 में वचन कहता - ‘‘यदि येसु मसीह का पुनरूत्थान नहीं हुआ है तो हमारा विश्वाश  व्यर्थ है।’’ हम मसीहियों के विश्वाश  का आधार है प्रभु येसु का पुनरूत्थान। हम किसी मरे हुए व्यक्ति की आराधना नहीं कर रहे हैं। हम पत्थरों अथवा मूर्तियों की नहीं,  हम एक ज़िदा खुदावन्द की आराधना करते हैं।  हम पुनर्जीवित येसु मसीह की आराधना करते हैं। जितनी यह बात  हमारे जीवन मजबूत होती जायेगी उतना आधीक हम प्रभु येसु के जीवन  का अपने जीवन में अनुभव करने लगेंगे। तो हम हर मसीही पुनर्जीवित येसु के साक्षी हैं। और हमें प्रभु येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देना है।

यह साक्ष्य हमें  हमारे कर्मों एवं वचनों दोनों से देना है। हमें पुनर्जीवित मसीह की घोषणा करना है। हमें लोगों को यह बतलाना है कि हमारा प्रभु जिंदा खुदा  है। और अपने कर्मों द्वारा भी यह दिखलाना है कि हमारा प्रभु हममें, हमारे अन्दर, हमारे जीवन में जिंदा है। गलातियों  को लिखे  पत्र 
2 :20 में  में संत पौलुस कहते हैं - ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर मर गया हूँ। मैं अब जीवित नहीं रहा, बल्कि मसीह मुझ में जीवित है।’’ पुनर्जीवित मसीह मुझमें जीवित है। वो मेरे अंदर कार्य कर रहा है। वो मेरे अंदर अपने राज्य के फल उत्पन्न कर रहा है। कब्र से निकलकर वो मेरे जीवन में समाहित हो गया है। हम सब संत पौलुस के साथ आज यही बोलें - मुझमें अब से येसु जिंदा है। मेरा प्रभु मुझमें ज़िंदा है. मसीह का जीवन मुझमें मुझमें है।  मसीह का खून मेरे रगों में बह रहा है.  और यदि मसीह मुझमें जीवित है तो फिर मेरे कार्य, मेरी बातें, मेरा व्यवहार और मेरे विचार भी मसीह की तरह ही होना चाहिए। प्रभु का पुनरूत्थान मनाते समय यही भावना और यही घोषणा हम सब की होनी चाहिए। आमेन।

Saturday, 8 April 2017

Introduction for Palm Sunday Liturgy in Hindi

दुःखभोग अथवा खजूर रविवार


आज से वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पुण्य सप्ताह आरंभ होता है। विशेषकर अगला गुरूवार, शुक्रवार, शनिवार तथा रविवार वर्ष-भर में सबसे पवित्र दिन हैं। इन दिनों में घटी मानव इतिहास की सबसे मुख्य व केंद्रिय घटना ईशपुत्र येसु मसीह के दुःखभोग, मरण एवं पुनरूत्थान को माता, कलीसिया पुनः हमारे सामने रखती है। हम ख्रीस्तीय न केवल इन घटनाओं को ही देखें, परन्तु प्रार्थना तथा दृढ़निश्चय के साथ पूरी तरह उनमें सक्रिय रूप भाग लें।
आज का दिन प्रभु के दुःखभोग का खजूर रविवार कहा जाता है। हम पवित्र सप्ताह केवल प्रभु येसु मसीह की येरूसालेम यात्रा के ही कारण नहीं, वरन् उनके मनुष्य रूप में आने के उद्देश्य याने उनके दुःखभोग,मरण और पुनरूत्थान के कारण ही मनाते हैं। बेथानिया से जुलूस में राजा अपने राजाभिषेक एवं गद्दी पर बैठने येरूसालेम आये,परन्तु इस राजा का मुकुट काँटों का मुकुट है और उसकी गद्दी क्रूस है।

आज की प्रार्थनाएँ, भजन, पाठ तथा क्रियाएँ, यह सब बताती हैं कि हम सबके सामने प्रभु के प्रति अपना विश्वास व श्रद्धा प्रकट करते हैं। हम अपने उस राजा के साथ जुलूस में जाते हैं जिन्होंने हमारे लिए एक घमासान लड़ाई लड़ी। इसीलिए खजूर, जो विजय का चिह्न है, अपने हाथ में लेकर हम जुलूस निकालते हैं।

आज की धर्म-विधि में सब से पहले खजूरों को आशिष दी जाती है।तब पवित्र सुसमाचार से प्रभु येसु के येरूसालेम प्रवेश का वर्णन पढ़ा जाता है।
सचमुच हम आज भी उसी येसु मसीह के जुलूस में जाते हैं जिनके साथ उस पहले खजूर रविवार के दिन यहूदी लोग गए थे। येसु हमारे बीच तीन प्रकार से उपस्थित हैं-क्रूस पर चिन्ह के रूप में, उनके प्रतिनिधि पुरोहित के रूप में और हम सब के रूप में जो उनके नाम पर यहाँ एकत्रित हुए हैं।

यह जुलुस हमारे उस अंतिम जुलूस की निशानी है जिसमें हम प्रभु येसु के साथ स्वर्गीय येरूसालेम में सदा के लिए प्रवेश करेंगे।

अब हम उस प्रथम खजूर रविवार की याद करें जिस दिन प्रभु येसु मसीह स्वयं अपने शिष्यों के साथ बेथानिया से येरूसालेम गये थे। वे क्यों वहाँ गए? राजा बनने? किसी भी हालत में, सांसारिक राजा बनने नहीं।
उनका मुकुट काँटों का मुकुट था। वे हमारे लिए दुःख भोगने और मर जाने के लिए गए और अपने इस घोर दुःखभोग एवं मरण द्वारा पुनरूत्थान के लिए गए। हमारी मुक्ति उनका अनुसरण करने पर निर्भर है, यदि हम उनके साथ जी उठना चाहते हैं तो हमें उनके साथ मरना भी है। इसीलिए आज की मिस्सा की पहली प्रार्थना में हम इस प्रकार निवेदन करते हैंः-
‘‘उनके दुःखभोग के अनुसार चलने पर हमें उनके पुनरूत्थान के भी भागी बना दें।’’

खजूर की डालियों के साथ भजन गाते हुए हमारा जुलूस, आज की मिस्सा का प्रवेश गान है। मिस्सा हमें कलवारी पहाड़ी पर हुए मुक्ति कार्य की याद दिलाती व उसे सांस्कारिक चिन्हों के रूप में सजीव करती है, जबकि खजूरों के साथ जुलूस, मुक्तिदाता के पुनरूत्थान का विजय-स्मृति चिन्ह है। घर जाकर हम अपनी खजूर की डालियाँ आदर के साथ कमरों में लगे क्रूस पर लगा देंगे क्योंकि उन्हें धर्म-मण्डली की विशेष आशिष मिली है। वहाँ से ये हमें प्रभु येसु के प्रति अपनी भक्ति व श्रद्धा की याद दिलाती रहें।
पास्का का अपना पाप-स्वीकार हमें पुण्य बृहस्पतिवार के मिस्सा के पूर्व ही करना चाहिए। शनिवार तक ठहरना पवित्र सप्ताह की कृपाओं से अपने आप को वंचित रखना होगा।

खजूर रविवार, २०१७ का प्रवचन



इसायाह ५०, ४-७
फिलिपियों २,६-७
मत्ती २६, १४-६६

येसु का येरूसलेम में प्रवेश  करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह यहूदियों के पास्का पर्व का समय था। प्रभु येसु येरूसलेम में प्रवेश  करते हैं क्योंकि उनका समय आ चुका था। 21 मार्च 2017 को न्युयाॅर्क के एक यहूदियों के प्रार्थना गृह में बम होने की अपवाह के बाद उस प्रेमिस से प्री-सकूल के बच्चों को आनन-फानन में सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। इस प्रकार की कई घटनाओं के बारे में हम पढते और सुनते हैं। कहीं तुफान अथवा भूकम्प की से बचने के लिए लोग अपने घरों को अपने आशियांनों को छोडकर सुरक्षित स्थानों पर जाते हैं तो कहीं आतंकियों या फिर विरोद्धी सेना से बचने के लिए सुरिक्षत स्थानों को तलाशते हैं। क्योंकि हम सब मौत से डरते हैं। हम मरने से डरते हैं। कोई ज़्याद तो कोई कम, पर मौत से डर हर-किसी को लगता है। साधरणतः सभी अपने जीवन को सुरक्षित रखना चाहते हैं। हम जीना चाहते हैं। हम नहीं जानते कि हम कब तक जीयेंगे पर जीवन से हमें प्रेम है। परन्तु प्रभु येसु इस संसार में इस लिए आये कि वे मारे जायें। वो मौत को गले लगाकर मौत को हराने के लिए इस संसार में आये। वे इसलिए आये कि उनके मारे जाने से हमें जीवन मिले। उन्होंने मरना स्वीकार किया ताकि हम जीवित रहें।
वे इस मौत को एक मज़बूरी के तौर पर नहीं, परन्तु पिता की मर्जी व उसकी को योजना को पूर्णता तक पहुुँचाने के लिए स्वीकार करते हैं। उनके जीवन का मकसद ही यह था कि वो अपने स्वर्गीक पिता की इच्छा को पूरा करे। संत योहन 4, 34 में वे कहते हैं - ‘‘जिसने मुझे भेजा है उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है।’’ पिता की इच्छा को, पिता की मरजी़ को, पिता की चाह को पूरा करना ही प्रभु येसु का भोजन था। पिता की इच्छा क्या थी? संत पौलुस हमें बतलाते हैं रोमियों 3, 25 में - ‘‘ईश्वर ने चाहा कि ईसा अपना रक्त बहा कर पाप का प्रायष्चित करें और हम  विश्वास  द्वारा उसका फल प्राप्त करें।’’ यह है पिता ईश्वर  की इच्छा। प्रभु येसु अपने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए व्याकुल थे। संत लूकस 12,50 में प्र्रभु कहते हैं - ‘‘मुझे एक और बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ।" हम सब जानते हैं कि प्रभु येसु ने अपनी सेवकाई प्रारम्भ करने के पहले यर्दन नदी में योहन बपतिस्ता से बपतिस्मा लिया था जो कि जल का बपतिस्मा था। अब वे रक्त का बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए व्याकुल थे। एक ऐसा बपतिस्मा जो सारे संसार के पापों की क्षमा के लिए वे लेने वाले थे। वे इस दुनिया के, व सारी मानव जाती के नये पुराने सब पापों को सूली पर अपना खून बहाकर माफ करने वाले थे। व सबके पापों का दाम चुकाने वाले थे। इस पवित्र बलिदान के द्वारा वे पिता से हम  सब का पुनः मेल कराने वाले थे। सारी कायनात के उद्धार को संपन्न करने वाले थे। एक महान बलिदान देने वाले थे। इसलिए जब समय पूरा हुआ तो वे अपने इस अंतिम मिशन  की ओर चल पडते हैं। योहन 13, 1 में हम पढते हैं - ‘‘ईसा जानते थे कि मेरी घडी आ गयी है और मुझे यह संसार छोडकर पिता के पास जाना है। वे अपनों को, जो इस संसार में थे, प्यार करते आये थे और अब अपने प्रेम का सब से बडा प्रमाण देने वाले थे।’’ आज हम उस दिन की याद करते हैं जब प्रभु अपने प्रेम का सब से बडा प्रमाण देने के लिए येरूसलेम की ओर बढते हैं। हमारे प्रति पिता के प्रेम का सबूत देने के लिए वे उस नगर में प्रवेश  करते हैं जहाँ उनके प्राणों के दुश्मन उन्हें  क्रूरतापूर्वक मार डालने की योजनायें बना रहे थे।
आज प्रभु येसु, सुसमाचार की सच्चाई को अपने आपमें धारण करते हैं और उसकी घोषणा करते हैं। उन्होंने अपने षिष्यों से कहा था - ‘‘जब तक गेहूं  का दाना जमीन पर गिरकर मर नहीं जाता वह तब तक अकेला रहता है, पर जब वह मर जाता है तब वह बहुत फल उत्पन्न करता है।’’ येसु स्वयं वह बीच है जो येरूसलेम की उस प्रचीन भूमि पर गिरा। ये वही गेंहूँ का दाना है जो मरकर बहुत फल उत्पन्न करता है, जो मुक्ति के फल उत्पन्न करता है। अतः मानवों की मुक्ति के लिए उनका मरना आवश्यक  था ।
हम हमारी मृत्यु से दूर भागते हैं। परन्तु प्रभु येसु अपनी मौत को ख़ुशी  से गले लगाने के लिए येरूसालेम में प्रवेश  करते हैं। वे मौत के भय से पीछे नहीं हटते। क्योंकि वे अपनी मौत की कीमत जानते थे। वे जानते थे कि उनका हर दुख, हर दर्द, हर एक कोडों की मार, उनका हर घांव, काटों वो ताज, और हाथ पैरों की वो कीलें ये सब मानव के पापों की मुक्ति के लिए आवश्यक  हैं। प्रभु येसु के लिए अपने मानवीय जीवन से महान है पापी आत्माओं का उद्धार।
प्रभु येसु स्वर्ग के राज्य की स्थापना करने के लिए इस जहान में आये थे। जब यर्दन नदी में अपने बपतिस्मा के बाद उन्होंने सुसमाचार का प्रचार प्रारम्भ किया उनका पहला सन्देश यही था। पश्चाताप करो, स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। विभिन्न कहानियों एवं दृष्टांतों द्वारा वे इस राज्य के बारे में लोगों को समझते रहे। पर लोग उन्हें सही अर्थों में समझ नहीं पाये। क्योंकि ईश्वर  का राज्य संसार के राज्यों और ईश्वर  का शासन सांसारिक राजाओं के शासन से बहुत ही भिन्न है। यह हिंसा एवं खुन खराबे के साथ सत्ता हासिल करने वाला राज्य नहीं। यह निर्बलों पर निरंकुष शासन करने वाला राज्य नहीं। यह गरीबों और बेसहारों का शोषण करने वाला राज्य नहीं। परन्तु यह है विनम्रता, अंहिसा, प्रेम, दयालुता और क्षमा का राज्य। दुनिया के राजा अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए हथियार बंद सेनाओं के साथ अपने दुष्मनों पर चढाई करते हैं। पर आज सारी दुनिया का राजा निहत्थे ही महज बारह अनुयायों के साथ पूरे संसार पर विजय पाने चल पडा है। उनको रथ, घोडों अथवा पालकी की ज़रूरत नहीं क्योंकि उनका राज्य इस दुनिया के दिखावटी वैभव पर टिका हुआ नहीं है। ये विनम्रता का राज्य है इसलिए उनके लिए एक तुच्छ समझा जाने वाला जानवर, गधा ही काफी था। वे गधे की सवारी करते हुए, विनम्रता का पाठ पढाते हुए वे येरूसलेम की ओर निकल पडे हैं। आज के दूसरे पथ में संत पौलुस हमें बताते हैं - "उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया है। और मनुष्यों का रूप धारण करने के बाद वह मरण तक, हाँ क्रूस के मरण तक, आज्ञाकारी बन गये ओर इस प्रकार उन्होंने अपने को और भी दीन बना लिया है। इसलिए ईश्वर  ने उन्हें महान बना दिया है।"
जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया है कि ये सब उस समय सम्पन्न होता है जब यहूदी लोग अपना वार्षिक पास्का पर्व मनाने पवित्र नगरी येरूसलेम आते हैं। यह पर्व मिस्र देश  से उनकी आज़ादी की धार्मिक यादगारी पर्व है जब ईश्वर  ने उन्हें मेमने के रक्त के चिन्ह द्वारा दूत की तलवार एवं फिराऊँ की गुलामी से बचाया था। ये उनकी मुक्ति का पर्व था। नये विधान का मेमना, प्रभु येसु शैतान रूपी फिराऊँ और पाप रूपी मिस्र से सारी मानव जाती को छुडाने के लिए इसी समय को चुनता हैं। हज़ारों यहूदी तीर्थ यात्रा करते हुए येरूसलेम पहुंच रहे थे। उसी बीच गधे पर सवार यहूदियों का राजा येरूसलेम की ओर बढ़ता है। तीर्थ यात्री उनके सामने रास्ते पर अपने कपडे बिछाते एवं जैतुन की डालियां लहराते हुए अपने राजा का स्वागत करते व भजन गाते हुए कहते हैं - होसन्ना, होसान्ना, होसान्ना, धन्य है वह जो प्रभु के नाम पर आते हैं स्वर्ग प्रभु को होसान्ना!!!
आज हम प्रभु येसु के साथ उस भीड में  उनके पीछे-पीछे येरूसलेम की पवित्र नगरी मेंप्रवेश  करें। आज से हम पवित्र सप्ताह का आरम्भ कर रहे हैं। यह वास्तव में अति पवित्र सप्ताह है। यह वह मुल्यवान समय है जब हमारी मुक्ति का कार्य सम्पन्न हुआ। विभिन्न प्रकार के लोग इस भीड मे प्रभु के साथ येरूलेम में प्रवेश  कर रहे हैं। हम भी इस भीड के साथ पवित्र नगरी मेंप्रवेश  करें। और हमारी मुक्ति के उन मुल्यवान पलों को हमारे जीवन में जिंदा करें। सैकडों की भीड जो आज होसान्ना गा रही है, जो आज प्रभु की तारीफ कर रही है, तीन दिनों के बाद - इसे क्रूस दो, इसे क्रूस दो कह कर चिल्लाएगी। तीन सालों तक उनके करीब रहकर उनके वचनों को सुनने वाले व चिन्ह और चमत्कार देखने वाले शिष्य  भाग खडे होंगे, सबसे भरोसेमंदशिष्य  पेत्रुस, याकूब और योहन गेथसेमनी की प्राणपीडा के समय प्रार्थना करके उन्हें ढाढस बंधाने की जगह, सो जायेंगे। पिलातुस उन्हें निर्दोष मानकर रिहा करने का मन बनाने पर सारे यहूदी नेता और भीड उनके विरूद्ध एक स्वर में उन्हें क्रूस देने की गुहार लगाएंगे। उनके साथ मर जाने की बात कहने वाला पेत्रुस उन्हें पहचानने तक से इनकार कर देगा। उनका ही करीबी मित्र चाँदी के चंद सिक्कों के बदले उन्हें बेच देगा। झूठादोषारोपण, अन्यायपूर्ण दंड़, सैनिकों की क्रूरता, उनके द्वारा किया गया अपमान, सब के द्वारा ठुकराया गया एक अभागे इंसान से येसु कलवारी के पहाड़ पर मुक्ति का महायज्ञ सम्पन्न करने जा रहे हैं। उनके इन अत्यंत दुःखमयी पलों में उनकी प्यारी माँ मरिया, कुछ धार्मिक स्त्रियाँ, संत योहन, अरिमिथिया का युसूफ एवं निकोदेमुस उनके आस-पास रहते हैं। जब हम प्रभु के साथ मुक्ति के इन पलों को मनाने जा रहे हैं तो हम अपने आप से पुछें कि मैं किसका किरदार अदा करने जा रहा हूँ? उस धोखेबाज भीड का जो कभी होसन्ना तो कभी क्रूस देने की बात कहती है? या उन शिष्यों  का जो डर के मारे उन्हें छोडकर भाग खडे होते हैं अथवा उन्हें पहचाने से भी इनकार कर देते हैं? या फिर उन सैनिकों का जो अपने ही प्रभु ईश्वर पर हाथ उठाते हैं, जो अपने ही मुक्तिदाता पर कोडे बरसाते हैं? या फिर माता मरियम, धार्मिक नारियों एवं संत योहन का जो कि प्रभु के इन असहय दुखों की घडी में उनके साथ रहे व उनके दुखों में भागीदार हुए? या फिर उस भले डाकू का जो यह कहता है कि प्रभु आप जब अपने राज्य में आयेंगे तो मुझे याद कीजिएगा। सारी जिंदगी बुराईयों में बिताने के बाद भी अंतिम क्षणों का उसका पश्चाताप उसे स्वर्ग दिला देता है। प्रभु उससे कहते हैं आज ही तुम मेरे साथ स्वर्ग में होंगे। उसने विश्वास  किया कि येसु उसको अनन्त मृत्यु से बचा सकते हैं। वचन कहता है रोमियों 3, 25 में - ‘‘ईश्वर  ने चाहा कि ईसा अपना रक्त बहा कर पाप का प्रायष्चित करें और हम विष्वास द्वारा उसका फल प्राप्त करें।’’ आइये हम हमारे कमजोर टूटे व जर्जर विश्वास  को बटोरते हुए, अपनी बिखरी हुई मानवता को समटते हुए इस पवित्र एवं मुक्ति के सप्ताह में प्रवेश करें। प्रभु के साथ हमारी मुक्ति के उन पलों को सजीव करें, जब हमारे प्रभु येसु ने दुःख भोगा, क्रूस पर चढाये गये मर गये, दफनाये गये व तीसरे दिन वे फिर जी उठे।
आमेन।




Saturday, 25 March 2017

चालीसे का चौथा रविवार, 22 March 2020

1 सामुएल 16, 1- 7.10-13
एफेसिओ 5, 8-14
योहन 9, 1-41
आध्यात्मिक अंधापन 
आज के मनन चिंतन के लिए हमारे पास है एक अंधे व्यक्ति के चंगा किये जाने का सुसमाचार पाठ है। प्रभु येसु जन्म से अंधे एक व्यक्ति को चंगाई प्रदान करते हैं। फरीसी और शास्त्री इस चंगाई को लेकर बडा बवाल खडा कर देते हैं। और प्रभु येसु पर विश्राम दिवस को अपवित्र करने का आरोप लगाते हैं। अंत में वे उस व्यक्ति को सभागृह से बहिष्कृत कर देते हैं। चंगा करते समय वह व्यक्ति नहीं जान रहा था कि जिसने उसे चंगा किया है वह कौन है। बाद में प्रभु येसु उससे मिलते हैं और अपने आपको उस पर प्रकट करते हैं, और वह प्रभु की आराधना करता है। योहन इस चमत्कार के द्वारा हमारे सामने लोगों के आध्यात्मिक अंधेपन पर प्रकाश  डालता है तथा प्रभु येसु को संसार की ज्योति के रूप में प्रस्तुत करता है।
बडी रोचक बात यह है कि यहां चमत्कार का विवरण केवल दो वाक्यों में समाप्त हो जाता है लेकिन उस चमत्कार को लेकर जो विवाद खडा होता है उसका विवरण 39 वाक्यों में किया गया है।

वह व्यक्ति शारीरिक रूप से अंधा था जिसे प्रभु दृष्टि प्रदान करते हैं और वह देखने लगता है। उसी प्रकार प्रभु चाहते थे कि फरीसी और शास्त्री लोग जो कि आध्यात्मिक रूप से अंधे हैं वे आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त करें। पर वे अपने अकडपन व जिद्द के कारण नहीं सुधर पाये। फरीसियों का धार्मिक रवैया बडा विचित्र था। वे सोचते थे कि वे धर्मग्रंथ के ज्ञाता हैं। उन्हें सब कुछ मालुम है। बाकि लोग कुछ भी नहीं जानते हैं। वे सबसे धार्मिक एवं ज्ञानी लोग हैं। अपने इसी रवैये के चलते वे हमेश  दूसरों में दोष निकालने व उन पर उंगली उठाने की ताक में लगे रहते थे। यही उनका अध्यात्मिक अंधापन है। उनको दूसरों की अच्छाई कभी नज़र नहीं आती। प्रभु  येसु ने जो भलाई का काम किया उस अंधे व्यक्ति के लिए वो उन्हें नहीं दिखा। उन्हें दिखा तो सिर्फ विश्राम दिवस का कानून कि उस दिन कोई काम न करे।

आध्यात्मिक अंधापन कई प्रकार का हो सकता है। जैसा कि हमने पहले पाठ में सुना जब समुएल  दाऊद राज-अभिषेक करने गया तो उसने यशेए  के बडे बेटे को देखा, उसके रंग-रूप, और लम्बे कद को देखकर सोचता है कि वही ईश्वर का अभिषिक्त है। परन्तु प्रभु उनसे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं - ‘‘उसके रूप-रंग और लम्बे कद का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप -रंग देखता है, किंतु प्रभु हृदय देखता है।’’

हम भी इस प्रकार के अंधेपन के शिकार कई बार हो जाते हैं। हम बाहरी तौर पर देखकर लोगों के ऊपर निर्णय देते हैं। हम वास्तविकता को जाने बगैर ही कई बार लोगों के विरूद्ध बातें करते हैं। उन्हें कोसते हैं, उन पर दोष लगाते हैं। और फरीसियों की तरह ये सोचते हैं कि हम सब कुछ जानते हैं। हमें सब पता है। ऐसे लोगों का दृष्टिकोण यही रहता है कि जो वे देखते और सोचते हैं वही सच्चाई है। अपनी संकीर्ण सोच के पैमाने से सब लोगों को देखते व जज करते हैं।
शारीरिक अंधेपन को दूर करना शायद आसान है लेकिन अध्यात्मिक अंधापन दूर करना मुश्किल काम है। क्योंकि शारीरिक रूप से अंधे व्यक्ति को तो यह मालूम रहता है कि वह अंधा है। वह इस सच्चाई को स्वीकार करता है। लेकिन आध्यात्मिक रूप से अंधे लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वे अंधे हैं। इसलिए उनका सुधार बहुत मुश्किल रहता है। आध्यात्मिक रूप से अंधे लोग बेहद स्वार्थी होते हैं। उन्हें अपने जीवन से बाहर कुछ दिखाई नहीं देता। उन्हें समाज में हो रहे पाप नहीं दिखते, गरीबों के आँसू, बेसहारों की पीडा, व दलितों की दयनीय स्थिति नज़र नहीं आती। उन्हें दिखता है तो सिर्फ अपना स्वार्थ। वे अंधकार में जीवन जीते हैं। हम जानते हैं कि जहाँ अंधकार है वहां कुछ देख नहीं पाते। परन्तु जहाँ प्रकाश है वहां सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। इसलिए आज के दूसरे पाठ में प्रभु येसु हम से कहते हैं - ‘‘आप लोग पहले अन्धकार थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ज्योति बन गये हैं। इसलिए ज्योति की संतान की तरह आचरण करें।’’ हम प्रभु येसु के शिष्य  होने के नाते अंधकार को पार कर ज्योति में आ गये हैं। प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ। जो मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी’’ (योहन 8,12)। जो प्रभु येसु में विश्वास करते हैं, जो कोई उनका अनुसरण करते हैं वे पापमय अंधकार में नहीं भटकेंगे। प्रभु येसु की यह ज्योति हमें कहाँ से प्राप्त होगी।? स्तोत्र 119,105 में वचन कहता है - ‘‘तेरा वचन मुझे ज्योति प्रदान करता और मेरा पथ आलोकित करता है।’’ जि हाँ प्रभु के वचन हमारे जीवन के लिए ज्योति हैं। यदि हम हमारे जीवन का आध्यात्मिक अंधापन दूर करना चाहते हैं तो हमें हर बात हर चीज़, वचन के उजाले में देखने की ज़रूरत है। कुछ करने या बोलने के पहले हम वचन के पैमाने पर हर चीज़ को तोलें ।

आईये हम वचन की रोशनी में जीवन की हर घटना को देखने की कोशिश करें। जब तक हम प्रभु के वचनों को पढेंगे नहीं, उनके ऊपर मनन चिंतन नहीं करेंगे हम अंधकार में ही भटकते रहेंगे। वचन को सिर्फ पढने मात्र से हमें दिव्य ज्योति प्राप्त नहीं होगी। प्रभु कहते हैं - ‘‘तेरी शिक्षा का पालन करने से ही नवयुवक निर्दोष आचरण कर सकता है’’ (स्तोत्र 119, 9)। और संत याकूब हमें हिदायत देते हैं - आप लोग अपने आप को धोखा न दें। वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें’’ (याकूब 1,22)। केवल वचन पढकर अथवा सुनकर ये न सोचें कि हम ने हमारा कर्तव्य पूरा कर लिया। हमें रौशनी मिल गयी है,ं हमें ज्योति मिल गयी है। वचन के श्रोता बनने भर से हमारा जीवन आलोकित नहीं होता उसका पालन करने से वचन की रौशनी हमारे जीवन में प्रभावशाली होती है।। आईये, हम तपस्या के इन दिनों में, प्रभु वचन से अपनी आध्यात्मिक भूख व प्यास मिटायें। व प्रभु के वचन को पढकर, उसे सुनकर अपने जीवन में उस वचन को काम करने दें। ताकि हम सचमुच में ज्योति की संतान के रूप में इस संसार में रह सकें। आमेन।



Friday, 17 March 2017

चालीसे का तीसरा रविवार

निर्गमन 17, 1-7
रोमियो 5, 1-11

योहन 4, 5-42

 ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों, आज के पाठों के अनुसार हम विशेष  रूप से दो बिंदुओं पर मनन चिंतन करेंगे 1) संकट में ईश्वर  पर भरोसा और 2) प्रभु येसु, संजीवन जल

1) संकट में ईश्वर पर भरोसा
आज के पहले पाठ में हमने मरूस्थल में इस्राएली लोगों की परीक्षा के बारे में सुना। करीब 430 सालों की मिस्र की गुलामी के बाद ईश्वर उन पर तरस खाकर उन्हें मूसा की अगुवाई में स्वतंत्र कराता है। उन्हें महान चिन्ह व चमत्कार दिखलाते हुए यह आश्वासन देता है कि मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर तुम्हारे साथ हूँ। जब तक सब कुछ ठीक चल रहा था कोई शिकायत नहीं थी, परन्तु जब उन पर संकट आया, उनका विश्वास डगमगाने लगा। जब मरूभूमि में उन्हें पानी नहीं मिला तो वे मूसा व ईश्वर के विरूद्ध भुनभुनाने लगे। समुद्र में रास्ता बनाकर उन्हें बचाने वाले ईश्वर पर से उनका भरोसा शीघ्र ही उठ गया। तब ईश्वर ने मूसा को आदेश  दिया कि वह चट्टान पर अपना डंडा मारे और तुरन्त ही वहां से पानी की धारा बह निकली। सबों ने पानी पिया व अपनी प्यास बुझाई। प्रभु ने उस समय उनकी प्यास तो बुझाई लेकिन अपनेे अविष्वास का खामियाजा उन्हें भुगतना पडा। उनमें से एक भी प्रतिज्ञात देष में प्रवेष नहीं कर सका। सिर्फ उनकी संतानें वहां पहुँची।
हम भी कितनी बार हमारे जीवन में दुःख व संकट के बादल मंडराने पर इस्राएली लागों की भांति ईश्वर के विरूद्ध कुडकुडाते हैं, और शिकायत करते हैं। हम प्रभु से कहते हैं देख कि हम दुख संकट में है और तू देखता ही नहीं। हम आभावों में जी रहे हैं और तू हमारी तरफ ध्यान ही नहीं देता! क्या प्रभु सचमुच हमारे दुख-संकट को नहीं देखता? क्या वह हमारी पीडाओं से अपना मुंह मोड लेता है? हरगीज़ नहीं। वह हमसे कहता है येरमियाह 49, 16 में - ‘‘मैं ने तुम्हें अपनी हथेलियों पर अंकित किया है, तुम्हारी चार दिवारी निरन्तर मेरी आँखों के सामने है।’’ हमारा घर, हमारी चार दिवारी हमेशा  उसकी निगाह में है। ऐसा कुछ भी नहीं जो उनकी जानकारी के बिना हमारे साथ घटित होता हो। इसीलिए भजनकार, भजनसंहिता 139 में कहता है - ‘‘ईश्वर तू मुझे जानता है। मैं चाहे लेटूँ या बैठूँ, तू जानता है। . . . मैं चाहे चलूँ या लेटूँ, तू देखता है।’’ जि हाँ  प्यारे भाईयों और बहनों ईश्वर हर समय हमें देखता है। इसलिए संकट के समय भी हमें धैर्यपूर्वक उस ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। उनका वचन कहता है इसायाह 49, 8 में - ‘‘मैं उपयुक्त समय में तुम्हारी सुनुँगा, मैं कल्याण के दिन तुम्हारी सहायता करूँगा।’’ प्रभु अपने समय व अपनी योजना के मुताबिक हमारे जीवन में कार्य करेगा। और उसकी योजनाए हमेशा  हमारे हित में ही होती है। वे कहते हैं - ‘‘क्योंकि मैं तुम्हारे लिए निर्धारित अपनी योजनाएँ जानता हूँ, तुम्हारे हित की योजनाएँ, अहित की नहीं, तुम्हारे लिए आशामय भविष्य की योजनाएँ’’ (यिरमियाह 29,11)। वचन कहता है - ‘‘तुम प्रभु पर अपना भार छोड दो, वह तुम को सम्भालेगा। वह धर्मी को विचलित नहीं होने देगा’’ (स्तोत्र 55,23) इसलिए हम सदैव  ईश्वर पर अपना पूर्ण भरोसा बनाये रखें। क्यांकि जो कोई ईश्वर पर भरोसा रखता है वचन कहता है वह उस पेड के सदृष है जो जल स्रोत के पास लगाया गया है, जिसकी जडें पानी के पास फैली हुई है। वह कडी धूप से नहीं डरता...वह सूखे के समय भी चिंता नहीं करता (यिर 17,7-8)। प्रभु पर भरोसा रखने वाला जलस्रोत के निकट लगे पेड के समान निष्चिंत रहता है। हम भी प्रभु पर भरोसा रखें व निश्चिन्त रहें।

२)  प्रभु येसु मसीह जीवन का जल
हमने पहले पाठ में सुना कि इस्राएली लोगों को ईश्वर ने मरूभूमि में चमत्कारिक ढंग से जल पिलाया था। यह जल तो सिर्फ उनकी शारीरिक अथवा भौतिक प्यास ही बुझा पाया। लेकिन आज के सुसमाचार में हमने सुना प्रभु येसु समारी स्त्री से कहते हैं - ‘‘जो मेरा दिया हुआ जल पिता है, उसे फिर कभी प्यास नहीं लगेगीं, जो जल मैं उसे प्रदान करूँगा, वह उस में स्रोत बन जायेगा, जो अनन्त जीवन के लिए उमडता रहता है।’’ प्रभु येसु अपने शिष्यों  के साथ येरूसालेम की ओर जा रहे थे। वे समारिया होते हुए जाते हैं। यात्रा करते-करते वे थक जाते हैं और याकूब के कुएँ पर पानी पीने जाते हैं। वहांँ भरी दुपहरी में एक स्त्री जो समाज में बदनाम व कलंकित थी, पानी भरने आती है। हमें ज्ञात हो कि पानी भरने का समय या तो सुबह या फिर शाम को होता है, जहांँ कई स्त्रीयाँ पनघट पर इकट्ठा होती और बतयाती हैं। पर यह स्त्री अकेले एकान्त समय में आती है। वह अन्य लोगों के सामने बाहर निकलने का साहस भी नहीं कर सकती थी, क्योंकि वह भीतर ही भीतर टूट चुकी थी। पाँच पुरूषों के साथ रहने के बाद भी जीवन में कुछ अधूरापन व खालीपन महसूस करती थी, अपने अंदर एक असंतोष महसूस करती थी। उसके जीवन में वास्तव में एक गहरी प्यास थी जिसे बुझाने के कई तरीके उसने अपनाये, पर वह प्यास बुझी नहीं।
प्रभु येसु कहते हैं कि मैं भला गडेरिया हूँ। मैं वह गडेरिया हूँ जो निन्यानबे भेडों को छोडकर एक भेड जो भटक गई है उस की खोज में जाता है। अपने इसी वचन को आज प्रभु उस याकूब के कुएँ पर पूरा करते हैं। वहाँ, दोपहर की धूप में उन्होंने अपनी एक भटकी हुई भेड को पा लिया। प्रभु येसु ने उस स्त्री से संवाद किया व धीरे-धीरे उसके पुराने पापमय जीवन के घावों पर मरहम लगाते हुए उसे संजीवन जल के पास आने व मुक्ति के झरने से पीकर पूर्ण रूप से तृप्त होने का निमंत्र दिया। प्रभु के वचनों को सुनकर उस स्त्री में अनन्त जीवन के जल के लिए प्यास जागृत हुई। वह स्त्री जो दुनिया के सुखों में संतुष्टी ढूंढती थी, अब जीवन का अर्थ समझने लगती है। वह जान जाती है कि ये भौतिक सुख क्षणिक है और इनसे कुछ लाभ नहीं। वहीं प्रभु येसु में उसने अनन्त जीवन के सुख का राज पा लिया। वह बोल उठती है मुझे वह जल दीजिए, जिससे फिर कभी प्यास न लगे। जिस अनन्त जीवन के जल की बात आप कर रहे हैं, मुझे वह दे दीजिए। मैं पूर्ण रूप से परितृप्त होना चाहती हूँ।
प्यारे भाईयों और बहनों, आज चालीसे के तीसरे रविवार में प्रभु हम सब से यही कह रहे हैं - ‘‘यदि कोई प्यासा हो तो वह मेरे पास आये। जो मुझ में विश्वास करता है, वह अपनी प्यास बुझाये’’ (योहन 7,37-38)। 
 नबी इसायस ने इस जल के बारे में भविष्यवाणी की थी और कहा था- ‘‘तुम आनन्दित होकर मुक्ति के स्रोत में जल भरोगे’’ (इसा 12, 3)। यह मुक्ति का स्रोत, उद्धार का झरना स्वयं हमारे मुक्तिदाता येसु मसीह ही हैं। प्रकाशना ग्रंथ में संत योहन एक दिव्य दृष्य के बारे में बतलाते हुए कहते हैं - ‘‘इसके बाद मुझे संजीवन जल की नदी दिखायी, जो ईश्वर और मेमने के सिंहासन से बह रही थी।’’ यह वही झरना है जो हमारी मुक्ति के लिए प्रवाहित होता है। यही वो जीवन की धरा है जो येसु मसीह के ह्रदय से निकलती है.  संत योहन 19, 34 में हम इसके बारे में पढते हैं - ‘‘एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।’’ 
प्यारे भाईयों और बहनों, हम देखते हैं आजकल पीने का पानी भी बोटलों में बंद, बाज़ारों में बिकता है। पर उद्धार का यह जल मुफ्त है। जिस जल को पीने के बाद भी मृत्यु से नहीं बचा जा सकता वह पैसों में मिलता है, पर मौत के बाद भी अनन्त जीवन देने वाला जल, फ्री में मिल रहा है। वचन कहता है - ‘‘आल्फा और ओमेगा, आदि और अंत मैं हूँ। मैं प्यासे को संजीवन जल के स्रोत से मुफ्त में पिलाऊँगा। यह विजयी की विरासत है। मैं उसका ईश्वर हुऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा। (प्रका. 21,6)। नबी इसायाह के ग्रंथ 55, 1-3 में प्रभु कहता है ‘‘तुम सब जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ। यदि तुम्हारे पास रूपया नहीं है, तो भी आओ। जो भोजन नहीं है उसके लिए तुम रूपया क्यों खर्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता है, उसके लिए परिश्रम क्यों करते हो? मेरी बात मानो। कान लगाकर सुनो और मेरे पास आओ। मेरी बात पर ध्यान दो और तुम्हारी आत्मा को जीवन प्राप्त होगा।‘‘
प्रभु ने उस स्त्री से कहा कि यदि तुम ईष्वर का वरदान पहचानती और यह जानती कि वह कौन है, तो तुम उस से माँगती और वह तुम्हें संजीवन का जल देता तुम मुझसे माँगती और मैं तुम्हें संजीवन का जल देता। माँगो और तुम्हें दिया जायेगा। जो कोई अमरता का जीवन चाहते हैं आईये हम संजीवन जल के झरने प्रभु येसु के पास चलें और उनसे वह जल माँगे जिसे पीने के बाद फिर प्यास नहीं लगती, जिसे पीने के बाद इस जीवन की सारी झंझटे समाप्त हो जाती है, जिसे पीने के बाद जीवन सफल हो जाता है। आमेन।


Saturday, 11 March 2017

2nd sunday of Lent

उत्पत्ति ग्रंथ 12, 1-4
2 तिमिथी 2 1, 8-10
मत्ती 17, 1-9

एकान्तवास, प्राकृतिक सुंदरता, प्रार्थना एवं भक्ति तथा इश्वरीय अनुभव प्राप्त करने के लिए कई जवान लडके लडकियाँ कॉन्वेंट अथवा विभिन्न मठों में प्रवेष लेते हैं। इस दुनिया की भीड-भाड एवं शोर-गुल से अलग एकांत में प्रभु भक्ति में समय बिताने का अपना अलग ही आनन्द रहता है। कई बार लोग अपने व्यस्ततम जीवन से उबकर एकान्त स्थानों पर, प्रकृति के आंचल तले, सकून और शांति पाने के लिए जाते हैं। कई लोग आश्रमों अथवा इस प्रकार के आध्यात्मिक स्थलों पर जाकर प्रार्थना में समय बिताना पसंद करते हैं, जहां उन्हें ईष्वरीय उपस्थिति का अभास होता है। कई बार फादर सिस्टर्स जो शिक्षा, स्वास्थ्य एवं समाजिक उत्थान की विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, अपना कुछ समय रिट्रीट एवं प्रार्थना में बिताने के लिए, वे एक शांतिपूर्ण स्थानों पर जाते हैं, जहां वे प्रार्थना एवं मनन ध्यान करते हुए ईष्वर की उपस्थिति का अनुभव करते व ईश्वर से आध्यात्मिक संवाद करते हैं। आजकल रिट्रीट एवं आध्यत्मिक साधना के लिए ऐसे कई केंद्र खोले जा रहे हैं जहां लोग आकर कुछ समय बिताते व अपने जीवन की विभिन्न समस्याओं का निदान पाते हैं। कई लोग इन स्थानों पर आकर अपना पुराना जीवन बदल कर एक नई जिंदगी की शुरूआत करते हैं। कई अपनी पुरानी बूरी आदतों व पापमय जीवन को छोडकर एक नया जीवन ग्रहण कर वापस लौटते हैं। कई लोग अपनी रिट्रीट समाप्त हो जाने पर भी वहां से जाना नहीं चाहते। उन्हें वह स्थान, वहां का प्रार्थनामय माहौल, ईष्वरीय अनुभूति और आत्मिक सुकून अच्छा व सुखद लगता है। उन्हें वापस उस माहौल में जाने से डर  लगता है जहां बुराईयों का संसार है, जहां चुनौतियां है, जहां जीवन का संघर्ष है। वैसा ही आज के सुसमाचार में प्रभु येसु के षिष्यों के साथ होता है।
प्रभु येसु अपने तीन षिष्यों, पेत्रुस, याकूब और योहन को उनके सामने एक रहास्योद्घाटन करने के लिए ताबोर पर्वत पर ले जाते हैं। जब वे उस पहाड पर ही थे कि उनके सामने प्रभु येसु का मुखमंडल सूर्य की तरह दमक उठा और उनके वस्त्र प्रकाष के समान उज्वल्ल हो गये। शिष्यों को मूसा और एलियस येसु के साथ बातचित करते दिखाई पडे तथा उन्होंने आसमान से एक वाणी को यह कहते सुना - यह मेरा प्रिय पुत्र है, मैं इस पर अन्यन्त प्रसन्न हूँ, इसकी सुनो। इन तीन षिष्यों के लिए यह दिव्य दृष्य काफी चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक उन्होंने प्रभु येसु को एक साधारण पुरूष के रूप में ही देखा था। उन्होंने उन्हें इस महिमा में नहीं देखा था। प्रभु येसु जान बूझकर अपने षिष्यों को यह दिव्य दृष्य दिखाना चाहते थे ताकि निकट भविष्य में जब वे यहूदियों द्वारा पकडाये व क्रूस पर दर्दनाक मौत मरेंगे, तब उनका मन विचलित न हो जाए। तब उन्हें यह दिव्य दृष्य याद रहे कि प्रभु येसु सिर्फ एक साधरण इंसान नहीं है। वे सच्चे ईष्वर और सच्चे मनुष्य हैं। इस मानव रूप में उनके दुख भोगने के बाद वे अपार महिमा में जी उठेंगे। सांसारिक दुखों व कष्टों के बाद महिमामय आनन्द व उल्लास है। पर वे अपने शिष्यों से इस बात के विषय में उनके पुररूत्थान तक किसी से बात नहीं करने की समझाईष देते हैं। क्योंकि वे ये नहीं चाहते थे कि उनके अनुयायी सिर्फ उनकी महिमा व दिव्य शक्ति को देखकर उनका अनुसरण करे। वे यह चाहते थे कि उनके अनुयायी अपने दैनिक जीवन का क्रूस उठाकर उनका अनुसरण करे। सब लोग यह जानें कि येसु के पीछे जाना मतलब दैनिक जीवन के दुख-दर्द सहते हुए, उनके साथ चलना है। येसु के साथ चलने वाले हर विष्वासी को क्रूस को गले लगाते हुए आगे बढना है। बिना क्रूस के पुनरूत्थान संभव नहीं। स्वर्ग में जाकर ईष्वर की महिमा के भागिदार बनने का कोई शॉर्ट कट नहीं है। इस जीवन के उतार चढाव को पार करते हुए ही हम वहां तक पहुंच सकते हैं। प्रभु कहते हैं स्वर्ग का द्वारा एक संकरा द्वार है। जि हां स्वर्ग का द्वार केवल संकरा ही नहीं, इस मार्ग में पत्थर हैं, कांटे हैं और मुसिबतों के पहाड भी हैं।
तीन षिष्यों को ताबोर पर्वत पर ईष्वरीय उपस्थिति वाला अनुभव बहुत अच्छा लगा। वे आत्मविभोर हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि वहीं ऐसे सुखद अनुभव में ही रह जायें। पेत्रुस प्रभु से कहते हैं कि हम यहीं रह जायें। आप कहे तो तीन तम्बूओं की व्यस्था कर दूं। वे वहां बहुत सुरक्षित व आरामदायक महसूस कर रहे थे। वे पहाड के नीचे जाकर विरोधी तत्वों जैसे शास्त्री एवं फरिसीयों का सामना करना नहीं चाहते थे। वे भीड जो कि दिन रात प्रभु के पीछे रहती थी उससे बचना चाहते थे। प्रभु पेत्रुस के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया नहीं देते। प्रभु उन्हें लेकर सीधे पहाड के नीचे की ओर चल देते हैं। और उन्हें अपने दुःखभोग मरण एवं पुररूत्थान के बारे में बतलाते हैं। प्रभु यह नहीं चाहते थे कि वे उस ईष्वरीय अनुभव में ही खोए रहें बल्कि जीवन की सच्चाई से भी रूबरू हों। जिस ईष्वरी महिमा व प्रभु की पावन  उपस्थिति का अनुभव उन्हें हुआ उसे वे अपनी परिपूर्णता में इस जीवन के बाद प्राप्त करेंगे। लेकिन तब तक पिता ने जो मिषन उन्हें सौंपा है उसे उन लोगों को पूरा करना है। और इस मिषन को पूरा करने के लिए जीवन में आये हर दुःख व कष्ट को सहना है। प्रभु येसु तो अपना मिषन पूरा करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, यहां तक कि क्रूस पर मरने के लिए भी। इसलिए वे अपने षिष्यों को भी उसी प्रकार पूरी तरह से तैयार रहने की शिक्षा दे रहे थे।
आज प्रभु हम सबसे यही आह्वान करते हैं कि हम हमारे दैनिक जीवन के क्रूस से दूर न भागें। जिस प्रकार से प्रभु ने उसे अपने जीवन में स्वीकार किया हम भी उसे स्वीकार करें। हमारे जीवन में भी हम कई बार व्यक्तिगत प्रार्थनाओं में मिस्सा बलिदान में, तीर्थ स्थानों में या फिर आध्यात्मिक साधनाओं (रिट्रीट) आदि में कई प्रकार के ईष्वरीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते हैं। हमें उसी माहौल में रहना अच्छा लगता है। पर हमें यह याद रहे कि प्रभु हमें ऐसे अनुभव इसलिए देते हैं कि हम हमारे इस दुनियाई जीवन की समाप्ति के बाद इसे परिपूर्णता में प्राप्त करें। ये उस स्वर्गीय आनन्द व शांति का एक अंश मात्र है जिसे ईष्वर हमें भरपूरी से देने वाले हैं। उस भरपूर ईष्वरीय अनुभव को प्राप्त करने के लिए हमें पहाड से नीचे उतरकर जीवन की सच्चाई से रूबरू होते हुए, शैतान और उसकी ताकतों से लडते हुए, सब प्रकार के प्रलोभनों व बुराईयों पर विजय पाते हुए प्राप्त करना होगा। इसलिए हम हमारे जीवन में प्रभु के लिए समय निकालें। प्रभु के साथ लीन होकर अपने जीवन की कठानिईयों व चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त शक्ति व कृपा हासिल करें। तथा उस कृपा के साथ हम प्रभु येसु के समान जीवन में आए हर क्रूस को गले लगाते हुए उनका अनुसरण करें। तभी हमें उनके ही समान मुक्ति का मुकूट हासिल होगा।

आमेन। 

Saturday, 4 March 2017

चालीसे का पहला रविवार, A




ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों, ईष्वर ने आदम और हेवा को बनाया, उन्हें पृथ्वी पर विचरने वाले हर जीव जन्तुओं पर अधिकार दिया, और उनसे यह उम्मिद की गयी कि वे बदले में ईष्वर के प्रति आज्ञाकारी व ईमानदार रहें। बल्कि हमारे आदि माता-पिता ने ईष्वर प्रदत वरदानों के घमंड में ईष्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया जिसका परिणाम उन्हें और उनकी संतानों को भुगतना पडा और आज तक संसार भुगत रहा है। इस बात पर खेद प्रकट करना हमारा हक बनता है कि हमारे आदि माता-पिता ने बहुत ही मुर्खतापूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण कार्य किया है। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? हम उनसे कितने भिन्न हैं। हम हमारे दैनिक जीवन में ईष्वर की दया व कृपा को विभिन्न रूपों में देखते व अनुभव करते हैं। लेकिन हम फिर भी बहुत बार ईष्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करते तथा हमारे आदि माता-पिता से भी अधिक मुर्खतापूर्ण व दुर्भाग्यपूर्ण कार्य करते हैं। क्या ये हमारे लिए शर्म व खेद की बात नहीं?
जिस प्रलोभन एवं परीक्षा का सामना प्रभु येसु ने किया वे हमारे लिए एक प्रोत्साहन एवं सांत्वना का स्रोत हैं। यदि हमारे प्रभु एवं गुरूवर येसु को स्वयं प्रलोभनों के दौर से गुजरना पडा तो हम भी परीक्षा एवं प्रलोभन मुक्त जीवन की उम्मीद नहीं कर सकते। मूल रूप से हमारे प्रलोभन भी वही है जो आदम हेवा के सामने थे और जो प्रभु येसु के सामने थे। हेवा को सबसे पहले वह फल सुंदर और स्वादिष्ट दिखा। उसे देखने में सुंदर दिखा और उसने सोचा देखने में इतना सुन्दर है तो खाने में कितना स्वादिष्ट होगा। वैसे ही प्रभु येसु के सामने सबसे पहला प्रलोभन शारीरिक भूख मिटाने का था।  शैतान ने उनसे कहा कि वह अपनी दिव्य शक्ति से पत्थर को रोटी बनाकर खा ले क्योंकि वह भूखा है। आज हमारा यह शरीर कई प्रकार की भूखों को शांत करने के लिए हमें बाध्य करता है। हमारी पंचेंद्रियां विभिन्न प्रकार से तृप्त होना चाहती हैं। हमारे समाने विभिन्न प्रकार की भूख रहती है। आँखों की भूख - दूसरों को वासना भरी निगाहों से देखने की भूख, अष्लील चीज़ें देखने और पढने की भूख, अच्छा से अच्छा स्वादिष्ट भोजन करने की भूख, दैहिक वासना की भूख, सच्ची - झूठी तारीफ सुनने की भूख। आरमदायक घर व सुख-सुविधा की भूख।
फिर शैतान ने हेवा को ईष्वर के बाराबर हो जाने का प्रलोभन दिया। उसने येसु को भी सारी दुनिया का वैभव दे देने का प्रलोभन दिया। और आज भी वह हमें विभिन्न प्रकार से बडे-बडे वादे करके प्रलोभित करता रहता है। खोखली तारीफ एवं बडापन दिखाने का प्रलोभन, चार जन की भीड में प्रषंसा पाने का प्रलोभन, स्कूल में अव्वल आकर घमंड करने का प्रलोभन और धन व शक्ति का प्रलोभन। आवष्यक्ता से अधिक धन और हैसियत से अधिक मान-सम्मान पाने, सत्ता हथियाने एवं दूसरों पर शासन करने की लालच में इंसान कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता है। क्योंकि इंसान कमजोर प्राणी है। मत्ती 26,41 में वचन कहता है - अत्मा तो तत्पर है लेकिन शरीर दुर्बल है। हम दुर्बल शरीर वाले प्राणी हैं।
स्तोत्र 141 में वचन कहता है मेरे हृदय को बुराई की ओर झूकने न दे। कितनी वास्तविकतापूर्ण प्रार्थना है ये। हमारे चारों ओर बुराई है। न केवल आज बल्कि उस जमाने में भी इसलिए स्त्रोतकार कहता है मेरे हृदय को बुराई की ओर झूकने न दे। मत्ती 6 और लूकस 11 में हम पढते हैं कि प्रभु येसु ने अपने षिष्यों को एक प्रार्थना सिखाई। यह सबसे उत्तम प्रार्थना है। हे हमारे पिता............और हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से हमें बचा। कितनी सुंदर प्रार्थना है। यह सबसे आदर्ष, सुंदर और सबसे शक्तिषाली प्रार्थना है। प्रभु ने कहा हे पिता हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से बचा। प्रभु येसु कहते हैं तुम्हें बार बार इस तरह प्रार्थना करने की आवष्यक्ता है। क्योंकि सबसे पहले हमारा झूकाव पाप की ओर है।
हम उत्पत्ति 8 में पढते हैं सारे संसार मे पाप भर गया था और ईष्वर ने प्रलय भेजा लेकिन ईष्वर ने नूह और उसके परिवार को बचा लिया और प्रलय के बाद नूह ने ईष्वर के लिए बली चढाई और ईष्वर ने यह कहा कि अब से में मनुष्यों को अभिषाप नहीं दूंगा। क्योंकि बचपन से ही मनुष्यों की प्रवृति पाप की ओर है। इसलिए प्रभु हमसे कहते हैं तुम्हें निरन्तर प्रार्थना करनी है। हे पिता हमें परीक्षा में न डाल।
दूसरी तरफ हम देखते हैं मत्ती 18, 7 में प्रभु कहते हैं कि प्रलोभन अनिवार्य है। प्यारे भाईयों बहनों प्रलोभन देने वाला हर समय हमारे चारों ओर मंडराते रहता है। वह हर समय क्रियाषिल रहता है। संत पेत्रुस 5, 8 में कहते हैं कि आपका शत्रु शैतान दहाडते सिंह की तरह विचरता रहता है। और ढूंढता रहता है कि किसे फाड खाये। तो हमारा शत्रु शैतान ढूंढते रहता है कि किसे फाड खायें। हमें हर समय अंधकार की शक्तियों से लडना पडता है, जैसे कि एफेसियों 6 में लिखा है। हर समय विभिन्न नकारात्मक आत्माओं से लडना पडता है। लालच की आत्मा, गुस्से की आत्म, उदासी की आत्म, आलस की आत्मा, निराषा की आत्मा । हमें इनसे लडना पडता है। हमारा जीवन एक लंबा युद्ध है और इस युद्ध में हमेषा प्रभु से प्रार्थना करते रहना है कि हे प्रभु हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से हमें बचा। 12 कुरिंथयों 11,14 में संत पौलुस कहते हैं कि आप लोग इस चीज से अष्चर्यचकित न हों कि शैतान कभी-कभी स्वर्गदूत का रूप ले सकता है। कभी हमारे सामने आकर्षक बातें आकर्षक चीजें आकर्षक लोगों को ला सकता है। हमें भ्रमित कर सकता है। इस दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसी परिथितियों में भ्रमित हो जाते हैं और आसानी से शैतान के चुंगूल में पड जाते है। इ।सलिए हमें हर समय प्रार्थना करने की ज़रूरत है। कि हे प्रभु हमें परीक्षा में न पडने दे। आज हम ऐसे संसार में रह हैं जहां सबसे ज्यादा प्रलोभन देने वाली बातें और चीजें हैं। योहन 17,15-16 में प्रभु ने हमस ब के लिए प्रार्थना की कि पिता मैं नहीं कहता कि उन्हें संसार से उठा ले। वे संसार में हैं लेकिन उन्हें बुराई से बचा। हम विष्वासी इस संसार में हैं लेकिन यह स्वभाविक है हम इस संसार की बुराईयों में फंस जाते है।
प्रलोभनों से विजय पाने का रास्ता प्रभु येसु हमें दिखलाते हैं। और वह है उपवास, प्रार्थना और ईष वचन का पठन एवं मनन चिंतन। जब प्रभु येसु की परीक्षा ली गयी उससे पहले वे मरूभूमि में चालीस दिनों तक उपवास व प्रार्थना कर रहे थे। और शैतान के हर बहकावे का वे वचन की शक्ति से सामना कर रहे थे। हम सब कमजोर हैं इसलिए हमें प्रभु से शक्ति प्राप्त करने की ज़रूरत है।
आईये हम प्रभु से प्रार्थना करें। हमें परीक्षा में न पडने दे परन्तु सब बुराईयों से हमें बचा, आमेन।