Friday, 27 September 2019

सामान्य काल का 26 वां रविवार, वर्ष C : हिंदी प्रवचन



आमोस 6:1. 4-7
1 तिमथी 6:11-16
लूकस 16:19-31

आज के सुसमाचार में हमने पढा, एक धनी गरीब कंगाल लाज़रूस के बारे में। इस दृष्टाँत में गौर करने लायक बात यह है कि गरीब का नाम इसमें दिया गया है - ‘लाज़रूसपर धनवान का कोई नाम नहीं दिया गया। इस दुनिया में धनवानों का बडा नाम होता है, उनकी पहचान होती है, उनकी शौहरत होती है, और गरीब बेनाम, तिरस्कृत, निंदीत लोग होते हैं। पर स्वर्ग राज्य के माप-दंड हमारे माप-दंड से भिन्न हैं। 

ख्रीस्त में प्यारे भाईयां और बहनों जब नाम की बात आती है तो मेरा ध्यान प्रकाशन ग्रंथ की ओर जाता है, जहाँ अंतिम न्याय के बारे में बताते हुवे संत योंहन कहते हैं कि जिसका नाम जीवन ग्रंथ में लिखा हुआ नहीं मिला, वह अग्निकुंड में डाल दिया गया(प्रकाशना  ग्रंथ 20:15) आज के सुसमाचार को पढ़ते समय ऐसा लग रहा था, जैसे प्रभु येसु जीवन की पुस्तक से पढ रहे हैं, उसमें लाज़रूसनामक कंगाल का तो नाम है पर उस धनी का नहीं है। और वह धनी अब हमेशा के लिए बेनाम रहेगा। जीवन ग्रंथ से उसका नाम मिटा दिया गया है। यही उसके विलासितापूर्ण जिंदगी गरीबों के प्रति उदासिनता का पुरस्कार है।

प्रभु आज के सुसमाचार के द्वारा उस धनी के धन की उतनी निंदा नहीं करते जितनी उसके गरीबों के प्रति उदासीनतापूर्ण व्यवहार की। उसके पास गरीबों तडपते लोगों के लिए कोई जगह नहीं थी। वह गरीब लाज़रूस को रोज दिन अपनी खाने की मेज़ के सामने भूख से तडपते देख कर भी उसकी पीडा से अनजान रहा। शायद उसने कभी भूख क्या होती है, उसका अनुभव ही नहीं किया था। क्योंकि वह रोज दिन दावत उडाता था। आज की दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है। शोपिंग मॉल में जाना, 5 रू. की चाय को 50 रू. देकर पीना, मंहगे  फैशन वाले कपडे पहनना, .सी. वाली आरामदायक कार में घुमना ये सब उन्हें बेहद पसंद है। पहली मंजिल तक सिढी चढकर जाना उनसे नहीं होता, उन्हें लिफ्ट चाहिए होती है। पर वहीं दिन भर ईंट, रेत सिमेंट की बोरी उठाकर पहली दूसरी और तीसरी मंजिल तक सिढी चढने वाले मज़दूरों पर उन्हें रहम नहीं आती। यदि वे घडी भर भी बैठ गये तो उनपर डाँट गालियों का पहाड टूट पडता है। बिना .सी. की कार में सवारी करना उनके लिए एक मुश्किल काम होता है, लेकिन दिनभर कडी धूप में ठेलागाडी धकेलकर सब्जी बेचने वाले गरीब से 20 रू. किलो वाली सब्जी 15 रू. में खरीदने के लिए मोल -भाव करते उन्हें तो शरम आती है और ही उनके दिल में मानवता जागती है। ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। 

नबी अमोस अध्याय 6 में जो कि आज का  पहला पाठ है ,  ऐसे ऐशो आराम की जिंदगी जिने वालों पर गहरा प्रहार किया गया है और कहा गया है कि इनके भोग-विलास का अंत हो जायेगा।
धनी ही नहीं आज की पीढ़ी के अधिकतर लोग ईश्वर के प्रति अपने दिलों को बंद कर लेते हैं। वे सिर्फ इस जीवन के सुखों से तृप्त हैं। वे अपने भावी जीवन को भूल जाते हैं। वे अपना हृदय गरिबों के प्रति बंद कर देते हैं। वे अपने में ही सीमित रहना चाहते हैं।

लज़रूस उन लाखों करोडों बिमार, पीडित, दुखित, समाज द्वारा ठुकराये, तिरस्कृत, शोषित लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जिनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं। वे तो अपने अधिकारों के लिए रैली निकालतेऔर ही इसके लिए सभायें करते हैं। वे सदियों से अपने इन दुःख दर्दों को अपना भाग्य समझकर चुपचाप सहते आये हैं। संत लूकस के सुसमाचार 9:24 में प्रभु का वचन कहता है - जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है वह उसे सुरक्षित रखेगा।उस धनी व्यक्ति ने अपना जीवन सुरक्षित रखने की कोशिश  की, लेकिन अंत में जीवन. . .अनन्त जीवन उसके हाथों से फिसल जाता है, वह अपना अनन्त जीवन का पुरस्कार खो देता है वहीं लाज़रूस उसे हासिल करता है।
प्रभु आज के वचनों द्वारा हमें मुख्यरूप से निम्न तीन बातें बतलाना चाहते हैं?

पहली बात - हमसे ज्यादा गरीब ज़रूरतमंद लोगों के प्रति हम उदार दयालु बनें उनके दुख दर्दों को दरकिनार करें, अपितु उन्हें समझने की कोशिश  करें, उनके प्रति सहानुभुति प्रेम की भावना रखें।
दूसरी बात - पश्चाताप का अवसर हमारे अंतिम सांस लेने तक ही हमें मिलता है। प्रभु हमें हमारे मरण तक सुधरने का अवसर देते हैं। लेकिन मरने के बाद हमें कोई मौका नहीं मिलने वाला। जैसा कि उस धनी के साथ हुआ।
तीसरी बात - हमारे सुधार के लिए हमें धर्ममार्ग पर चलाने के लिए हमारे पास प्रभु के वचन हैं। हमें रोज़ उन्हें पढना उन पर मनन करना चाहिए। पिता इब्राहिम उस धनी से कहते हैं कि तुम्हारे भाईयों के पास मूसा का ग्रंथ है, वे उसे पढकर, सुधर जायें। इस पर हव धनी बोलता है कि वे कहाँ धर्मग्रंथ पढते उसको सुनते हैं। याने उनके पास धर्मग्रंथ था लेकिन उन्होंने उसे तो पढा और सुना। इसलिए उसमें सदबुद्धी नहीं आयी, उसने दया, करूणा प्रेम का पाठ नहीं पढा। अन्यथा वह उस गरीब की प्रति दया दिखाता और फलस्वरूप स्वर्गराज्य में प्रवेश करता। उसे भी पिता इब्राहिम की गोद में स्थान मिलता। हम भी हमारे घरों में रखी पवित्र बाइबल की धूल साफ कर उसे उठाकर रोज पढें। उसमें हमारे अनन्त जीवन का पूरा राज छिपा हुआ है। वही हमें उद्धार मुक्ति के मार्ग पर ले जायेगा। आमेन।


Thursday, 19 September 2019

वर्ष का 25वां रविवार, २२ सितंबर 2019:हिंदी मनन चिंतन



चतुर बनो कि स्वर्ग मिल जाये 

अमोस 8: 4-7
1 तिमथि 2:1-8
लूकस 16:1-13
आज के मनन-चिंतन का विषय है - धन-संपत्ति का सही उपयोग करना एवं ऐसा काम करना जो हमें स्वर्ग राज्य में प्रवेश  करने में सहायक हो। 

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बेईमान कारिंदा का दृष्टांत सुनाते हैं जिसमें अपनी बेईमानी के कारण उसे उसका मालिक उसके  काम से हटाने वाला था। पर वह कारिंदा चतुराई से काम लेता है व अपने भविष्य के जीवन के लिए बडी ही चतुराई से काम करता है। यद्यपि उसने काम बेईमानी का किया, फिर भी प्रभु उसके तारीफ करते हैं। अब यह सवाल उठता है कि प्रभु येसु ने इस बेईमान कारिंदे की तारीफ क्यों की? संत लूकस के सुसमाचार 16:8 में हम देखते हैं कि स्वामी ने बेईमान कारिन्दे को इसलिए सराहा कि उसने चतुराई से काम किया। उसने अपने भविष्य के जीवन के बारे में सोचा कि आगे क्या होगा। 

प्रभु यहाँ हमें स्वर्ग राज्य के हकदार बनने व स्वर्गराज्य के मूल्यों पर चलने के लिए उस करिंदा की बेईमानी का अनुसरण करने नहीं पर उसकी चतुराई से सिख लेने को कहते हैं। क्योंकि इस संसार की संतान आपसी लेन-देन में ज्योति की संतान से अधिक चतुर हैं। संत मत्ती 10:16 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘देखो मैं तुम्हें भेडियों के बीच भेडों की तरह भेजता हूँ। इसलिए साँप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनो।’’ विरोधी तत्वों के सामने, अत्याचार करने वालों के सामने, हमें सताने वालों के सामने हमें निष्कपट, निर्दोष व पाप रहित बनना है, परन्तु साथ ही हमें सांँप की तरह चालाक बनने को प्रभु कहते हैं। ईश्वर के राज्य की स्थापना व उसे प्राप्त करने के लिए हमे मुर्खतापूर्ण काम नहीं चतुराईपूर्ण काम करना चाहिए। प्रभु की दृष्टि में वे लोग मूर्ख हैं जो धन संपत्ति को अपना भगवान मानते हैं। जो अपना विश्वास  व भरोसा पर अपने पैसों पर ही रखते हैं।

वास्तव में यदि देखा जाये तो हम हमारी सम्पत्ति के पूर्ण मालिक नहीं है; याने हम ये नहीं कह सकते कि जो कुछ मेरे पास है वह मेरा ही है, मैंने इसे बिना किसी की मदद से प्राप्त किया है। नहीं। सब कुछ प्रभु का है, सच्चा मालिक तो वही है हर चीज़ का। हम तो बस प्रबंधक अथवा कारिन्दा है। (लूकस 19:11-27)। संत अंब्रोस कहते हैं - ‘‘जब तुम किसी गरीब को कुछ उपहार दे रहे हो तो तुम तुम्हारे अपने में से कुछ भाग उसे नहीं दे रहे हो, पर जो उसका अपना है उसे वापस लौटा रहे हो।’’ किसी दिन एक छोटा बालक अपने पिता के साथ बाज़ार जा रहा था। कडाके की ठंड पड रही थी और लोग घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे थे। ऐसे में उन्हें रास्ते में उन्हें एक अत्यंत गरीब महिला दिखाई दी जिसके तन पर नाममात्र के लिए कोई कपडा था। लडके के पिता ने तुरन्त पास वाली दुकान से उसके लिए एक गरम कोट खरीदा और उसे उस महिला को देकर आगे बढ गया। बेटे ने पिताजी से पुछा पिताजी ईश्वर  ने क्यों किसी को अमीर तथा किसी को इतना गरीब बनाया। क्या वह सबसे प्यार नहीं करते? इस पर पिताजी ने उससे कहा - ‘‘बेटा ईश्वर सबसे बराबर प्यार करते हैं और शायद गरीबों से और भी  अधिक। और हाँ उनके हिस्से का धन उसने अमीरों को  दिया है, ताकि वे उसका उपयोग इन गरीबों के लिए करके अपने लिए पुण्य कमा सकें। याने गरीब जिन्हें हम हीनता की दृष्टि से देखते हैं। जिन्हें हम काम वाली बाई, नौकर, भिखारी, पागल, आदि नामों से पुकारते हैं, वे वास्तव में हमारी जिंदगी में फ़रिश्ते  बनकर, हमें स्वर्ग राज्य पहुँचाने में मदद करने आते हैं। इन लोगों के प्रति हमारा नज़रिया क्या है?

आज की दुनिया में ज़्यादतर लोग अधिक से अधिक धन बटोरने, व मुनाफा कमाने में लगे हैं। बहुतों के लिए पैसा ही भगवान है। पूरा भरोसा व विश्वास  धन-दौलत पर ही टिका रहता है। धन व धनवानों के बारे में संत जेरोम कहते हैं - ‘‘सारा धन अन्याय की उपज है। जो धनी है वह या तो अन्यायपूर्ण आदमी है या फिर किसी अन्यायपूर्ण व्यक्ति का उत्तराधिकारी।’’  
भौतिक चीज़ें  संचय करने वालों का अंत दौलत की वेदी पर होगा, लेकिन जो आत्मदान करता है जो दीन-दुःखियों की सेवा करता है, उनकी मदद करता है, वह सच्चे ईश्वर  तक पहुँचेगा। भौतिक सम्पत्ति अल्पकालिक है। ऐशो -आराम व मौज मस्ती में उडाये धन से हम दोस्तों व यारों को तो जीत सकते हैं पर वे धन समाप्त होने पर हमें छोडकर चले जायेंगे जैसा कि उडाव पुत्र के साथ हुआ। हमें संत फ्राँसिस असिसी से सिखना चाहिए जिन्होंने, इस जीवन की असारता को त्यागकर आने वाले जीवन की महानता को महत्व दिया। मदर तेरेसा हमारे लिए एक जीवंत उदाहरण है। जिन्होंने परहित में अपना सारा जीवन न्योछावर कर दिया।

जहाँ धन है वहाँ डर है, वहाँ खतरा है। धन की प्राप्त करने की अंधी दौड में कहीं ऐसा न हो कि हमारी कारिंदगरी अथवा प्रबंधक के पद से हमें हटा दिया जाये। पैसा केवल अपना ही भविष्य सुनिश्चित कर सकता है। वह हमारा भविष्य सुनिश्चित नहीं कर सकता। यदि हम दुसरों की भलाई में अपनी सम्पत्ति का सदुपयोग करते हैं तो हम उसे हमेशा के लिए बनी रहने वाली संपत्ति के रूप में परिवर्तित कर देते हैं, एक ऐसी संपत्ति जो कि स्वर्ग में हमेषा के लिए जमा रहती है (मत्ती 6:19)।

आइए आज हम संत पौलुस के साथ प्रार्थना करें कि जिन लागों को ईश्वर ने सत्ता का कार्यभार सौंपा है वे अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभायें जिससे समाज में अन्याय न फैलें। आइए हम गरीबों के लिए प्रार्थना करें कि वे प्रभु येसु के प्रेम का अनुभव करें। साथ ही हम धनी व्यक्तियों के लिए भी प्रार्थना करें कि ईश्वर उनका हृदय परिवर्तन करें जिससे वे गरीबों का शोषण न करें बल्कि मदद करें। हम स्वयं के लिए प्रार्थना करें कि हमारे खीस्तीय समुदाय में कोई अन्याय न हो। आइए हम सब ईमानदार कारिंदे बनें तथा छोटे लस छोटे कार्यों में  भी ईमानदार बने रहें जिसे  ईश्वर  ने हमें सौंपा है ताकि हम अंत में ईश्वर की निगाहों में योग्य पाए जाएँ। आमेन 

Thursday, 12 September 2019

वर्ष का 24 वां रविवार, 15 सितम्बर 2019 : हिंदी मनन चिंतन



भला चरवाहा येसु 

निर्गमन 32:7-11, 13-14
तिमथि 1:12-17
लुकस 15:1-32

आज के पहले पाठ में हमने सुना प्रभु मूसा से कहते हैं - ‘‘पर्वत से उतरो, क्योंकि तुम्हारी प्रजा जिसे तुम मिस्र  निकाल लाये हो, भटक गयी है।’’ मूसा प्रभु से मुलाकात करने उनकी उपस्थिति में सीनई पर्वत पर था। प्रभु अत्यंक व्याकुल होकर ये कह रहे हैं। ये प्रभु के दिल के अंतःस्थल से निकली उनकी एक दारूण पुकार है। वे क्रोधित होकर उन लोगों का सर्वनाश  करना चाह रहे थे परन्तु मूसा ने मध्यस्थता की, लोगों की पेरवी की व उनका बीच-बचाव किया। और प्रभु ने जो धमकी दी थी उसका विचार छोड दिया। क्योंकि ‘‘वह एक अत्यंत दयालु, व करूणामय ईश्वर  है। वह सहनशील  सत्यप्रतिज्ञ औ प्रेममय ईश्वर  है।’’ (स्तोत्र 8615) हम सब प्रभु के प्यारे बच्चे हैं। वह नबी इसायस 434 में हमसे कहते हैं "तुम मेरी दृष्टि में मुल्यवान हो और महत्व रखते हो, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।‘‘ वो हमें कभी भी खोना नहीं चाहते हैं। संत योहन के सुसमाचार 639 में प्रभु येसु हमसे  कहते हैं - ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा यह है कि जिन्हें उसने मुझे सौंपा है, मैं उनक में से एक का भी सर्वनाश  न होने दूँ।’’ और मत्ती 1814 में प्रभु कहते हैं - ‘‘इसी तरह मेरा स्वर्गिक पिता नहीं चाहता कि उन नन्हों में से एक भी खो जाये।’’ जि, हाँ, ख्रीस्त  में प्यारे भाईयों प्रभु को हमेशा  हमारा ख्याल रखता है। और जब हम हमारे पापमय जीवन द्वारा उनसे दूर हो जाते हैं, भटक जाते हैं तो वे अत्यंत व्याकूल हो उठते हैं। वे उस चरवाहे की  तरह बेचैन व परेशान  हो जाते हैं जिसकी एक भेड जिसे वह बेहद प्यार करता था, खो गई हो अथवा उस स्त्री की तरह जिसने अपने पसीने की कमाई का फल, अपना एक सिक्का खो दिया हो। ये दोनो तब तक उसे खोजते रहते हैं जब तक वे उसे नहीं पाते और पाने पर अन्यंत आनन्दित होते हैं, जश्न मनाते हैं।

प्रभु की वही वाणी जो मूसा को सीनई पर्वत पर सुनाई पडी थी आज हमारे कानों में, कलीसिया के अगुवाओं के कानों में गूँज रही है - ‘‘पर्वत से उतरो, क्योंकि तुम्हारी प्रजा, जिसे तुम मिस्र से निकाल लाये हो, भटक गई है।’’ आज का यह वचन हर एक पुरोहित के कानों में प्रतिध्वनित होना चाहिए। तुम्हारी प्रजा भटक गई, तुम्हारी प्रजा जिसे तुमने बपतिस्मा दिया है, तुम्हारी प्रजा जिसे तुमने संस्कार दिये हैं, व पापमय लालसागर से बाहर ले आये हो, तुम्हारी प्रजा जिसका प्रभु ने तुम्हें चरवाहा नियुक्त किया है वह आज भटक गई है। इसलिए पहाड से उतरो। अपने आरामदायक, शाँतिमय, व सुरक्षित पहाड से नीचे उतरो। अपने स्वार्थ, घमंड, अहंकार के पहाड से नीचे उतरो। और अपनी भटकी हुई भेडों को वापस झूंड में लाओ। क्योंकि पिता की यह इच्छा है कि उनमें से एक भी न खो जाये, उनमें से एक का भी सर्वनाश  न हो। संत फोस्तीना को दिये दिव्य दर्शन में  प्रभु येसु ने उनसे यही कहा था कि हर किसी को यह याद दिलाओ कि मेरी दिव्य करूणा हर एक जन के लिए है। मैं हर एक आत्मा को अपनी दिव्य करूणा के द्वारा स्वर्ग में ले जाना चाहता हूँ।

प्रभु हमें खोना नहीं चाहते। हम अपने ही कुमर्मां द्वारा, स्वयं खो जाना चाहते हैं, हम स्वयं प्रभु से दूर जाने चाहते हैं, हम हमारा विनाश  स्वयं करना चाहते हैं। पर प्रभु हमें बचाना चाहते हैं। मुझे बचपन में पढी हुई ‘‘अब्बू खां की बकरी’’ नामक हिंदी का एक पाठ याद आता है जिसमें अब्बू खां के पासचांदनी नाम की एक  बकरी होती है, जिसे अब्बू बेहद प्यार करते थे अपने बाडे से रस्सी तोडकर भाग जाती है। अब्बू खां उसे ढूंढते-ढूंढते थक जाते हैं। अंधेरा होने तक जंगल में घूम-घूमकर आवाज लगाते हैं। पर चांदनी जवाब नहीं देती। वह एक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती थी। वह मालिक की आवाज़ को अनसुना कर देती है। रात को भेडियों से उसका सामना हो जाता है। पूरी रात वह हिम्मत के साथ भेडियों से लडती है लेकिन आखिर में दम तोड देती है। 

हम सब कमजोर इंसान हैं। हमारा भटक जाना, कभी-कभी प्रभु से दूर जाना स्वाभाविक है परन्तु जिस घडी प्रभु की वाणी हमारे कानों पडती है। जब प्रभु हमें पुकारते हैं हमें उनकी और लौट आना चाहिए। हमें हमारा मन फिरा कर पश्चाताप करते हुए प्रभु से मेल-मिलाप करना चाहिए। अन्यथा हमारा भी हाल चांदनी की तरह होगा। शैतान के हाथ हमें हार का सामना करना पड सकता है। वह हमारे शरीर व आत्मा दोनों का नर्क में सर्वनाश कर सकता है। साथ ही जो भी प्रभु की भेडों के रखवाले नियुक्त किये गये हैं वे भी जागरूक व सतर्क रहें। हर खोई हुई भेड का उनसे लेखा लिया जायेगा। नबी एजेकिएल के ग्रन्थ में 34 :2 में लिखा है - "प्रभु ईश्वर यह कहता है धिक्कार इजराइल के चरवाहों को वे केवल अपनी देखभाल करते हैं! क्या उन्हें झुंड की देखभाल नहीं करनी चाहिए

आइये प्यारे मित्रों हम प्रभु की आवाज़ को अपने जीवन में सुनें व प्रभु के पास लौटकर आ जाएँ , हमें प्यार करता है , हमे फिर से अपनाएगा और अपनी प्रिय प्रजा बनाएगा , आमेन !

Friday, 6 September 2019

वर्ष का तेईसवां रविवार, 8 सितम्बर 2019: Hindi Reflection


येसु का सच्चा शिष्य बनने की शर्तें 
प्रज्ञा ग्रंथ 9ः13-18
फिलेमोन 9-10,12-17
लूकस 14ः25-33
ख्रीस्त में प्यारे विश्ववासियों, पृथ्वी पर अब तक निवास करने वाले प्राणियों में सबसे बुद्धीमान और अपनी विचारने तर्क करने की शक्ति में सर्वोपरी सिर्फ इंसान ही है। आज उस इंसान ने विज्ञान और तकनिकी के क्षेत्र में काफी तरक्की की है। अंतरिक्ष की उडान भरकर मानव ने चाॅंद और ग्रहों की जानकारी हासिल की है। हाल ही में हमारे देश  ने चंद्रयान-2 को चंद्रमा पर भेजा था, पर दुर्भाग्यवश वह सफलतापुर्वक चंद्रमा की सतह पर नहीं उतर सका। ऐसे कई प्रयास देश  और दुनिया के कई वैज्ञानिक कर चुके हैं। पर फिर भी कई रहस्यों पर अभी तक पर्दा पडा हुआ है। एक ओर इंसान की सारी सफलताओं पर ख़ुशी  व्यक्त करते हुए हमें दूसरी ओर आज के वचन में बताई गई सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। 
आज पहले पाठ में वचन कहता है - ‘‘जो हमारे सामने हैं, उसे हम मुश्किल से समझ पाते हैं, तो आकाश में क्या है, इसका पता कौन लगा सकता है? जि, हाँ हमारे सामने बैठे व्यक्ति के बारे में ही हमें पूरी तरह से नहीं मालुम, हमारे पडोसी के घर की ही हमें पूरी जानकारी नहीं तो आकाश और अंतरिक्ष की जानकारी रखना इंसान के लिए वाकय बहुत कठिन है। पर हम यह देखते हैं कि अंतरिक्ष और अंतरिक्ष के नक्षत्रों की कुछ जानकारी इंसान ने हासिल जरूर कर ली है। इसके बारे में आज के पाठ में प्रभु का वचन आगे कहता है - ‘‘यदि तुने प्रज्ञा का वरदान नहीं दिया होता और पवित्र आत्मा को नहीं भेजा होता,, तो तेरी इच्छा कौन जान पाता?’’ यह वचन हमें बतलाता है कि प्रभु ने इंसान को अपनी इच्छा और अपनी सृष्टि को समझने के लिए प्रज्ञा और बुद्धी यदि न दी होती तो कोई भी इन्हें नहीं जान पाता। वचन हमें यही बतलाना चाह रहा है कि यह ईश्वर ही है जो मनुष्यों को पवित्र आत्मा और प्रज्ञा प्रदान करता है ताकि वे ईश्वर की सृष्टि को जानें व ईश्वर की महानता का बखान कर सकें। परन्तु देखा ये जाता है कि मनुष्य अपनी उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को देते हुए ईश्वर जो सब प्रज्ञा और ज्ञान का स्रोत है उसे नकार देता है। कई वैज्ञानिक तो ईश्वर के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खडा करते हुए उनके अस्तित्व को नकारते हैं। आज प्रभु का वचन यह स्पष्ट कर रहा है कि विज्ञान और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ ईश्वर द्वारा दी गई प्रज्ञा के बिना संभव नहीं। 
आज के सुसमाचार में प्रभु येसु अपने अनुयायों के सामने एक चुनौती रख रहे हैं जिससे कई लोग दूर भागते हैं   आजकल कई प्रचारक मसीहियों को भ्रम में डाल रहे हैं। उनके प्रवचनों में वे ये बतलाते हैं कि येसु में विश्वास करने पर व उनसे प्रार्थना करने पर तुम्हारी दुनियाई चीजों में तरक्की होगी। तुम्हें रूपया- पैसा मिलेगा, धन-दौलत मिलेगी, इज्जत और प्रसिद्धी मिलेगी, प्रभु तुम्हारे घरों को भरेगा आदि। अब, ऐसा नहीं है कि प्रभु ये सब देने में असमर्थ हैं पर इन सब चीजों को हासिल कर लेने से हमें कोई खास फाइदा नहीं होने वाला है। क्योंकि  ये सब चीजें इस दुनिया की है, इनका साथ केवल हमारी मौत तक होता है। उसके बाद ये और किसी की हो जायेंगी। फिलिपियों 3ः20 में वचन कहता है - ‘‘हमारा देश  तो स्वर्ग है और हम स्वर्ग से आने वाले मुक्तिदाता की राह देखते रहते हैं।’’ हमारा अंतिम मुकाम, हमारे जीवन का लक्ष्य स्वर्ग है। इसलिए एक मसीही के लिए स्वर्ग और स्वर्गिक बातों को जानना, समझना व उन पर विश्वास करते हुए उस ओर आगे बढना सबसे महत्वपूर्ण है। चंद्रमा कितना बडा है; वो हमसे कितना दूर है; वहाँ पर क्या-क्या है? आदि जानना अच्छा है पर मुक्ति के लिए जरूरी नहीं। 
इसलिए यदि कोई वास्तव में प्रभु येसु का अनुसरण करना चाहता है तो उसे पूरी तरह से अपना जीवन उसकी मरजी पर चलने के लिए अर्पित करना पडेगा। दुनिया के सब रिश्तों, संबंधों, सब प्रकार के दुनियाई ज्ञान, व धन सम्पत्ति से अनासक्त होना पडेगा। यह एक मुश्किल काम है पर एक सच्चे मसीही के लिए और कोई विकल्प नहीं है  इसलिए  प्रभु कहते हैं कि हमें यदि हमारे जीवन की ईमारत स्वर्ग में बनाना है, तो हम इसके लिए पहले से इसके लिए दृढ निष्चय कर लें कि मुझे यह करना ही है। उसके लिए मुझे क्या-क्या समस्याऐं, व असुविधायें हो सकती है उसकी हिसाब-किताब हम पहले से ही लगा लें। ताकि जब येसु का शिष्य बनकर, स्वर्ग की ओर बढते समय यदि कोई चुनौती आये तो हम  पीछे न हटें लेकिन डटकर उसका सामना करते हुए नित आगे बढते जायें और येसु मसीह का एक सच्चा शिष्य बन सकें। आमेन।  




Sunday, 1 September 2019

मरियम रोगियों का स्वास्थ्य



मरियम रोगियों का स्वास्थ्य

आाज हम माता ‘मरियम रोगियों का स्वास्थ्य’ इस विषय पर मनन चिंतन करते हैं। प्यारे मित्रों पवित्र बाइबल के अनुसार बिमारियों की जड़ मनुष्य का पाप है। सब प्रकार के मानवीय दुःखों की शुरूआत मनुष्य के आदि पतन से होती है। हमारे आदि माता-पिता ने पाप किया और वे ईश्वर की कृपा व महिमा से वंचित हो गये। और उनके बाद आने वाली उनकी संतानें पीढी दर पीढी पाप 

करती रहीं और परिणामस्वरूप ईश्वर की कृपा व महिमा से वंचित रही। रोमियों 3ः23 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘सबों ने पाप किया और सब ईष्वर की महिमा से वंचित किये गये है।’’ तो हमारे रोगों और दुःखों का कारण यही है। हम ईश्वर की महिमा से दूर हैं। जब तक हमारा उद्धार नहीं हो जाता, जब हम अपने स्वदेश  याने स्वर्ग में ईश्वर के महिमाय निवास में नहीं लौट जाते दुःख पीडायें और रोग तो हमेशा मानव जीवन का हिस्सा बने रहेंगे। 


परन्तु पवित्र बाइबल हमें यह भी बतलाती है कि हमारा ईश्वर एक प्रेमी ईश्वर है। स्तोत्र ग्रन्थ  34ः19 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘प्रभु दुःखियों से दूर नहीं है। जिनका मन टूट गया है, प्रभु उन्हें सँभालता है।’’ और स्तोत्र 103ः3 में वचन कहता है - ‘‘वह तेरे सभी अपराध क्षमा करता और तेरी सारी दुर्बलताएँ दूर करता है।’’ याने प्रभु हमारी दुर्बलताओं को हमारे पापमय स्वभाव को जानता है। हम सारे पापी हैं यह कह कर वह हमें नहीं त्यागता परन्तु वह हमारे पापों को क्षमा करता और हमें चंगा करता है। जि हाँ निर्गमन ग्रंथ 15ः26 में वचन कहता है - ‘‘मैं वह प्रभु हूँ जो तुम्हें चंगा करता है।’’ 

सुसमाचार में हम पाते हैं कि प्रभु येसु कई रोगियों को चंगाई प्रदान करते हैं। रोगी उनके पास आते थे और वे उन पर तरस खाकर उन्हें स्वस्थ कर देते थे। वहीं प्रेरित चरित में हम पाते हैं उन्हीं येसु मसीह के नाम पर प्रेरितगण रोगियों को चंगा करते हैं। और आज भी कई लोग प्रभु येसु मसीह के नाम पर चंगाई पाकर उनके महिमामय नाम की गवाही देते हैं। क्योंकि वह एक जिंदा खुदा है और आज भी कार्य कर रहा है। 

प्रभु येसु को चंगाईदाता कहकर पुकारना इसलिए उचित जान पडता है परन्तु कैथोलिक भाई बहनों व कई मरियम भक्तों के द्वारा मरियम को रोगियों का स्वास्थ्य कहकर पुकारना कई लोगों को नहीं सुहाता। कई लोग यह कहते हैं कि ऐसा कहकर हम मरियम को येसु की बराबरी में लाकर खडा कर देते हैं। पर प्यारे भाईयों और बहनों ऐसा हरगिज नहीं है। हमें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि मरियम हम सब के जैसी एक मनुष्य है। जि, हाँ पर वे मुक्तिदाता येसु की माँ होने के नाते ईश्वर की कृपापात्र है। स्वर्गदूत गाब्रिएल जब उनके पास आया तो सबसे पहली बात जो उसने मरियम के बारे में कही वो यही थी - ‘‘प्रणाम प्रभु की कृपा पात्री..’’ दूसरे शब्दों में कहें तो प्रणाम प्रभु की कृपा से भरपूर अथवा कृपाओं के भंडार। मरियम येसु अथवा ईश्वर की बराबरी तो नहीं करती पर ईश्वर की मुक्तियोजना में अपनी भागिदार निभाकर वह येसु के साथ हमारी मुक्ति में सहभागिनी हैं। 

प्रभु येसु संत योहन 10ः10 में कहते हैं मैं इसलिए आया हूँ कि वे जीवन प्राप्त करें पर बहुतायत का जीवन प्राप्त करें। प्रभु येसु हमें हर तरह से जीवन की परिपूर्णता देने आये हैं । याने हमें रोगों से, श्रापों से, बंधनों से, व सब प्रकार के दुःख दर्दों से मुक्त करने आये। और इन सब कार्यों को सम्पन्न करने हेतु मरियम ने येसु के साथ सहभागिता निभाई है। मरियम ने ईश्वर की इस मुक्तियोजना को सम्पन्न कराने हेतु मुक्तिदाता को हमें  प्रदान किया जो हमें हमारे सब रोगों से चंगाई प्रदान करता है। जिसमें मरियम की सहभागिता को नकारा नहीं जा सकता। 

वचनों को थोडा और गहराई से यदि हम पढें तो यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाएगी 

प्रज्ञा ग्रंथ 16ः12 में हम पढते हैं - ‘‘क्योंकि उसे किसी जडी-बूटी या लेप से स्वास्थ्यलाभ नहीं हुआ, परन्तु प्रभु तेरे शब्द ने उसे चंगा किया।’’ 

और वैस ही स्तोत्र 107ः20 में भी हम पढते हैं - ‘‘उसने अपना वचन भेजकर उन्हें चंगा किया’’ 

पवित्र बाइबल इन वचनों के द्वारा यह स्पष्ट करती है कि ईश्वर का वचन चंगाई प्रदान करता है, स्वास्थ्य प्रदान करता है। और संत योहन के सुसमाचार 1ः14 में हम पढते हैं - "शब्द  ने शरीर धारण कर हमारे बीच निवास किया।’’ 

अब हम यह तो अच्छी तरह से जानते हैं कि शब्द ने शरीर कहाँ धारण किया।  बेशक - मरियम के गर्भ में। मरियम के गर्भ में स्वास्थ्य प्रदान करने वाला शब्द शरीर बना। मरियम वह खुशकिस्मत इंसान  थी जिनकी कोख मेें दुनिया की सारी बिमारियों का स्वास्थ्य, ईश्वर का वचन, नौ महिने तक रहकर इंसान के रूप में इस दुनिया के दुःख दर्द व बिमारियाँ हरने आया।  अतः  मरियम को रोगियों का स्वास्थ्य उनकी किसी निजी ताकत  अथवा शक्ति के  कारण नहीं बोलते, पर सब रोगों  के स्वास्थ्य अनादि से विद्यमान वचन को मनुष्य रूप में हमें प्रदान करने में उनके द्वारा निभाई महान भुमिका के कारण कहते हैं। साथ ही येसु को अपने शरीर में धारणकर वह स्वयं येसुमय हो गई थी या फिर येसु से भर गई थी। 

प्रेरित चरित 3 में हम पढते हैं पेत्रुस और याकूब एक लंगडे व्यक्ति को येसु मसीह के नाम पर चंगाई प्रदान करते हैं। और आज भी कई प्रभु के सेवक सेविकाएं येसु मसीह के नाम पर उनके वचनों के सामर्थ्य से चिन्ह, चमत्कार और चंगाई प्रदान करते हैं। यदि हम जैसे निरे मनुष्यों की प्रार्थनायें इतनी शक्तिशाली हैं कि रोगी चंगा हो जाते हैं; हालांकि हम तो ईश्वर  से काफी दूर हैं; तो फिर मरियम जिन्होंने खुद चंगाईदाता वचन को अपने शरीर में धारण किया, और वे  सब इंसानों में येसु को सबसे करीबी से अनुभव करने वाली शख्सियत है फिर चंगाई प्रदान करने में वे सबसे अग्रणी क्यों नहीं हो सकती है?

इतिहास गवाह है माता मरियम के आदर में स्थापित विभिन्न तीर्थ स्थानों पर प्रार्थना करने पर लाखों लोगों को चंगाई व स्वास्थ्य मिलता है चाहे वो लुर्द हो या फातिमा, वेलांकनी हो या चैनपुरी। तो जब ईश्वर मरियम की मध्यस्थ प्रार्थनाओं के द्वारा अपने चंगाई के कार्यों को सम्मन्न कराकर मरियम को स्वस्थ प्रदान करने वाली, घोषित कर ही रहा है तो फिर मरियम का बिमारों का स्वास्थ्य कहकर पुकारने को मैं कभी अनुचित नहीं मानता। 

तो आईये हम सब प्रकार विवाद, शंकायें और उलझनें दूर करें। और अपने दुखों और रोगों को स्वास्थ्य की माता मरियम के पास लेकर आयें और उनसे प्रार्थना करें कि जैसे वह हमारी मुक्ति में सहभागिनी हैं वैसे वह हमें सब प्रकार से - शारीरिक, मानसिक और आद्यात्मिक बंधनों से छुटकारा दिलकार येसु के पास हमें भी ले जायें। ताकि हम भी उनके साथ तथा सारी संतमंडली के साथ स्वर्ग में येसु से जाकर संयुक्त हो जायें, जहाॅं फिर न कोई रोग है और न कोई बिमारी।