Thursday, 13 August 2020

19th Sunday in Ordinary Time (A) 2020

 

19th Sunday in Ordinary time

ख्रीस्त में प्यारे विश्ववासियों पिछले सप्ताह हमने पवित्र सुसमाचार में पढा कि येसु ने रोटियों का चमत्कार करके, पाँच हजार लोगों से अधिक लोगों को भेरपेट भोजन कराया। इसके तुरन्त बाद वे अपने शिष्यों को नाव पर सवार होकर समुद्र के उस पार जाने के लिए बाध्य करते हैं। शब्दों पर ज़रा गौर फरमाईये। येसु ने अपने शिष्यों को उस पार जाने के लिए बाध्य किया। याने उन्हें जबदस्ती वहॉं से जाने को कहा। आखिर क्यों? वहाँ ऐसा क्या हो गया था? संत योहन अपने सुसमाचार में इस बात को स्पष्ट करते हैं। संत योहन 6:14— 15 में हम पढते हैं — ''लोग येसु का यह चमत्कार देखकर बोल उठे, निश्चय ही यह वे नबी हैं, जो आने वाले हैं। येसु समझ गये कि वे आ कर उन्हें राजा बनाने के लिए पकड ले जायेंगे, इसलिए वे फिर अकेले ही पहाडी पर चले गये।''

प्रभु येसु वहाँ किसी प्रकार का असंमजस पैदा करना नहीं चाहते थे। यहूदियों के लिए हेरोद पहले से राजा था और दूसरी और प्रभु येसु सांसारिक राजा बनने के लिए इस संसार में नहीं आये थे। इसलिए वे अपनी पहचान लोगों को एक सांसारिक राजा के रूप में नहीं देना चाहते थे।

इसके आगे हम पढते हैं कि वे लोगों को विदा करके पहाडी पर प्रार्थना करने चले जाते हैं। प्रभु येसु के लिए प्रार्थना एक बहुत ही अहम काम था। वे हमेशा अपना दिनभर का काम निपटाकर एकांत में प्रार्थना करने निकल जाये करते थे। उनके लिए प्रार्थना का अर्थ कुछ माँगना नहीं था जैसा कि हम से कई लोग करते हैं। प्रार्थना करना याने प्रभु को हमारी आवश्यक्ताओं लिस्ट दे दो और कहो मुझे ये चाहिए, मुझे वो चाहिए, ऐसा कर दो, वैसा कर दो आदि। सही मायने में यह कोई प्रार्थना नहीं है। प्रभु येसु के लिए प्रार्थना का अर्थ था एकांत में अपने पिता से मिलना, उनसे बातें करना, उनके प्यार से खुद को भरना व अपना प्यार पिता को देना। वे यही करने के लिए अकेले में जाया करते थे।

मैं एक कैथलिक पुरोहित हूँ। हम लोग प्रभु की सेवकाई में अपना पूरा जीवन समर्पित करते हैं, इसलिए हम पारिवारिक जीवन से खुद को अलग रखते हैं। फिर भी साल में एक बार हम छुट्टी पर अपने घर जाते हैं। ये छुट्टियों के दिन हमारे लिए बडे खास होते हैं क्योंकि हम इन दिनों अपने प्रिय जनों से अपने माता—पिता से मिल पाते हैं। मैं जब घर जाता हूँ तो मेरी माँ मुझे अपनी बाहों में भरकर मुझे चूमती और बहुत सारा लाड दिखाती है। और मेरी भी ख्वाहिश यही रहती है कि मैं मेरे माता—पिता के साथ कुछ समय बिताऊँ। उनसे बातें करूँ। मैं उनसे कुछ माँगने नहीं जाता। बस उनके साथ थोडा समय बिताने, उनका प्यार पाने, और उन्हें अपना प्यार दिखाने।

 

यह है प्रार्थना अपने ईश्वर के साथ समय बिताना और उनके प्रेम से खुद को भरना जैसे येसु करते थे।

 

इससे आगे हम पढते हैं कि नाव तट से दूर चली जाती है और लहरों से डगमाने लगती है क्योंकि वायु प्रतिकूल थी। जब उनकी नाव डगमगा रही थी तो वचन कहता है येसु उन्हें देखते हैं। जब हमारे जीवन की नाव डगमगा रही होती है तब ईश्वर हम हमें देखता है। उसकी निगाहें हम पर निरंतर बनी रहती है। नबी इसायाह 49:16 ''तुम्हारी चारदीवारी मेरी आँखों के सामने रहती है।''

यहूदियों के लिए सागर और सागर का जल भय और विनाश का प्रतीक था क्योंकि समूद्र और उसकी प्रचंडता के सामने वे अपने को बेबस पाते थे। प्रभु येसु उसी आतंकित करने वाली लहरों पर चलते हुए आते हैं और यह संदेश देते हैं कि इंसान जिन ताकतों के सामने घुटने टेक देता है वे सारी ताकतें उनके कदमों तले हैं। दुनिया की सारी ताकतों के ऊपर येसु को अधिकार है। संत मत्ती 28:18  में प्रभु येसु कहते हैं — ''मुझे स्वर्ग और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है।''

 

जब शिष्य येसु को पानी पर चलते हुए आते देखते हैं तो वे डर जाते तब येसु उनसे कहते हैं — ''ढारस रखो, मैं ही हूँ। डरो मत।''

''मैं ही हूँ'' यह अभिव्यक्ति अपने आप में बहुत खास है। पवित्र सुसमाचार की मूल भाषा याने यूनानी में इसका अनुवाद है — एगो अमी। जब मूसा 3:14 में जब मूसा ने ईश्वर का नाम पूछा तो ईश्वर ने अपना नाम यही बताया था। आई आम। मैं ही हूँ। एगो एमी। जब प्रभु येसु ने अपने शिष्यों से यह कहा डरो मत एगो अमी तो वे उन्हें यह बतलाना चाह रहे थे कि वे वही ईश्वर है जो इ्स्राएलियों को लाल सागर में से सूखे पैर बाहर निकाल लाया था।

जी हाँ, प्यारे विश्वासियों यही है हमारे ईश्वर का नाम — ''एगो अमी'' ''मैं ही हूँ'' आज भी वे हमसे यही कहते हैं जब हम जिंदगी के तुफानों के बीच फँस जाते हैं, जब हम समस्याओं से विपदाओं से, परेशानियों से, बिमारियों से या किसी भी प्रकार की ताकतों से घिर जाते हैं — मैं ही हूँ। मैं ही हूँ जो तुम्हेें इन सब समस्याओं से बाहर निकाल सकता हूँ। मैं ही हूँ जो तुम्हें बचा सकता हूँ मैं ही हूँ जो तुम्हें चंगा कर सकता हूँ आदि।  हमें ज़रूरत है तो बस अपनी कठिनाईयों में उन्हें पुकारने की जैसा कि शिष्य अपनी मुश्किल की घडी में चिल्ला उठते हैं। हमारा प्रभु पुकार सुनने वाला ईश्वर है। निर्गमन ग्रंथ 3:7 में प्रभु की वाणी मूसा को यह कहते हुए सुनाई दी — ''मैं ने मिस्र में रहने वाली अपनी प्रजा ​की दयनीय दशा देखी और अत्याचारियों से मुक्ति के लिए उसकी पुकार सुनी है।''

हमारे दु:ख—दर्दों में जब हम हमारे ईश्वर को पुकारते हैं तो वह हमारे दुखों के ऊपर चलते हुए, याने हमारे दुखों को कुचलते हुए हमारे पास आ जाता है जैसे आज के सुसमाचार में वह शिष्यों को भयभित करने वाले पानी के ऊपर चलते हुए उनके पास आता है।

 

पेत्रुस यह जानकर कि पानी पर चल कर आने वाला शख्स येसु हैं तो वह उनसे कहता है कि मुझे भी आपके पास पानी पर चलकर आने की आज्ञा दीजिए। पानी पर चलना अपने आप में एक असंभव व अद्भुत काम था परन्तु पेत्रुस को यह जानता था कि येसु में वह सामर्थ्य है यदि वे आदेश देंगे तो वह भी पानी पर चल सकेगा। तब येसु ने उससे कहा — ''आ जाओ'' वह नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए येसु की ओर आगे बढा। यह पर दो बातें गौर तलब हैं — 1. स्वर्ग और पृथ्वी पर जो अधिकार और शक्ति प्रभु येसु को मिली है यदि हम उनमें विश्वास करेंगे तो वे हमें अपनी उन शक्तियों में सहभागिता प्रदान करेंगे जैसा उन्होंने पेत्रुस के साथ किया । पानी पर चलने का सामर्थ्य पेत्रुस के पास नहीं था पर जब उसने येसु पर विश्वास प्रकट किया तो वह भी उनके समान पानी पर चलने लगा। येसु ने अपने सामर्थ्य उसे सहभागिता प्रदान की। 2. पेत्रुस तभी पानी पर चलने लगा जब वह नाव से बाहर आया। यदि हमें येसु के सामर्थ्य का अनुभव करना है तो हमें नाव से बाहर आना होगा। हमें जोखिम उठाना होगा। हमें निडर होना पडेगा। यदि हम डर कर अथवा संकोचवश यदि नाव में ही बैठे रहे तो हमारे जीवन में हम येसु के अद्भूत कार्यों को होते हुए नहीं देख पायेंगे।

 

पेत्रुस के मन में यह दृढ विश्वास था कि येसु के सामर्थ्य से वह पानी पर चल सकेगा। उसने अपनी निगाहें उन पर लगाई और पानी पर चलने लगा। परन्तु जब उसने अपनी निगाहें येसु से हटाई तो वह प्रचंड वायु को देखकर घबरा गया और डूबने लगा। जब तक हम हमारी निगाहें येसु पर लगाकर रखेंगे। दुनिया की कोई ताकत हमें डूबा न सकेगी। हम उन ताकतों, उन शक्तियों के ऊपर फतेह पाते हुए आगे बढते जायेंगे। परन्तु यदि हमने येसु पर से अपनी निगाहें हटाई और मुसिबतों को देखकर घबराये तो हम भी पेत्रुस के समान डूबने लगेंगे। प्रभु का वचन कहता है — '' तुम सारे हृदय से प्रभु का भरोसा करो; अपनी बुद्धी पर निर्भर मत रहो।'' (सूक्ति 3:5) पेत्रुस ने अपनी बुद्धी पर भरोसा किया तो वह डूबने लगा। पर जब वह डूबने लगा तो उसने येसु को पुकारा। जब पेत्रुस डूब रहा था तो उसके पास दो विकल्प थे— 1. वह वापस तैरकर नाव पर जा सकता था, चुंकि वह मछुआ था और तैरना अच्छी तरह जानता था। 2. येसु को पुकारना। उसने उस परिस्थति में येसु को पुकारना उत्तम समझा। वह चिल्ला उठा  — ''प्रभु! मुझे बचाईये।'' संत ख्रीसोस्तम कहते हैं कि यह कहकर चिल्लाना पेत्रुस के पश्चाताप को दर्शाता है। पेत्रुस पाप के सागर में डूबते समय प्रभु को पुकारता है और प्रभु अपना हाथ बढाकर उसे पाप रूपी सागर से बाहर निकालते हैं। उसका उद्धार करते हैं। हम भी इस पाप भरे संसार में से येसु को पुकारें — ''येसु मुझे बचाईये'' जि हाँ हमें उद्धार की ज़रूरत है, हमें मुक्ति की ज़रूरत है, हमें छुटकारे की ज़रूरत है। हमारे हर संकट, हर विपदा में हम येसु को पुकारें येसु हमें बचाईये और वह अपना हाथ बढाकर हमें बचाऐंगे। आमेन।

Friday, 31 July 2020

18th Sunday in Ordinary Time (Cyle - A) Hindi Reflection by Fr. Preetam

इसायाह 55:1—3

रोमियों 8:35,37—39

मत्ती 14:13—21

प्रभु के जिंदा कलाम की सेवकाई में मैं आप सबों की खिदमत में फिर से हाज़िर हुआ हूॅं। आईये हम हमारे जीवित ईश्वर का धन्यवाद करें उनकी महिमा और आराधना करें। मैं उम्मीद करता हूॅं कि येसु के प्रेम और अनुग्रह में आप सब सलामत होंगे। खुदावन्द येसु का सामर्थ्यवान हाथ आप सबों को संभाले रखे।

प्यारे मित्रों आज हम प्रभु के जिन पवित्र वचनों पर मनन चिंतन करने जा रहे हैं उनको हमने लिया है इसायाह 55:1—3, रोमियों 8:35,37—39, और मत्ती 14:13—21 से।

पिछले सप्ताह हमने मनन चिंतन किया कि मनुष्यों के जीवन में बहुत सारी लालसायें, इच्छाएं और अभिलाषायें हैं। और हमने इस पर भी विचार किया कि दुनिया की कोई भी चीजें हमें पूर्ण संतुष्टि नहीं दे सकती। हमारी पूर्ण तृप्ति और संतुष्टि ईश्वर में निहीत है। आज के वचनों के द्वारा प्रभु हमंा बताना चाहते हैं कि जब हम अपने जीवन में खालीपन, अधूरापन, खोखलापन, अकेलापन, परित्यत, और बेचैन महसूस करते हैं तो हमें शाँति, आराम ओर परितृप्ती की खोज में और कहीं नहीं परन्तु उनके पास जाना है।

प्रभु का निमंत्रण सबों के लिए खुला हुआ है। वे कहते हैं — ''तुम सब, जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ। जिसके पास रूपया नहीं है हो, तो भी आओ और मुफ्त में अन्न खरीद कर खाओ।''

हमारे जीवन की विभिन्न आवश्क्तओं में हम किसकी शरण जाते हैं? आज हम अपने आप से पूछें मैंने मेरे जीवन की प्यास बुझाने के लिए क्या—क्या किया है? कौन—कौन से रास्ते अपनाये हैं? कोई धन—दौलत इकट्ठा करने में अपनी संतुष्टी ढूंढते हैं तो कोई अच्छा पद या औहदा पाने में, कोई फैशनेबल कपडे पहनने में, तो कोई मेक अप करने में, कोई नाम कमाने में तो कोई प्रसिद्ध होने में, अपनी संतुष्टि तलाशते हैं। कोई नशा करके खुद को संतुष्ट करता है तो कोई शारीरिक वासनाओं को पूरा करके। सब कुछ ट्राय कर लिया पर परफेक्ट सोल्युशन नहीं मिला।

संत योहन के सुसमाचार के 4 थे अध्याय में हम पढते हैं एक स्त्री के बारे में जो याकूब के कुवें पर भरी दुपहरी में पानी भरने आती है। उस स्त्री ने अपने जीवन में संतुष्टि पाने के बहुत सारे प्रयास किये पर सारे प्रयास खोखले साबित हुए। यह सोच कर कि शारीरिक वासनाओं की तृप्ति से वह जीवन का सुख प्राप्त कर सकती है, उसने पाँच व्यक्यिों के साथ पति पत्नि का रिश्ता जोडा, संतुष्टि नहीं हुई तो उस रिश्ते को तोडा। आज हम में से कितनों के जीवन की हकीकित है ये एक दोस्त से दूसरा दोस्त, एक रिश्ते से दूसरा रिश्ता, एक काम से दूसरा काम.....जिंदगी कुछ तो ढूंढ रही है पर उसे वो मिल नहीं रहा है। आज के वचन मेें प्रभु कहते हैं —''जो भोजन नहीं है, उसके लिए तुम लोग अपना रूपया क्यों खर्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता उसके लिए क्यों परिश्रम करते हो?'' इसा. 55:2

वह समारी नारी येसु के पास आई और येसु ने उसे वो पानी दे दिया जिसने उसके जीवन की सारी प्यास बुझा दी। जब उस नारी को अनन्त जीवन के जल का ज्ञान मिला, उसने अपना घडा वहीं छोड दिया और वह यह खुशखबरी सुनाने अपने नगर को दौड़ पडी।

संत लूकस 10:41 में प्रभु येसु मारथा से कहते हैं — ''मारथा, मारथा तुम बहुत सी बातों के विषय में चिंतित और व्यस्त हो; परन्तु एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।'' हम भी दुनिया में बहुत सारी बातों को लेकर चिंतित हैं। जैसा कि नबी इसायाह कहते हैं हम जो भोजन ही नहीं है उसके लिए रूपया खर्च कर रहे हैं और जो संतुष्टि ही नहीं दे सकता उसके लिए मेहनत कर रहे हैं।

प्रभु कह रहे हैं कि दुनिया भर की भाग—दौड, काम—धंधा सब अपनी जगह ठीक है परन्तु एक ही बात आवश्यक है जो कि मरियम ने चुन लिया है। मरियम ने क्या चुन लिया है? येसु के कदमों में बैठना और उनके वचनों को सुनना। ''तुम जो प्यासे हो पानी के पास चले आओ'' मरियम प्यासी थी इसलिए वह संजीवन जल के झरने के पास चली आई। उसने येसु की वाणी से अपनी भूख, अपनी प्यास बुझाई।

नबी आमोस 8:11 — ''वे दिन आ रहे हैं जब मैं इस देश में भूख भेजूँगा — रोटी की भूख और पानी की प्यास नहीं, बल्कि प्रभु की वाणी सुनने की भूख और प्यास।''

आज के सुसमाचार में हम पढते हैं लोगों की एक भारी भीड़ येसु की वाणी सुनने के लिए येसु की खोज में गलीलिया की झील के किनारे पहुँच जाती है। वे दिन भर येसु की वाणी सुनते रहे। उन्हें घर जाने और या फिर खुद के खाने—पीने के बंदोबस्त की भी फिक्र नहीं थी। क्योंकि वे येसु की वाणी सुनकर मंत्र मुग्य हो रहे थे। दिन भर आत्मिक भोजन याने वचनों से उनकी सबसे पहली और अहम आत्मिक भूख मिटाकर प्रभु येसु शाम हो जाने पर उनकी शारीरिक भूख भी मिटाते हैं। रोटियों के चमत्कार के द्वारा Yesu panch hazar se bhi adhik logo ko bhar pet bhojan karate hain. येसु उस भीड को नश्वर रोटी से तृप्त करके आने वाले समय में वे उन्हें अनष्वर रोटी याने अपने शरीर व देह से तृप्त करने के लिए तैयार करते हैं। संत योहन के सुसमाचार में हम पढते हैं कि रोटियों के चमत्कार के बाद येसु कफरनाहुम चले जाते हैं और लोग रोटियों के चमत्कार से प्रभावित होकर वहाँ भी पहुँच जाते हैं। तब प्रभु उन्हें नश्वर रोटी से परे जाने और अनन्त जीवन की रोटी खाकर अपनी आत्मा को अमरता में ले जाने का निमंत्रण देते हैं। वे कहते हैं — ''नश्वर भोजन के लिए नहीं, बल्कि उस भोजन के लिए परिश्रम करो, जो अनन्त जीवन के लिए बना रहता है और जिसे मानव पुत्र तुम्हें देगा।'' (योहन 6:27)। तब लोगों ने उनसे कहा प्रभु! आप हमें सदा वही रोटी दिया करें। उन्होंने उत्तर दिया — ''जीवन की रोटी मैं हूँ। jo मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।'' (योहन 6:35) और आगे वे हमें बतलाते हैं — ''जो मेरा माँस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अंतिम दिन पुनर्जीवित कर दूंगा; क्योंकि मेरा माँस सच्चा भोजन है और मेरा रक्त सच्चा पेय। तो नबी इसायाह के ग्रंथ में जो निमंत्रण ईश्वर हमें दे रहा है वह और किसी भोजन और पेय के लिए नहीं परन्तु येसु के शरीर और रक्त से अपनी आध्यात्मिक भूख और प्यास मिटाने का आह्वान है, जिसे प्रभु येसु ने प्रभु भोज के रूप में हमें प्रदान करते हुए कहा कि तुम मेरी स्मृति यह किया करो। आज भी प्रभु येसु पवित्र यूखरिस्त में अपना सच्चा शरीर और सच्चा रक्त हमें खाने व पीने को देते हैं। आज भी उनका आह्वान यही है — तुम जो प्यासे हो पानी के पास चले आओ तुम जो भूखे हो मुफ्त में अपनी भूख मिटाओ।

प्यारे विश्वासियों हम अपने जीवन में कितने ही निमंत्रण पाते हैं कभी किसी शादी का तो कभी किसी जन्मदिन की पार्टी का तो कभी किसी रिसेप्शन का वगैरह और हम इन पार्टियों में जाकर दावत का मजा लेते हैं। जब निमंत्रण हमारे किसी अजीज मित्र का हो या फिर किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति का तो हम उसे ठुकराते नहीं। आज निमंत्रण kisi aur ka nahin par हमें प्रेम करने वाले, हमारे सृजनहार, हमारे तारणहार येसु मसीह का है। क्या मैं येसु के निमंत्रण को हाँ कहने के लिए तैयार हूँ? 

क्या मुझे येसु की वाणी सुनने की भूख और प्यास लगी है? जब मैं उपवास करता हूँ तो शाम तो खाना खाने के लिए बेचैन हो जाता हूँ। हम सब ने इसका अनुभव किया है। जिस तरह से मैं मेरी शारीरिक भूख मिटाने के लिए बेचैन होता हूँ, क्या उसी तरह मुझमें वचन न सुनने van a padhane पर बेचैनी होती है। क्या पवित्र यूखरिस्त ग्रहण na करने के ​कारण मुझे बेचैनी और पीडा होती है? अगर नहीं तो फिर मेरे एक विश्वासी होने में कहीं न कहीं तकनिकी खराबी है। मेरी अध्यात्मिक गाडी सही नहीं चल रही है। खैर इन दिनों कोरोना महामारी के चलते हम चर्च नहीं जा पा रहे हैं और प्रभु का शरीर और रक्त ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं। पर उसे न पाकर क्या हम अपने में अधुरापन, और खालीपन महसूस कर रहे हैं? क्या पवित्र यूखरिस्त में येसु को ग्रहण करने के लिए हममें बेचैनी और पीडा है? चलो पवित्र यूखरिस्त हमें इन दिनों नहीं मिल रहा प्रभु का वचन तो हमारे पास है। क्या प्रभु की वाणी को सुनने के लिए, या पढने के लिए मैं तरसता हूँ?

हम कब किसी की वाणी, किसी की बात सुनने को तरसते हैं, जब हम उस व्यक्ति से प्यार करते हैं। और जितना अधिक प्यार होगा, उतनी अधिक तीव्रता होगी उस व्यक्ति की बातें सुनने की। यदि में येसु की वाणी सुनने के लिए नहीं तरसता तो इसका सीधा सा मतलब निकलता है कि मुझे येसु से मुहोब्बत नहीं हुई है। मैं उन्हें जानता हूँ, पर प्यार नहीं करता। मैं उन्हें पसंद करता हूँ पर प्यार नहीं करता।

अगर मैं उनके प्यार के सागर में खुद को डुबा देता तो आज मेरे सामने दुनिया की कोई भी ताकत मुझे झुका नहीं सकती, कुछ भी मुझे विचलित नहीं करता, कुछ भी मुझे नहीं डराता। naa corona, naa atank, naa badh aru naa sukha….संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में कहते हैं — ''कौन हमें मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? क्या विपत्ति या संकट? क्या अत्याचार, या भूख, नग्नता, जोखिम या तलवार?

मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य, न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु येसु मसीह द्वारा मिला है।

दुनिया की सारी अभिलाषायें पूरा करने वाला प्रेम, सब कुछ के ऊपर विजय पाने वाला प्रेम, मौत को हराकर हमें जीवन देने वाला प्रेम सिर्फ येसु दे सकते हैं। इस दुनिया की आखिरी सच्चाई और आने वाले जीवन की परिपूर्णता सिर्फ येसु के प्रेम में निहित है। उस प्रेम के खातिर येसु ने  क्रूस पर अपनी कूर्बानी दी है और अपना लहू बहाकर हमें इस संसार व शैतान से बचाया है।  क्या आपने उस प्रेम को पा लिया है? क्या आपने उस प्रेम के सागर में गोता लगाया है? आज प्रभु हमें बुला रहे हैं । जो भी येसु के प्रेम के लिए प्यासे हैं वे उनके पास आ जायें। आईये हम येसु के पास चलें उन्हीं में हमारी पूर्ण तृप्ती है। वही हमारे जीवन की हर समस्या का समाधान, हमारी हर बीमारी का ईलाज़ और हमारे जीवन का आधार है। आमेन।