Tuesday, 24 March 2020

दुखभोग का पाॅंचवा इतवार 29 March 2020


मौत से न ड़र, येसु ने मौत को हराया है 

डर किसे नहीं लगता? हम सब कभी न कभी किसी न किसी बात या चीज़ से ज़रूर डरते हैं। किसी को अंधकार का डर है, तो किसी को ऊँचाई का, किसी को किसी जानवर से डर लगता है तो किसी को किसी व्यक्ति से। पर इन सब प्रकार के डर के पीछे एक बडा डर छीपा बैठा है और वह डर है मौत। मौत का डर हर किसी को होता है क्योंकि मौत के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। जीवन, ये दुनिया, हमारे दोस्त, हमारे माता-पिता, हमारी घर, हमारी दौलत, सब कुछ हमारी पकड से फिसल जाता है। मरने का बाद क्या होगा पता नहीं। मौत के परे या फिर मौत से आगे क्या है पता नहीं। इसलिए हमें डर लगता है। मुझे डर है कि मरने के बाद मैं किधर जाऊगा? स्वर्ग, नरक या और कहीं? मरने के बाद सब कुछ मेरे कन्टोल से बाहर चला जायेगा। यही तो डर का विषय है। पर मैं जानता हूॅं एक व्यक्ति को जिसे मौत, कब्र और नरक सब पर अधिकार है। कोई है जो जिसके सामने मृत्यु और अधोलोक के फाटक नहीं टिक पाते, कोई है जो मेरे जीवन के बिखरे टुकडों को समेट कर मेरा पुनर्निमाण कर सकता है। कोई है जो कब्रों में से निकालकर जीवन देने में सक्षम है। और उसका नाम है - येसु। दुखभोग के इस समय में आईये हम मनन चिंतन करें उस येसु पर जो मृत्युंजय है, जिसने मौत को हराया है। जल्दी ही हम पास्का की सुबह इस महान घटना को मनायेंगे। पुराने विधान में नबी एजेकिएल के ग्रंथ 37 में एक विषेष घटना के बारे में हम सुनते हैं जहाॅं पर सूखी हड्डियों से भरी घाटी है और प्रभु उन हड्डियों में फिर से जान भर देते हैं इसी भविष्यवाणी का अंष आज के हमारे पहले पाठ में हमने सुना - ‘‘मेरी प्रजा! जब मैं तुम्हारी कब्रों को खोल कर तुम लोगों को उन में से नकालूंगा, तो तुम लोग जान जाओगे कि मैं ही प्रभु हूॅं। मैं तुम्हें अपना आत्मा प्रदान करॅंगा और तुम में जीवन आ जायेगा। मैं तुम्हें तुम्हारी अपनी धरती पर बसाउॅंगा और तुम लोग जान जाओगे कि मैं प्रभु, ने कहा और पूरा भी किया।’’ इस भविष्यवाणी प्रभु अपने नवनिर्माण की बात करते हैं, अपनी प्रजा के नव निर्माण इस्राएलियों के राष्ट का नवनिर्माण। जिसे प्रभु ने वास्तव में पूरा किया। परन्तु इस वचन की गहराई में प्रभु न केवल इस्राएलियों के राज्य के पुनर्निमाण की बात कर रहे हैं परन्तु हम में से हर एक के जीवन की बात कर रहे हैं। प्रभु हम मे से हर एक को पुनर्जिवन देंगे। हमारे टूटेपन से, हमारी लज्जापन, हमारे जीवन के बिखरेपन में प्रभु फिर से चमन और बहार लायेंगे। हम अपने दम पर ये सब नहीं कर सकते पर प्रभु येसु इसे हमारे जीवन में करके दिखायेंगे। जिस बात को प्रभु ने एजिकिएल में बताया उसे उन्होंने आज के सुसमाचार योहन 11 में लाजरूस को जिलाकर, करके दिखलाया। लाजरूस को कब्र में रखे चार दिन हो गये थे और वे कह रहे थे कि कब्र सेे अब तो बदबू आती होगी। येसु कब्र पर जाते हैं और वे क्या करते हैं। वे जिसे एजिकिएल ने कहा उसे पूरा करते हैं। एजेकिएल में लिखा है कि जब मैं तुमको कब्र से बाहर निकालूॅंगा तो तुम जान जाओगे कि मैं प्रभु हूॅं। हम कैसे जानेंगे कि प्रभु ही ईष्वर है? जब वह हमारी कब्रों को खोलेंगे और हमकों हमारे कब्रों मंेसे बाहर निकालेंगे। ईष्वर होने का सबूत ये है जो मूरदोें को जीवन देता है। 
येसु अब साबित कर रहे हैं कि वह कौन हैं। वह नबियों द्वारा भविष्वाणी करके बताया गया ईष्वर है। वह कहते हैं कि मैं टूटे हुओं का ईष्वर हॅंू। वह बडे अधिकार के साथ लाज़रूस को आवाज़ देते हैं। लाज़रूस बाहर निकल आओ और मूरदा बाहर निकल आता है। पर उसका शरीर पट्टियों से बंधा हुआ था। यही आपकी और मेरी कहानी है। बपतिस्मा में हम मसीह के साथ मरकर दफनाये गये हैं, और उनके पुनरूत्थान के साथ जी उठे हैं। उनका जीवन अब मुझमें हैं, आज हम उनके जीवन में भागिदार हैं। पर फिर भी मैं देखता हूॅं कि कुछ चीजें़ है जो मुझे अब भी बंधनों में रखती हैं। येसु का आदेष केवल लाज़रूस को न केवल जिंदा करने के लिए था परन्तु उन्होंने उसकी पट्टियों को खोलने के लिए भी कहा। येसु का ईष्वरत्व इसलिए न के लिए हमें जीवन देने का है परन्तु हमें बंधन मुक्त करने का भी है। वो हमें न केवल जीवन देने आये बल्कि हमारे जीवन को सब प्रकार के पाप व बुराईयों के बंधन से मुक्त करने आये हैं। येसु से मुलाकात होने पर हम एक स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं और वह स्वतंत्रता हमें येसु के महान नाम की घोषणा करने के लिए जाने के लिए प्रेरित करती है। योहन 1145 - बहुत से यहूदी जो वहाॅं पर आये हुए थे उन्होंने ये सब देखा और येसु में विष्वास किया। 
दुखभोग के इस समय में यदि हम किसी भी प्रकार के बंधन से जकडे हुए हैं आईये हम येसु के पास जायें, हम पाप स्वीकार करें, और येसु को हमें बंधनों से मुक्त करने दें। यदि आप बपतिस्माधारी हैं तो आप में एक नया जीवन हैं। पर यदि आप बपतिस्मा के बाद के जीवन में बंधनों का अनुभव करते हों तो जाईये एक अच्छा पाप स्वीकार करिये और येसु के द्वारा दी जाने वाली स्वतंत्रता का अनुभव कीजिए। येसु ने लाज़रूज को जिंदा किया और उसके द्वारा यहूदियों को ईष्वर के होने का एक साक्ष दिया। आप यदि ईष्वर के बच्चे होनी आज़ादी का अनुभव करेंगे तो आप औरों के लिए एक साक्ष बन जायेंगे। आप लोगों को देखकर लोग यह विष्वास करेंगे कि येसु ही प्रभु है। आमेन। 

Monday, 16 March 2020

दुखभोग काल का चौथा इतवार (Year A ) 22 मार्च 2020

1 सामुएल 16, 1- 7.10-13
एफेसिओ 5, 8-14
योहन 9, 1-41
आध्यात्मिक अंधापन 

आज के मनन चिंतन के लिए हमारे पास है एक अंधे व्यक्ति के चंगा किये जाने का सुसमाचार पाठ है। प्रभु येसु जन्म से अंधे एक व्यक्ति को चंगाई प्रदान करते हैं। फरीसी और शास्त्री इस चंगाई को लेकर बडा बवाल खडा कर देते हैं। और प्रभु येसु पर विश्राम दिवस को अपवित्र करने का आरोप लगाते हैं। अंत में वे उस व्यक्ति को सभागृह से बहिष्कृत कर देते हैं। चंगा करते समय वह व्यक्ति नहीं जान रहा था कि जिसने उसे चंगा किया है वह कौन है। बाद में प्रभु येसु उससे मिलते हैं और अपने आपको उस पर प्रकट करते हैं, और वह प्रभु की आराधना करता है। योहन इस चमत्कार के द्वारा हमारे सामने लोगों के आध्यात्मिक अंधेपन पर प्रकाश  डालता है तथा प्रभु येसु को संसार की ज्योति के रूप में प्रस्तुत करता है।
बडी रोचक बात यह है कि यहां चमत्कार का विवरण केवल दो वाक्यों में समाप्त हो जाता है लेकिन उस चमत्कार को लेकर जो विवाद खडा होता है उसका विवरण 39 वाक्यों में किया गया है।

वह व्यक्ति शारीरिक रूप से अंधा था जिसे प्रभु दृष्टि प्रदान करते हैं और वह देखने लगता है। उसी प्रकार प्रभु चाहते थे कि फरीसी और शास्त्री लोग जो कि आध्यात्मिक रूप से अंधे हैं वे आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त करें। पर वे अपने अकडपन व जिद्द के कारण नहीं सुधर पाये। फरीसियों का धार्मिक रवैया बडा विचित्र था। वे सोचते थे कि वे धर्मग्रंथ के ज्ञाता हैं। उन्हें सब कुछ मालुम है। बाकि लोग कुछ भी नहीं जानते हैं। वे सबसे धार्मिक एवं ज्ञानी लोग हैं। अपने इसी रवैये के चलते वे हमेश  दूसरों में दोष निकालने व उन पर उंगली उठाने की ताक में लगे रहते थे। यही उनका अध्यात्मिक अंधापन है। उनको दूसरों की अच्छाई कभी नज़र नहीं आती। प्रभु  येसु ने जो भलाई का काम किया उस अंधे व्यक्ति के लिए वो उन्हें नहीं दिखा। उन्हें दिखा तो सिर्फ विश्राम दिवस का कानून कि उस दिन कोई काम न करे।

आध्यात्मिक अंधापन कई प्रकार का हो सकता है। जैसा कि हमने पहले पाठ में सुना जब समुएल  दाऊद राज-अभिषेक करने गया तो उसने यशेए  के बडे बेटे को देखा, उसके रंग-रूप, और लम्बे कद को देखकर सोचता है कि वही ईश्वर का अभिषिक्त है। परन्तु प्रभु उनसे स्पष्ट शब्दों में कहते हैं - ‘‘उसके रूप-रंग और लम्बे कद का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप -रंग देखता है, किंतु प्रभु हृदय देखता है।’’

हम भी इस प्रकार के अंधेपन के शिकार कई बार हो जाते हैं। हम बाहरी तौर पर देखकर लोगों के ऊपर निर्णय देते हैं। हम वास्तविकता को जाने बगैर ही कई बार लोगों के विरूद्ध बातें करते हैं। उन्हें कोसते हैं, उन पर दोष लगाते हैं। और फरीसियों की तरह ये सोचते हैं कि हम सब कुछ जानते हैं। हमें सब पता है। ऐसे लोगों का दृष्टिकोण यही रहता है कि जो वे देखते और सोचते हैं वही सच्चाई है। अपनी संकीर्ण सोच के पैमाने से सब लोगों को देखते व जज करते हैं।
शारीरिक अंधेपन को दूर करना शायद आसान है लेकिन अध्यात्मिक अंधापन दूर करना मुश्किल काम है। क्योंकि शारीरिक रूप से अंधे व्यक्ति को तो यह मालूम रहता है कि वह अंधा है। वह इस सच्चाई को स्वीकार करता है। लेकिन आध्यात्मिक रूप से अंधे लोग इस बात को स्वीकार नहीं करते कि वे अंधे हैं। इसलिए उनका सुधार बहुत मुश्किल रहता है। आध्यात्मिक रूप से अंधे लोग बेहद स्वार्थी होते हैं। उन्हें अपने जीवन से बाहर कुछ दिखाई नहीं देता। उन्हें समाज में हो रहे पाप नहीं दिखते, गरीबों के आँसू, बेसहारों की पीडा, व दलितों की दयनीय स्थिति नज़र नहीं आती। उन्हें दिखता है तो सिर्फ अपना स्वार्थ। वे अंधकार में जीवन जीते हैं। हम जानते हैं कि जहाँ अंधकार है वहां कुछ देख नहीं पाते। परन्तु जहाँ प्रकाश है वहां सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। इसलिए आज के दूसरे पाठ में प्रभु येसु हम से कहते हैं - ‘‘आप लोग पहले अन्धकार थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ज्योति बन गये हैं। इसलिए ज्योति की संतान की तरह आचरण करें।’’ हम प्रभु येसु के शिष्य  होने के नाते अंधकार को पार कर ज्योति में आ गये हैं। प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ। जो मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी’’ (योहन 8,12)। जो प्रभु येसु में विश्वास करते हैं, जो कोई उनका अनुसरण करते हैं वे पापमय अंधकार में नहीं भटकेंगे। प्रभु येसु की यह ज्योति हमें कहाँ से प्राप्त होगी।? स्तोत्र 119,105 में वचन कहता है - ‘‘तेरा वचन मुझे ज्योति प्रदान करता और मेरा पथ आलोकित करता है।’’ जि हाँ प्रभु के वचन हमारे जीवन के लिए ज्योति हैं। यदि हम हमारे जीवन का आध्यात्मिक अंधापन दूर करना चाहते हैं तो हमें हर बात हर चीज़, वचन के उजाले में देखने की ज़रूरत है। कुछ करने या बोलने के पहले हम वचन के पैमाने पर हर चीज़ को तोलें ।

आईये हम वचन की रोशनी में जीवन की हर घटना को देखने की कोशिश करें। जब तक हम प्रभु के वचनों को पढेंगे नहीं, उनके ऊपर मनन चिंतन नहीं करेंगे हम अंधकार में ही भटकते रहेंगे। वचन को सिर्फ पढने मात्र से हमें दिव्य ज्योति प्राप्त नहीं होगी। प्रभु कहते हैं - ‘‘तेरी शिक्षा का पालन करने से ही नवयुवक निर्दोष आचरण कर सकता है’’ (स्तोत्र 119, 9)। और संत याकूब हमें हिदायत देते हैं - आप लोग अपने आप को धोखा न दें। वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें’’ (याकूब 1,22)। केवल वचन पढकर अथवा सुनकर ये न सोचें कि हम ने हमारा कर्तव्य पूरा कर लिया। हमें रौशनी मिल गयी है,ं हमें ज्योति मिल गयी है। वचन के श्रोता बनने भर से हमारा जीवन आलोकित नहीं होता उसका पालन करने से वचन की रौशनी हमारे जीवन में प्रभावशाली होती है।। आईये, हम तपस्या के इन दिनों में, प्रभु वचन से अपनी आध्यात्मिक भूख व प्यास मिटायें। व प्रभु के वचन को पढकर, उसे सुनकर अपने जीवन में उस वचन को काम करने दें। ताकि हम सचमुच में ज्योति की संतान के रूप में इस संसार में रह सकें। आमेन।


Watch on Youtube


Pray Psalm 91 everyday for protection against Corona Virus. 
Click the link for Special prayer - https://youtu.be/GGiMRNCj7Ls


Have a Blessed Sunday 

Tuesday, 10 March 2020

दुखभोग का तीसरा इतवार, (Year A ) 15 मार्च २०२०


निर्गमन 17:1-7
रोमियों 5:1-11
योहन 4:5-42 
ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनोंआज के पाठों के अनुसार हम विशेष  रूप से दो बिंदुओं पर मनन चिंतन करेंगे 1) संकट में ईश्वर  पर भरोसा और 2) प्रभु येसुसंजीवन जल
1) संकट में ईश्वर पर भरोसा
आज के पहले पाठ में हमने मरूस्थल में इस्राएली लोगों की परीक्षा के बारे में सुना। करीब 430 सालों की मिस्र की गुलामी के बाद ईश्वर उन पर तरस खाकर उन्हें मूसा की अगुवाई में स्वतंत्र कराता है। उन्हें महान चिन्ह व चमत्कार दिखलाते हुए यह आश्वासन देता है कि मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर तुम्हारे साथ हूँ। जब तक सब कुछ ठीक चल रहा था कोई शिकायत नहीं थीपरन्तु जब उन पर संकट आयाउनका विश्वास डगमगाने लगा। जब मरूभूमि में उन्हें पानी नहीं मिला तो वे मूसा व ईश्वर के विरूद्ध भुनभुनाने लगे। समुद्र में रास्ता बनाकर उन्हें बचाने वाले ईश्वर पर से उनका भरोसा शीघ्र ही उठ गया। तब ईश्वर ने मूसा को आदेश  दिया कि वह चट्टान पर अपना डंडा मारे और तुरन्त ही वहां से पानी की धारा बह निकली। सबों ने पानी पिया व अपनी प्यास बुझाई। प्रभु ने उस समय उनकी प्यास तो बुझाई लेकिन अपनेे अविश्वास का खामियाजा उन्हें भुगतना पडा। उनमें से एक भी प्रतिज्ञात देश  में प्रवेश नहीं कर सका। सिर्फ उनकी संतानें वहां पहुँची।

हम भी कितनी बार हमारे जीवन में दुःख व संकट के बादल मंडराने पर इस्राएली लागों की भांति ईश्वर के विरूद्ध कुडकुडाते हैंऔर शिकायत करते हैं। हम प्रभु से कहते हैं - देख कि हम दुख संकट में है और तू देखता ही नहीं। हम आभावों में जी रहे हैं और तू हमारी तरफ ध्यान ही नहीं देता! क्या प्रभु सचमुच हमारे दुख-संकट को नहीं देखताक्या वह हमारी पीडाओं से अपना मुंह मोड लेता हैहरगीज नहीं। वह हमसे कहता है येरमियाह 49:16 में - ‘‘मैं ने तुम्हें अपनी हथेलियों पर अंकित किया हैतुम्हारी चार दिवारी निरन्तर मेरी आँखों के सामने है।’’ हमारा घरहमारी चार दिवारी हमेशा  उसकी निगाह में है। ऐसा कुछ भी नहीं जो उनकी जानकारी के बिना हमारे साथ घटित होता हो। इसीलिए भजनकारभजनसंहिता 139 में कहता है - ‘‘ईश्वर तू मुझे जानता है। मैं चाहे लेटूँ या बैठूँतू जानता है। . . . मैं चाहे चलूँ या लेटूँतू देखता है।’’ जि हाँ  प्यारे भाईयों और बहनों ईश्वर हर समय हमें देखता है। इसलिए संकट के समय भी हमें धैर्यपूर्वक उस ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। उनका वचन कहता है इसायाह 49:8 में - ‘‘मैं उपयुक्त समय में तुम्हारी सुनुँगामैं कल्याण के दिन तुम्हारी सहायता करूँगा।’’ प्रभु अपने समय व अपनी योजना के मुताबिक हमारे जीवन में कार्य करेगा। और उसकी योजनाहमेशा  हमारे हित में ही होती है। वे कहते हैं - ‘‘क्योंकि मैं तुम्हारे लिए निर्धारित अपनी योजनाएँ जानता हूँतुम्हारे हित की योजनाएँअहित की नहींतुम्हारे लिए आशामय भविष्य की योजनाएँ’’ (यिरमियाह 2911)। वचन कहता है - ‘‘तुम प्रभु पर अपना भार छोड दोवह तुम को सम्भालेगा। वह धर्मी को विचलित नहीं होने देगा’’ (स्तोत्र 5523) इसलिए हम सदैव  ईश्वर पर अपना पूर्ण भरोसा बनाये रखें। क्यांकि जो कोई ईश्वर पर भरोसा रखता है वचन कहता है वह उस पेड के सदृष है जो जल स्रोत के पास लगाया गया हैजिसकी जडें पानी के पास फैली हुई है। वह कडी धूप से नहीं डरता...वह सूखे के समय भी चिंता नहीं करता (यिर 177-8)। प्रभु पर भरोसा रखने वाला जलस्रोत के निकट लगे पेड के समान निष्चिंत रहता है। हम भी प्रभु पर भरोसा रखें व निश्चिन्त रहें।

२)  प्रभु येसु मसीह जीवन का जल
हमने पहले पाठ में सुना कि इस्राएली लोगों को ईश्वर ने मरूभूमि में चमत्कारिक ढंग से जल पिलाया था। यह जल तो सिर्फ उनकी शारीरिक अथवा भौतिक प्यास ही बुझा पाया। लेकिन आज के सुसमाचार में हमने सुना प्रभु येसु समारी स्त्री से कहते हैं - ‘‘जो मेरा दिया हुआ जल पिता हैउसे फिर कभी प्यास नहीं लगेगींजो जल मैं उसे प्रदान करूँगावह उस में स्रोत बन जायेगाजो अनन्त जीवन के लिए उमडता रहता है।’’ प्रभु येसु अपने शिष्यों  के साथ येरूसालेम की ओर जा रहे थे। वे समारिया होते हुए जाते हैं। यात्रा करते-करते वे थक जाते हैं और याकूब के कुएँ पर पानी पीने जाते हैं। वहांँ भरी दुपहरी में एक स्त्री जो समाज में बदनाम व कलंकित थीपानी भरने आती है। हमें ज्ञात हो कि पानी भरने का समय या तो सुबह या फिर शाम को होता हैजहांँ कई स्त्रीयाँ पनघट पर इकट्ठा होती और बतयाती हैं। पर यह स्त्री अकेले एकान्त समय में आती है। वह अन्य लोगों के सामने बाहर निकलने का साहस भी नहीं कर सकती थीक्योंकि वह भीतर ही भीतर टूट चुकी थी। पाँच पुरूषों के साथ रहने के बाद भी जीवन में कुछ अधूरापन व खालीपन महसूस करती थीअपने अंदर एक असंतोष महसूस करती थी। उसके जीवन में वास्तव में एक गहरी प्यास थी जिसे बुझाने के कई तरीके उसने अपनायेपर वह प्यास बुझी नहीं।

प्रभु येसु कहते हैं कि मैं भला गडेरिया हूँ। मैं वह गडेरिया हूँ जो निन्यानबे भेडों को छोडकर एक भेड जो भटक गई है उस की खोज में जाता है। अपने इसी वचन को आज प्रभु उस याकूब के कुएँ पर पूरा करते हैं। वहाँदोपहर की धूप में उन्होंने अपनी एक भटकी हुई भेड को पा लिया। प्रभु येसु ने उस स्त्री से संवाद किया व धीरे-धीरे उसके पुराने पापमय जीवन के घावों पर मरहम लगाते हुए उसे संजीवन जल के पास आने व मुक्ति के झरने से पीकर पूर्ण रूप से तृप्त होने का निमंत्र दिया। प्रभु के वचनों को सुनकर उस स्त्री में अनन्त जीवन के जल के लिए प्यास जागृत हुई। वह स्त्री जो दुनिया के सुखों में संतुष्टी ढूंढती थीअब जीवन का अर्थ समझने लगती है। वह जान जाती है कि ये भौतिक सुख क्षणिक है और इनसे कुछ लाभ नहीं। वहीं प्रभु येसु में उसने अनन्त जीवन के सुख का राज पा लिया। वह बोल उठती है मुझे वह जल दीजिएजिससे फिर कभी प्यास न लगे। जिस अनन्त जीवन के जल की बात आप कर रहे हैंमुझे वह दे दीजिए। मैं पूर्ण रूप से परितृप्त होना चाहती हूँ।
प्यारे भाईयों और बहनोंआज चालीसे के तीसरे रविवार में प्रभु हम सब से यही कह रहे हैं - ‘‘यदि कोई प्यासा हो तो वह मेरे पास आये। जो मुझ में विश्वास करता हैवह अपनी प्यास बुझाये’’ (योहन 7:37-38)
 नबी इसायस ने इस जल के बारे में भविष्यवाणी की थी और कहा था- ‘‘तुम आनन्दित होकर मुक्ति के स्रोत में जल भरोगे’’ (इसा 12:3) यह मुक्ति का स्रोतउद्धार का झरना स्वयं हमारे मुक्तिदाता येसु मसीह ही हैं। प्रकाशना ग्रंथ में संत योहन एक दिव्य दृष्य के बारे में बतलाते हुए कहते हैं - ‘‘इसके बाद मुझे संजीवन जल की नदी दिखायीजो ईश्वर और मेमने के सिंहासन से बह रही थी।’’ यह वही झरना है जो हमारी मुक्ति के लिए प्रवाहित होता है। यही वो जीवन की धरा है जो येसु मसीह के ह्रदय से निकलती है.  संत योहन 19:34 में हम इसके बारे में पढते हैं - ‘‘एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।’’
प्यारे भाईयों और बहनोंहम देखते हैं आजकल पीने का पानी भी बोटलों में बंदबाजारों में बिकता है। पर उद्धार का यह जल मुफ्त है। जिस जल को पीने के बाद भी मृत्यु से नहीं बचा जा सकता वह पैसों में मिलता हैपर मौत के बाद भी अनन्त जीवन देने वाला जलफ्री में मिल रहा है। वचन कहता है - ‘‘आल्फा और ओमेगाआदि और अंत मैं हूँ। मैं प्यासे को संजीवन जल के स्रोत से मुफ्त में पिलाऊँगा। यह विजयी की विरासत है। मैं उसका ईश्वर हुऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा। (प्रका. 21:6) नबी इसायाह के ग्रंथ 55:1-3 में प्रभु कहता है ‘‘तुम सब जो प्यासे होपानी के पास चले आओ। यदि तुम्हारे पास रूपया नहीं हैतो भी आओ। जो भोजन नहीं है उसके लिए तुम रूपया क्यों खर्च करते होजो तृप्ति नहीं दे सकता हैउसके लिए परिश्रम क्यों करते होमेरी बात मानो। कान लगाकर सुनो और मेरे पास आओ। मेरी बात पर ध्यान दो और तुम्हारी आत्मा को जीवन प्राप्त होगा।’’

प्रभु ने उस स्त्री से कहा कि यदि तुम ईश्वर का वरदान पहचानती और यह जानती कि वह कौन हैतो तुम उस से माँगती और वह तुम्हें संजीवन का जल देता। तुम मुझसे माँगती और मैं तुम्हें संजीवन का जल देता। माँगो और तुम्हें दिया जायेगा। जो कोई अमरता का जीवन चाहते हैं आईये हम संजीवन जल के झरने प्रभु येसु के पास चलें और उनसे वह जल माँगे जिसे पीने के बाद फिर प्यास नहीं लगतीजिसे पीने के बाद इस जीवन की सारी झंझटे समाप्त हो जाती हैजिसे पीने के बाद सारे बंधन टूट जाते हैंजिसे पीने के बाद फिर सांसारिकता की कोई प्यासकोई तृष्णा हमें नहीं सताएगीजिसे पीने के बाद किसी भी दुनियाई चीज़ के लिए मेरा मन नहीं ललचायेगाजिसे पीने के बाद जीवन सफल हो जायेगा है। आमेन।


Watch the Sermon on youtube 


 Have a Blessed Sunday and a fruitful Lenten Season. 

Tuesday, 3 March 2020

दुखभोग का दूसरा इतवार , (Year A ) 8 march 2020

उत्पत्ति ग्रंथ 12, 1-4
2 तिमिथी 2 1, 8-10
मत्ती 17, 1-9

एकान्तवास, प्राकृतिक सुंदरता, प्रार्थना एवं भक्ति तथा ईश्वरीय  अनुभव प्राप्त करने के लिए कई जवान लडके लडकियाँ कॉन्वेंट अथवा विभिन्न मठों में प्रवेश  लेते हैं। इस दुनिया की भीड-भाड एवं शोर-गुल से अलग एकांत में प्रभु भक्ति में समय बिताने का अपना अलग ही आनन्द रहता है। कई बार लोग अपने व्यस्ततम जीवन से उबकर एकान्त स्थानों पर, प्रकृति के आंचल तले, सकून और शांति पाने के लिए जाते हैं। कई लोग आश्रमों अथवा इस प्रकार के आध्यात्मिक स्थलों पर जाकर प्रार्थना में समय बिताना पसंद करते हैं, जहां उन्हें ईश्वरीय उपस्थिति का अभास होता है। कई बार फादर-सिस्टर्स जो शिक्षा, स्वास्थ्य एवं समाजिक उत्थान की विभिन्न गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं, अपना कुछ समय रिट्रीट एवं प्रार्थना में बिताने के लिए, वे एक शांतिपूर्ण स्थानों पर जाते हैं, जहां वे प्रार्थना एवं मनन ध्यान करते हुए ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते व ईश्वर से आध्यात्मिक संवाद करते हैं। आजकल रिट्रीट एवं आध्यत्मिक साधना के लिए ऐसे कई केंद्र खोले जा रहे हैं जहां लोग आकर कुछ समय बिताते व अपने जीवन की विभिन्न समस्याओं का निदान पाते हैं। कई लोग इन स्थानों पर आकर अपना पुराना जीवन बदल कर एक नई जिंदगी की शुरूआत करते हैं। कई अपनी पुरानी बूरी आदतों व पापमय जीवन को छोडकर एक नया जीवन ग्रहण कर वापस लौटते हैं। कई लोग अपनी रिट्रीट समाप्त हो जाने पर भी वहां से जाना नहीं चाहते। उन्हें वह स्थान, वहां का प्रार्थनामय माहौल, ईश्वरीय अनुभूति और आत्मिक सुकून अच्छा व सुखद लगता है। उन्हें वापस उस माहौल में जाने से डर  लगता है जहां बुराईयों का संसार है, जहां चुनौतियां है, जहां जीवन का संघर्ष है। वैसा ही आज के सुसमाचार में प्रभु येसु के शिष्यों के साथ होता है।

प्रभु येसु अपने तीन शिष्यों, पेत्रुस, याकूब और योहन को उनके सामने एक रहास्योद्घाटन करने के लिए ताबोर पर्वत पर ले जाते हैं। जब वे उस पहाड पर ही थे कि उनके सामने प्रभु येसु का मुखमंडल सूर्य की तरह दमक उठा और उनके वस्त्र प्रकाश के समान उज्वल्ल हो गये। शिष्यों को मूसा और एलियस येसु के साथ बातचित करते दिखाई पडे तथा उन्होंने आसमान से एक वाणी को यह कहते सुना - यह मेरा प्रिय पुत्र है, मैं इस पर अन्यन्त प्रसन्न हूँ, इसकी सुनो। इन तीन शिष्यों के लिए यह दिव्य दृष्य काफी चौंकाने वाला था क्योंकि अब तक उन्होंने प्रभु येसु को एक साधारण पुरूष के रूप में ही देखा था। उन्होंने उन्हें इस महिमा में नहीं देखा था। प्रभु येसु जान बूझकर अपने शिष्यों को यह दिव्य दृष्य दिखाना चाहते थे ताकि निकट भविष्य में जब वे यहूदियों द्वारा पकडाये व क्रूस पर दर्दनाक मौत मरेंगे, तब उनका मन विचलित न हो जाए। तब उन्हें यह दिव्य दृष्य याद रहे कि प्रभु येसु सिर्फ एक साधरण इंसान नहीं है। वे सच्चे ईश्वर और सच्चे मनुष्य हैं। इस मानव रूप में उनके दुख भोगने के बाद वे अपार महिमा में जी उठेंगे। सांसारिक दुखों व कष्टों के बाद महिमामय आनन्द व उल्लास है। पर वे अपने शिष्यों से इस बात के विषय में उनके पुररूत्थान तक किसी से बात नहीं करने की समझाईश देते हैं। क्योंकि वे ये नहीं चाहते थे कि उनके अनुयायी सिर्फ उनकी महिमा व दिव्य शक्ति को देखकर उनका अनुसरण करे। वे यह चाहते थे कि उनके अनुयायी अपने दैनिक जीवन का क्रूस उठाकर उनका अनुसरण करे। सब लोग यह जानें कि येसु के पीछे जाना मतलब दैनिक जीवन के दुख-दर्द सहते हुए, उनके साथ चलना है। येसु के साथ चलने वाले हर विश्वासी को क्रूस को गले लगाते हुए आगे बढना है। बिना क्रूस के पुनरूत्थान संभव नहीं। स्वर्ग में जाकर ईश्वर की महिमा के भागिदार बनने का कोई शॉर्ट कट नहीं है। इस जीवन के उतार चढाव को पार करते हुए ही हम वहां तक पहुंच सकते हैं। प्रभु कहते हैं स्वर्ग का द्वारा एक संकरा द्वार है। जि हां स्वर्ग का द्वार केवल संकरा ही नहीं, इस मार्ग में पत्थर हैं, कांटे हैं और मुसिबतों के पहाड भी हैं।

तीन शिष्यों  को ताबोर पर्वत पर ईश्वरीय उपस्थिति वाला अनुभव बहुत अच्छा लगा। वे आत्मविभोर हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि वहीं ऐसे सुखद अनुभव में ही रह जायें। पेत्रुस प्रभु से कहते हैं कि हम यहीं रह जायें। आप कहे तो तीन तम्बूओं की व्यस्था कर दूं। वे वहां बहुत सुरक्षित व आरामदायक महसूस कर रहे थे। वे पहाड के नीचे जाकर विरोधी तत्वों जैसे शास्त्री एवं फरिसीयों का सामना करना नहीं चाहते थे। वे भीड जो कि दिन रात प्रभु के पीछे रहती थी उससे बचना चाहते थे। प्रभु पेत्रुस के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया नहीं देते। प्रभु उन्हें लेकर सीधे पहाड के नीचे की ओर चल देते हैं। और उन्हें अपने दुःखभोग मरण एवं पुररूत्थान के बारे में बतलाते हैं। प्रभु यह नहीं चाहते थे कि वे उस ईश्वरीय अनुभव में ही खोए रहें बल्कि जीवन की सच्चाई से भी रूबरू हों। जिस ईश्वरीय महिमा व प्रभु की पावन  उपस्थिति का अनुभव उन्हें हुआ उसे वे अपनी परिपूर्णता में इस जीवन के बाद प्राप्त करेंगे। लेकिन तब तक पिता ने जो मिशन उन्हें सौंपा है उसे उन लोगों को पूरा करना है। और इस मिशन को पूरा करने के लिए जीवन में आये हर दुःख व कष्ट को सहना है। प्रभु येसु तो अपना मिशन पूरा करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे, यहां तक कि क्रूस पर मरने के लिए भी। इसलिए वे अपने शिष्यों को भी उसी प्रकार पूरी तरह से तैयार रहने की शिक्षा दे रहे थे।

आज प्रभु हम सबसे यही आह्वान करते हैं कि हम हमारे दैनिक जीवन के क्रूस से दूर न भागें। जिस प्रकार से प्रभु ने उसे अपने जीवन में स्वीकार किया हम भी उसे स्वीकार करें। हमारे जीवन में भी हम कई बार व्यक्तिगत प्रार्थनाओं में मिस्सा बलिदान में, तीर्थ स्थानों में या फिर आध्यात्मिक साधनाओं (रिट्रीट) आदि में कई प्रकार के ईश्वरीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते हैं। हमें उसी माहौल में रहना अच्छा लगता है। पर हमें यह याद रहे कि प्रभु हमें ऐसे अनुभव इसलिए देते हैं कि हम हमारे इस दुनियाई जीवन की समाप्ति के बाद इसे परिपूर्णता में प्राप्त करें। ये उस स्वर्गीय आनन्द व शांति का एक अंश मात्र है जिसे ईश्वर हमें भरपूरी से देने वाले हैं। उस भरपूर ईश्वरीय अनुभव को प्राप्त करने के लिए हमें पहाड से नीचे उतरकर जीवन की सच्चाई से रूबरू होते हुए, शैतान और उसकी ताकतों से लडते हुए, सब प्रकार के प्रलोभनों व बुराईयों पर विजय पाते हुए प्राप्त करना होगा। इसलिए हम हमारे जीवन में प्रभु के लिए समय निकालें। प्रभु के साथ लीन होकर अपने जीवन की कठानिईयों व चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त शक्ति व कृपा हासिल करें। तथा उस कृपा के साथ हम प्रभु येसु के समान जीवन में आए हर क्रूस को गले लगाते हुए उनका अनुसरण करें। तभी हमें उनके ही समान मुक्ति का मुकूट हासिल होगा।

आमेन। 

Friday, 28 February 2020

दुखभोग का पहला इतवार (Year A ) 1 मार्च 2020



उत्पत्ति 2:7-9 . 3:1-7 
रोमियों 5:12-19 
मत्ती 4:1-11 

ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों,ईश्वर  ने आदम और हेवा को बनाया, उन्हें पृथ्वी पर विचरने वाले हर जीव जन्तुओं पर अधिकार दिया, और उनसे यह उम्मिद की गयी कि वे बदले में ईश्वर  के प्रति आज्ञाकारी व ईमानदार रहें। बल्कि हमारे आदि माता-पिता ने ईश्वर  प्रदत वरदानों के घमंड में ईश्वर  की आज्ञा का उल्लंघन किया जिसका परिणाम उन्हें और उनकी संतानों को भुगतना पडा और आज तक संसार भुगत रहा है। इस बात पर खेद प्रकट करना हमारा हक बनता है कि हमारे आदि माता-पिता ने बहुत ही मुर्खतापूर्ण और दुर्भाग्यपूर्ण कार्य किया है। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? हम उनसे कितने भिन्न हैं। हम हमारे दैनिक जीवन में ईश्वर की दया व कृपा को विभिन्न रूपों में देखते व अनुभव करते हैं। लेकिन हम फिर भी बहुत बार ईश्वर  की आज्ञाओं का उल्लंघन करते तथा हमारे आदि माता-पिता से भी अधिक मुर्खतापूर्ण व दुर्भाग्यपूर्ण कार्य करते हैं। क्या ये हमारे लिए शर्म व खेद की बात नहीं?

जिस प्रलोभन एवं परीक्षा का सामना प्रभु येसु ने किया वे हमारे लिए एक प्रोत्साहन एवं सांत्वना का स्रोत हैं। यदि हमारे प्रभु एवं गुरूवर येसु को स्वयं प्रलोभनों के दौर से गुजरना पडा तो हम भी परीक्षा एवं प्रलोभन मुक्त जीवन की उम्मीद नहीं कर सकते। मूल रूप से हमारे प्रलोभन भी वही है जो आदम हेवा के सामने थे और जो प्रभु येसु के सामने थे। हेवा को सबसे पहले वह फल सुंदर और स्वादिष्ट दिखा। उसे देखने में सुंदर दिखा और उसने सोचा देखने में इतना सुन्दर है तो खाने में कितना स्वादिष्ट होगा। वैसे ही प्रभु येसु के सामने सबसे पहला प्रलोभन शारीरिक भूख मिटाने का था।  शैतान ने उनसे कहा कि वह अपनी दिव्य शक्ति से पत्थर को रोटी बनाकर खा ले क्योंकि वह भूखा है। आज हमारा यह शरीर कई प्रकार की भूखों को शांत करने के लिए हमें बाध्य करता है। हमारी पंचेंद्रियां विभिन्न प्रकार से तृप्त होना चाहती हैं। हमारे समाने विभिन्न प्रकार की भूख रहती है। आँखों की भूख - दूसरों को वासना भरी निगाहों से देखने की भूख, अश्लीलता भरी  चीज़ें देखने और पढने की भूख, अच्छा से अच्छा स्वादिष्ट भोजन करने की भूख, दैहिक वासना की भूख, सच्ची - झूठी तारीफ सुनने की भूख। आरमदायक घर व सुख-सुविधा की भूख अदि। 

फिर शैतान ने हेवा को ईश्वर  के बाराबर हो जाने का प्रलोभन दिया। उसने येसु को भी सारी दुनिया का वैभव दे देने का प्रलोभन दिया। और आज भी वह हमें विभिन्न प्रकार से बडे-बडे वादे करके प्रलोभित करता रहता है। खोखली तारीफ एवं बडापन दिखाने का प्रलोभन, चार जन की भीड में प्रशंसा पाने का प्रलोभन, स्कूल में अव्वल आकर घमंड करने का प्रलोभन, अपने आप को दूसरों से ज़्यादा धार्मिक मानने का प्रलोभन और धन व शक्ति का प्रलोभन आवश्यकता  से अधिक धन और हैसियत से अधिक मान-सम्मान पाने, सत्ता हथियाने एवं दूसरों पर शासन करने की लालच में इंसान कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाता है। क्योंकि इंसान कमजोर प्राणी है। मत्ती 26,41 में वचन कहता है - अत्मा तो तत्पर है लेकिन शरीर दुर्बल है। हम दुर्बल शरीर वाले प्राणी हैं। 
स्तोत्र 141 में वचन कहता है मेरे हृदय को बुराई की ओर झूकने न दे। कितनी वास्तविकतापूर्ण प्रार्थना है ये। हमारे चारों ओर बुराइयां ही बुराइयां है। न केवल आज बल्कि उस जमाने में भी इसलिए स्त्रोतकार कहता है मेरे हृदय को बुराई की ओर झूकने न दे। मत्ती 6 और लूकस 11 में हम पढते हैं कि प्रभु येसु ने अपने शिष्यों को एक प्रार्थना सिखाई। यह सबसे उत्तम प्रार्थना है। हे हमारे पिता............और हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से हमें बचा। कितनी सुंदर प्रार्थना है यह। यह सबसे आदर्श, सुंदर और सबसे शक्तिशाली प्रार्थना है। प्रभु ने कहा हे पिता हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से बचा। प्रभु येसु कहते हैं तुम्हें बार बार इस तरह प्रार्थना करने की आवश्यकता  है। क्योंकि सबसे पहले हमारा झूकाव पाप की ओर है।

हम उत्पत्ति 8 में पढते हैं सारे संसार मे पाप भर गया था और ईष्वर ने प्रलय भेजा लेकिन ईष्वर ने नूह और उसके परिवार को बचा लिया और प्रलय के बाद नूह ने ईष्वर के लिए बली चढाई और ईष्वर ने यह कहा कि अब से में मनुष्यों को अभिषाप नहीं दूंगा। क्योंकि बचपन से ही मनुष्यों की प्रवृति पाप की ओर है। इसलिए प्रभु हमसे कहते हैं तुम्हें निरन्तर प्रार्थना करनी है। हे पिता हमें परीक्षा में न डाल।
दूसरी तरफ हम देखते हैं मत्ती 18, 7 में प्रभु कहते हैं कि प्रलोभन अनिवार्य है। प्यारे भाईयों बहनों प्रलोभन देने वाला हर समय हमारे चारों ओर मंडराते रहता है। वह हर समय क्रियाशील  रहता है। संत पेत्रुस 5, 8 में कहते हैं कि "आपका शत्रु शैतान दहाडते सिंह की तरह विचरता रहता है। और ढूंढता रहता है कि किसे फाड खाये।" तो हमारा शत्रु शैतान ढूंढते रहता है कि किसे फाड खायें। हमें हर समय अंधकार की शक्तियों से लडना पडता है, जैसे कि एफेसियों 6 में लिखा है। हर समय विभिन्न नकारात्मक आत्माओं से लडना पडता है। लालच की आत्मा, गुस्से की आत्म, उदासी की आत्म, आलस की आत्मा, निराशा  की आत्मा । हमें इनसे लडना पडता है। हमारा जीवन एक लंबा युद्ध है और इस युद्ध में हमेशा  प्रभु से प्रार्थना करते रहना है कि हे प्रभु हमें परीक्षा में न डाल परन्तु बुराई से हमें बचा। 12 कुरिंथयों 11,14 में संत पौलुस कहते हैं कि आप लोग इस चीज से अष्चर्यचकित न हों कि शैतान कभी-कभी स्वर्गदूत का रूप ले सकता है। कभी हमारे सामने आकर्षक बातें आकर्षक चीजें आकर्षक लोगों को ला सकता है। हमें भ्रमित कर सकता है। इस दुनिया में बहुत सारे लोग ऐसी परिथितियों में भ्रमित हो जाते हैं और आसानी से शैतान के चुंगूल में पड जाते है। इसलिए हमें हर समय प्रार्थना करने की ज़रूरत है। कि हे प्रभु हमें परीक्षा में न पडने दे। आज हम ऐसे संसार में रह हैं जहां सबसे ज्यादा प्रलोभन देने वाली बातें और चीजें हैं। योहन 17,15-16 में प्रभु ने हमस ब के लिए प्रार्थना की कि पिता मैं नहीं कहता कि उन्हें संसार से उठा ले। वे संसार में हैं लेकिन उन्हें बुराई से बचा। 

हम विश्वासी इस संसार में हैं लेकिन यह स्वभाविक है हम इस संसार की बुराईयों में फंस जाते है।
प्रलोभनों से विजय पाने का रास्ता प्रभु येसु हमें दिखलाते हैं। और वह है पवास, प्रार्थना और ईश  वचन का पठन एवं मनन चिंतन। जब प्रभु येसु की परीक्षा ली गयी उससे पहले वे मरूभूमि में चालीस दिनों तक उपवास व प्रार्थना कर रहे थे। और शैतान के हर बहकावे का वे वचन की शक्ति से सामना कर रहे थे। हम सब कमजोर हैं इसलिए हमें प्रभु से शक्ति प्राप्त करने की ज़रूरत है।

आईये हम प्रभु से प्रार्थना करें। हमें परीक्षा में न पडने दे परन्तु सब बुराईयों से हमें बचा, आमेन।

Monday, 24 February 2020

पवित्र राख बुधवार 26 फ़रवरी 2020 (Year A )

जोएल २, १२-१८
२ कुरिन्थियों ५, २०-६ ,२
मत्ती ६, १-६, १६-१८

उपवास के आह्वान के साथ आज हम दुःखभोग काल का आगाज़ कर रहे हैं। आत्मा के  शुद्धिकरण एवं प्रभु तथा एक-दूसरे के साथ मेल-मिलाप करने का यह उपयुक्त समय है। यह अनुग्रह का समय है, आत्माओं के उद्धार का समय है, यह अन्यंत कीमती समय है। इसे हम यूँ ही न जाने दें। आज के दूसरे पाठ में प्रभु हमसे कहते हैं - ‘‘आप को ईष्वर की जो कृपा मिली है, उसे व्यर्थ न जाने दें; क्योंकि वह कहता है - उपयुक्त समय में मैंने तुम्हारी सुनी; कल्याण के दिन मैंने तुम्हारी सहायाता की। और देखिए, अभी उपयुक्त समय है, अभी कल्याण का दिन है’’ (2 कुरिंथियों 6, 2)

पाप से विकृत हमारे मानवीय स्वभाव को आज एक सही दिशा  की ज़रूरत है। पाप की अज्ञानता में खोए मानव को आज प्रभु की ज्योति की ज़रूरत है। रोम. 3,23 में वचन कहता है - ‘‘क्योंकि सब ने पाप किया और सब ईष्वर की महिमा से वंचित हो गये। ईष्वर की कृपा से सबों को मुफ्त में पापमुक्ति का वरदान मिला है।’’ हममें शायद ही कोई ऐसा होगा जो निष्पाप है, जिसने कभी पाप ही नहीं किया हो। हम सब पापी हैं। और यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि हम सब पापी हैं, हम ईष्वर की महिमा से वंचित हैं, अनन्त जीवन हमारे हाथों से फिसलता जा रहा है, हम प्रभु से दूर होते जा रहे हैं, हमारा जीवन अनन्त विनाश  की ओर खींचा चला जा रहा है तो अब यह उचित समय है, हमारे उद्धार का समय है।

आज हम प्रभु की यह वाणी ध्यान से सुने जिसे हमें प्रभु आज के पहले पाठ के माध्यम से कह रहे हैं - ‘‘अब तुम लोग उपवास करो और रोते तथा शोक मनाते हुए पूरे हृदय से मेरे पास लौट आओ। अपने वस्त्र फाड कर नहीं, बल्कि हृदय से पश्चाताप करो और अपने प्रभु ईष्वर के पास लौट जाओ; क्योंकि वह करूणामय, दयालु, अत्यन्त सहनषील और दयासागर है।’’
चालीसे का यह पवित्र समय हमारे लिए प्रार्थना एवं उपवास करते हुए अपने पापों पर पाश्चाताप  करने का उचित समय है। प्रार्थना और उपवास का क्या संबंध है? उपवास हमारी प्रार्थनाओं को अधिक प्रभावशाली बनाता है। कई बार हमारे जीवन में हम ऐसी परिस्थितियों के दौर से गुजरते हैं जहाँ कुछ चीज़ अथवा कुछ काम कर पाना हमारी शक्ति के परे हो जाता है। हम प्रार्थना करते हैं, दुआयें मांगते हैं, चर्च जाते हैं, फिर भी हमारा काम नहीं होता है , या फिर हमारी  बुरी आदत नहीं सुधरती। हम हार जाते हैं, टूट जाते हैं। एक बार प्रभु के चेलों के साथ भी ऐसी ही हुआ। संत मारकुस के सुसमाचार 9, 14-29 में हम इस घटना के बारे में पढते हैं जहांँ प्रभु येसु अपने रूपान्तरण के बाद अपने  शिष्यों  के पास लौटते हैं तो उन्हें एक बडी उलझन मंे पाते हैं। एक व्यक्ति अपने बेटे को जो कि अपदूतग्रस्त था उनके पास लाता है और प्रभु के  शिष्य लाख कोशिश  करने के बाद भी उसे नहीं निकाल पाये। आखिर में उसे प्रभु के पास लाया जाता है और प्रभु उसे चंगाई प्रदान करते हैं। तब  शिष्यों ने प्रभु से अपनी असमर्थता का कारण पूछा तो प्रभु ने कहा - ‘‘प्रार्थना और उपवास के सिवा और किसी उपाय से यह जाति नहीं निकाली जा सकती’’ (मार्क 9, 29)।

हमारे जीवन में कुछ बुराईयाँ ऐसी होती है, जो जीवनभर पीछा नहीं छोडती। हम हजारों कोशिश  करते हैं, पर फिर भी हम उन पापोें अथवा बुराईयों के दास बने रहते हैं। कई ऐसे व्यक्तियों को मैंने देखे है जो विभिन्न प्रकार की बूरी आदतों जैसे नशापान, गाली देना, दूसरों की बुराई करना, वासना के गुलाम बन जाना आदि के ऐसे गुलाम बन जाते हैं कि वे चाह कर भी उनसे मुक्ति एवं छुटकारा नहीं पा सकते। हम मेसे भी कई विभिन्न प्रकार के ऐसे पुराने से पुराने बंधनों से बंधे हुए हैं। बुराईयों ने हमारे ऊपर अधिकार करके रखा है। बुरी आदतें, बुरे विचार हमारे जीवन को चलाती हैं। यदि हम मेसे कोई है जिसे लगता है कि मेरे पापों का, मेरे पापमय स्वभाव का, मेरी बुरी आदत का कोई निदान नहीं हैैं। तो इस चालीसे के समय में उपवास रखकर प्रार्थना करते हुए हम अपनी कमज़ोरियों को प्रभु को समर्पित करें। वह अपने वादे का पक्का है। कोई बंधन ऐसा नहीं जिसे प्रभु येसु नहीं तोड सकते, कोई भी बुरी आदत ऐसी नहीं है जिससे मसीह हमें निजात नहीं दिला सकते। वचन कहता है - ‘‘उसके पुत्र के जीवन द्वारा निष्चय ही हमारा उद्धार होगा‘‘ (रोम 5, 10)। ‘‘वह अपने शरीर में हमारे पापों को क्रूस के काठ पर ले गये, जिससे हम पाप के लिए मृत हो कर धार्मिकता के लिए जीने लगें। आप उनके घावों द्वारा भले चंगे हो गये हैं’‘ (1 पेत्रुस 2, 24) हमारी हर एक कमज़ोरी को, हर एक दुर्बलता प्रभु येसु अपने क्रूस के ऊपर ले जाते हैं और उनके खून बहाये जाने से हमें चंगाई मिलती है, हमें छुटकारा मिलता है। ईष्वर ने हमें अंधकार की अधीनता से निकाल कर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में ले आया। उस पुत्र के द्वारा हमारा उद्धार हुआ है, अर्थात् हमें पापों की क्षमा मिलती है।


चालीसा काल प्रभु के पुनरूत्थान के पर्व की तैयारी का समय है। हम इस समय हमारे पापमय मृत्यु के जीवन को त्यागकर प्रभु के साथ एक नवीनता का जीवन प्रारम्भ करने की तैयारी करते हैं। पवित्र कलीसिया इस पवित्र समय में पुण्य कमाने के तीन प्रमुख मार्ग हमें बतलाती है।
पहला है - उपवास व त्याग करते हुए अपने किये हुए पापों पर पश्ताप  करना व पापमय जीवन को त्यागते हुए प्रभु के करीब आना
दूसरा - प्रार्थना में जीवन बिताना 
तीसरा- दान देना। या ज़रूरतमंदों की सहायता करना। 

इन सब पुण्यकर्मों को करने का हमारा उद्देश्य  हमारे सामने बिल्कुल साफ होना चाहिए। हमारे धर्म कर्मों की जानकारी सिर्फ मुझे और मेरे प्रभु को हो। हमारा उपवास, हमारी प्रार्थना दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं लेकिन प्रभु को प्रसन्न करने के लिए होना चाहिए। यदि हम दूसरों को दिखाने के लिए, दूसरों की वाह-वही लूटने के लिए, दूसरों से तारीफ पाने के लिए हमारे धर्म-कर्म करते हैं तो आज का सुसमाचार हमसे कहता है हम हमारे स्वर्गीक पिता के पुरस्कार से वंचित हो जायेंगे। प्रार्थना का उद्देष्य यह नहीं कि मैं धार्मिक कहलाऊँ पर यह कि मैं प्रभु से अपना संबंध जोडूं। दान देने का उद्देष्य यह नहीं कि दूसरे लो, मेरी उदारता को जानें पर यह कि मेरे द्वारा किसी गरीब, किसी बेसहारा, किसी पीडित की मदद हो जाये। मेरा धन, मेरी शक्ति व गुण दूसरों के काम आये। मेरे उपवास का मतलब यह नहीं कि लोग मेरी धार्मिकता से वकिफ़ हो जायें, पर यह कि मेरी शारीरिक भूख मुझमें अध्यात्मिक भूख जगाये। रोटी की भूख मुझमें प्रभु व उसके वचनों की भूख जगाये। और मेरे उपवास व त्याग से जो कुछ बचता है उससे मैं किसी ज़रूरतमंद की मदद करूंँ। आने वाले इन चालीस दिनों में यदि मैं इन बातों पर ध्यान देता हूँ तो यह पावन समय मेरे लिए बहुत ही अर्थपूर्ण व प्रभु की आषिष व कृपा का एक स्रोत बनकर मेरे जीवन में मसीह के उद्धार व मुक्ति को प्राप्त करने में मेरी सहायाता करेगा।
आमेन।





Friday, 21 February 2020

सामन्याकल का 7 वां इतवार ( Year A ) 23 February 2020


लेवी 19, 1-२. 17-18
१ कुरिंथियो 3,16-23
मत्ती 5,38-48
आज का सुसमाचार पाठ बहुत ही चुनौतीपूर्ण शिक्षा हमारे सामने रखता है। प्रभु कहते हैं यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड मारे, तो दूसरा भी उसके सामने कर दो। इस बात को हमें अक्षरशः लेने की ज़रूरत नहीं। कई बार लोग प्रभु की इस शिक्षा का गलत मतलब निकालते व कई बार इस वचन का प्रयोग मज़ाक के तौर पर करते हैं। यहाँ पर बात महज दूसरा गाल दिखाने की नहीं है, प्रभु इससे भी बढकर हमें एक गहरी शिक्षा देना चाहते हैं। प्रभु यहांँ अपनी शिक्षा को एक मुहावरे के रूप में पेश करते हैं। जब कोई आराम से सोता है तो हम कहते हैं मुहावरे वाली भाषा में कहते हैं कि वह घोडे बेच कर सो रहा है। पर वास्तव में वहाँ न कोई घोडे होते हैं और न ही उन्हें कोई बेचता है। वैसे ही जब प्रभु येसु कहते हैं कि एक गाल पर मारने पर दूसरा दिखा दो। तो इसके पीछे उनका आशय यह नहीं कि बेमतलब लोगों की मार खाते रहो। जब प्रभु येसु को अन्नस और कैफस के सामने न्याय के लिए पेश किया गया था तब उनके गाल पर प्यादे ने थप्पड मारा था। याद रहे प्रभु येसु ने वहाँ उन्हें दूसरा गाल नहीं दिखाया। उन्होंने उससे पूछा - ‘‘यदि मैंने गलत कहा, तो मुझे गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो मुझे क्यों मारते हो?’’ (योहन 18, 23). प्रभु की इस शिक्षा का अर्थ यह नहीं कि हम हमारे विराधियों द्वारा किये गये हर जुल्म को मुँह बंद किये सहते रहें। जहांँ कहीं भी अन्याय होता है वहाँ हमें उसके विरुद्ध आवाज उठाना चाहिए। हमें हमारा पक्ष रखने का अधिकार है। एक गाल पे मारने पर दूसरा गाल दिखाने का सीधा सा मतलब है कि हमें हमारे विरोधीजन से बदला नहीं लेना चाहिए। बुराई का सामना हमें अच्छाई के साथ करना चाहिए। बुराई के बदले बुराई और अधिक बुराई को जन्म देगी। ईंट के बदले ईंट और ऑंख के बदले आँख, खून खराबा, हिंसा व अशांति ही लाएंगे। प्रभु का वचन कहता है रोमियो 12, 19-20 में - ‘‘बुराई के बदले बुराई नहीं करें।. . .जहांँ तक हो सके सबो के साथ मेल-मिलाप बनाये रखें। प्रिय भाईयों! आप स्वयं बदला न चुकायें, बल्कि उसे ईश्वर के प्रकोप पर छोड दें; क्योंकि लिखा है - प्रतिशोध मेरा अधिकार है, मैं ही बदला चुहाऊँगा।’’ प्रभु हमें मेल-मिलाप व सुलह का रास्ता दिखाते हैं। नकारात्मक भावनाओं और विचारों का तोड नकारत्कता नहीं है। ‘ मैं तुम को देख लुँगावाली भावना आपसी रिशते को खत्म कर देती है। जिस दिन हमारे मन में किसी के प्रति ऐसी भावना आती है, उस दिन से हम शैतान को हमारे अंदर निमंत्रण देते हैं। फिर वह हमारे अंदर रहकर हमें हमारी इस सोच को कार्य रूप में परिणित करने के लिए, उकसाता रहता है। यह नकारात्मकता जो एक साधारण गुस्से से प्रारम्भ होकर बैर में तब्दिल हो जाती है, और मन का बैर एक जहर बनकर दुश्मनी को जन्म देता है। प्रभु का वचन कहता है - अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जिस तरह सूरज की भीषण गर्मी जल स्रोतों को सुखा देती है वैसे ही मन में बैर की भावना हमारे दिलों से प्रेम को सुखा देती है। इसलिए यदि हमारे भाई बहनों से तू तू-मैं मैं हो जाये, झगडा लडाई हो जाये तो इसकी नकारात्मकता लंबे समय तक हमारे दिलों में नहीं होनी चाहिए। वचन कहता है - ‘‘यदि आप क्रूध हो जाये तो इसके कारण पाप न करें। सूरज डूबने तक अपना क्रोध कायम नहीं रहने दें'' (एफेसियों 4, 26)हमारी नकारात्मक भावनाओं का सबसे अच्छा उपचार प्यार है। इसीलिए प्रभु हमसे कहते हैं अपने दुश्मनों से प्यार करो। हमारे दुश्मन कौन हैं? चीनी? पाकिस्तानी? ज़रूरी नहीं। हमारे  दुश्मन वे सभी हैं जो हमें पसन्द नहीं करते। हमारे  दुश्मन वे हैं जो हमें गुस्सा दिलाते हैं। हमारे  दुश्मन वे है जो हमें चिढाते हैं, दूसरों के सामने हमारी बुराई व निंदा करते हैं, जो हमें गिराने के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो हमारी उन्नती को देखकर जलते हैं। प्रभु न कवल ऐसे लोगों से प्रेम करने के लिए बल्कि उनके लिए प्रार्थना करने के लिए भी कहते हैं। प्रभु ने स्वयं यह किया। सूली पर से अपने दुष्मनों को न केवल क्षमा दी पर उनके लिए प्रार्थना की। संत स्टीफन ने जब यहूदियों ने उन्हें पत्थरों से मारा तब मरने से पहले यही कहा - हे प्रभु यह पाप इन पर न लगा। वासना की आग में जलते हुए एलेक्ज़ांन्ड्रो को जब फूलों सी कोमल व नादान मरिया गोरेती ने उसके पाप में भागीदार होने से इनकार किया तो एलेक्ज़न्ड्रो ने उसकी हत्या कर दी। अस्पताल में अंतिम सांसे लेते हुए मरिया गोरेते कह उठती है। मैं उसे माफ करती हूँ। जब सिस्टर रानी मरिया को उनके  विरोधियों ने चाकुओं से गोद कर मरवा डाला तो उसकी बहने सि. सेलमी ने हत्यारे के खुनी हाथों पर राखी बांध कर उसे अपना भाई बना लिया। आज कहने को दुनिया मे ईसाईयों की संख्या बहुत है। पर ईसा के अनुयाईयों की संख्या बहुत कम है। महात्मा गांँधी ने इंग्लैंड में रहते हुए ईसाई धर्म का अध्ययन किया। लेकिन वे कभी एक ईसाई नहीं बनें। क्योंकि उन्होंने देखा कि जिन लोगों पर ईसाई होने के लेबल लगे हैं उनमें ईसा की झलक नहीं दिखाई देती थी, ईसा की शिक्षा ईसाईयों के कार्यों में दिखाई नहीं देती थी। वहीं महात्मा गांधी नाम से नहीं परन्तु अपने कार्यों से ईसा के अनुयायी बन गये। उन्होंने प्रभु ईसा की शिक्षा को अपने जीवन में उतारा। उसे अपने जीवन व कार्यों का सिद्धांत बना लिया। एक गाल पर थप्पड मारने पर दूसरा दिखाने का सिद्धांत महात्मा गांधि के अंहिसावाद का पर्याय बन गया। इसीलिए आज दुनिया उन्हें महान अत्मा कह कर उनका सम्मान करती है।
प्रभु की इन शिक्षाओं को सुनना तो बडा अच्छा लगता है। पर इन पर अमल करना, व अपने जीवन में इन्हें उतारना एक मुशकील काम है। क्योंकि हमारा मानवीय स्वभाव तो अपने दुश्मनों से घृणा, अपने भाईयों से प्रेम करना सिखलाता है। दुष्मनों से प्रेम करना तो ईश्वरीय स्वभाव है। और हमें यही ईश्वरीय स्वभाव प्राप्त करना है। इसीलिए प्रभु येसु आज हमसे कहते हैं - अपने पिता जैसे परिपूर्ण बनो। आईये हम आज हमारे मन की सारी कडवाहट को, सारी नकारात्मकता को, दु्शमनी व घृणा के भावों को हमारे दिलों से निकाल दें ताकि प्रभु हमारे दिलों को अपने प्रेम से भर दें। ताकि हम उनकी तरह हमारे दुशमनों व हमारी विरोधियों से भी प्रेम करे सकें। आमेन।