Thursday, 18 February 2021

Ash Wednesday 2021 Hindi Reflection by Fr Preetam

  उपवास के आह्वान के साथ आज हम दुःखभोग काल का आगाज़ कर रहे हैं। आत्मा के  शुद्धिकरण एवं प्रभु तथा एक-दूसरे के साथ मेल-मिलाप करने का यह उपयुक्त समय है। यह अनुग्रह का समय है, आत्माओं के उद्धार का समय है, यह अत्यंत कीमती समय है। इसे हम यूँ ही न जाने दें। आज के दूसरे पाठ में प्रभु हमसे कहते हैं - ‘‘आप को ईश्वर की जो कृपा मिली है, उसे व्यर्थ न जाने दें; क्योंकि वह कहता है - उपयुक्त समय में मैंने तुम्हारी सुनी; कल्याण के दिन मैंने तुम्हारी सहायाता की। और देखिए, अभी उपयुक्त समय है, अभी कल्याण का दिन है’’ (2 कुरिंथियों 6, 2)


पाप से विकृत हमारे मानवीय स्वभाव को आज एक सही दिशा  की ज़रूरत है। पाप की अज्ञानता में खोए मानव को आज प्रभु की ज्योति की ज़रूरत है। रोम. 3,23 में वचन कहता है - ‘‘क्योंकि सब ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित हो गये। ईश्वर की कृपा से सबों को मुफ्त में पापमुक्ति का वरदान मिला है।’’ हममें शायद ही कोई ऐसा होगा जो निष्पाप है, जिसने कभी पाप ही नहीं किया हो। हम सब पापी हैं। और यदि हम यह स्वीकार करते हैं कि हम सब पापी हैं, हम ईश्वर की महिमा से वंचित हैं, अनन्त जीवन हमारे हाथों से फिसलता जा रहा है, हम प्रभु से दूर होते जा रहे हैं, हमारा जीवन अनन्त विनाश  की ओर खींचा चला जा रहा है तो अब यह उचित समय है, हमारे उद्धार का समय है।

आज के पहले पाठ की शुरुआत में प्रभु का वचन कहता है - अब तुम लोग उपवास करो और रोते तथा शोक मनाते हुएपूरे हृदय से मेरे पास आओ" अपने वस्त्र  फाड कर नहींबल्कि हृदय से पश्चात्ताप करो और अपने प्रभु-ईश्वर के पास लौट जाओक्योंकि वह करूणामयदयालुअत्यन्त सहनशील और दयासागर है और वह सहज की द्रवित हो जाता है।हम यहाँ पर तपस्याकाल  का मूलभूत आह्वान सुन रहे हैं। इस आह्वन की सबसे पहली अवधारणा यह है कि हम सब पापी हैं और विभिन्न प्रकार से हम ईश्वर से दूर हो  गए हैं।   जैसा कि संत पौलुस कहते हैं - "सबों ने पाप किया और ईश्वर की महिमा से वंचित हो गए। " इस आह्वान की दूसरी अवधारणा यह  है कि जिस ईश्वर  से हम दूर हो गए हैं वह करूणामयदयालुअत्यन्त सहनशील और दयासागर है जो हमारी वापसी के लिए तरसता है। वह  केवल हमारी वापसी के लिए तरसता है पर जैसा कि संत पौलुस आज के दूसरे पाठ बतलाते हैं कि जिस ईश्वर से  हम दूर हो गए हैं वह अपने बेटे येसु के द्वारा हमें ढूढ़ने निकल पड़ा है।  वे कहते हैं - "मसीह का कोई पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनायाजिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें। " कितना शक्तिशाली वचन  है!  ईश्वर  ने अपने पुत्र को हमारे जैसा बनने के लिए भेजा ताकि हम भी उनके  समान बन सकें। अपने पुत्र में ईश्वर  हमारी पापमय स्थिति की ओर कूच किया ताकि हम परमेश्वर की भलाई की ओर यात्रा कर सकें। कितनी सुन्दर बात है।  

आज के दिन हमारे माथे पर लगाई जाने वाली राख दुनिया को बताती है कि हम पापी हैं। फिर भीहमें जो राख मिली हैवह एक क्रूस  के आकार में हैजो यह घोषणा करता है कि हम एक ऐसे  ईश्वर  को मानते हैं जिसका प्यार हमारे पाप से अधिक सामर्थ्यवान  है। जैसा कि पौलुस  ने रोमियों  को लिखे अपने पत्र में घोषणा की है, - "किन्तु हम पापी ही थेजब मसीह हमारे लिए मर गये थे। इस से ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है।" (रोमी 5 :8)  क्रूस पर मसीह की क़ुरबानी आपके और मेरे प्रति उनके प्रेम की निशानी है।  योहन १५:१३ में प्रभु येसु स्वयं कहते हैं - "इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।" 

आज के सुसमाचार में बतलाई गयी  प्रार्थनाउपवास और दान देने की तीन प्रथाएँमसीह में हमारे लिए ईश्वर  के प्रेम का जवाब देने के तीन पारंपरिक तरीके हैंउस ईश्वर की ओर यात्रा करने के तीन तरीके हैं जो हमारी ओर यात्रा करते हैं। ये तीनों कार्यईश्वर के पास लौट आने के आह्वान का प्रत्युत्तर है - "अब तुम लोग उपवास करो और रोते तथा शोक मनाते हुएपूरे हृदय से मेरे पास आओ"  


इन तीनों  पुण्यकर्मों को करने का हमारा उद्देश्य  हमारे सामने बिल्कुल साफ होना चाहिए। हमारे धर्म कर्मों की जानकारी सिर्फ मुझे और मेरे प्रभु को हो। हमारा उपवास, हमारी प्रार्थना दूसरों को प्रभावित करने के लिए नहीं लेकिन प्रभु को प्रसन्न करने के लिए होना चाहिए। यदि हम दूसरों को दिखाने के लिए, दूसरों की वाह-वही लूटने के लिए, दूसरों से तारीफ पाने के लिए हमारे धर्म-कर्म करते हैं तो आज का सुसमाचार हमसे कहता है हम हमारे स्वर्गीक पिता के पुरस्कार से वंचित हो जायेंगे। प्रार्थना का उद्देष्य यह नहीं कि मैं धार्मिक कहलाऊँ पर यह कि मैं प्रभु से अपना संबंध जोडूं। दान देने का उद्देष्य यह नहीं कि दूसरे लोग, मेरी उदारता को जानें पर यह कि मेरे द्वारा किसी गरीब, किसी बेसहारा, किसी पीडित की मदद हो जाये, मेरा धन, मेरी शक्ति व गुण दूसरों के काम आये।। अथवा यह कि मैं दूसरों की पीड़ा में, दर्द और दुःख में येसु की पीड़ा को देख सकूँ व उनके प्रति किये हर काम को येसु के लिए किया कार्य मानूँ।   मेरे उपवास का मतलब यह नहीं कि लोग मेरी धार्मिकता से वकिफ़ हो जायें, पर यह कि मेरी शारीरिक भूख मुझमें अध्यात्मिक भूख जगाये। रोटी की भूख मुझमें प्रभु व उसके वचनों की भूख जगाये। और मेरे उपवास व त्याग से जो कुछ बचता है उससे मैं किसी ज़रूरतमंद की मदद करूंँ। आने वाले इन चालीस दिनों में यदि मैं इन बातों पर ध्यान देता हूँ तो यह पावन समय मेरे लिए बहुत ही अर्थपूर्ण व प्रभु की आशीष व कृपा का एक स्रोत बनकर मेरे जीवन में मसीह के उद्धार व मुक्ति को प्राप्त करने में मेरी सहायाता करेगा।
आमेन।

Saturday, 6 February 2021

4th Sunday in Ordinary Time: Reflection in Hindi by Fr. Preetam Vasuniya

 योब 7ः1-4,6-7

1 कुरिं 9ः16-19,22-23

मार.1ः29-39

आज के पहले पाठ में योब अपने जीवन पर मनन चिंतन करने पर पाता है उसका जीवन बहुत ही छोटा और जल्दी समाप्त होने वाला है। वह कहता है-प्रभु याद रख कि मेरा जीवन एक श्वास मात्र है। हम में से हर एक जीवन की यही हकीकत है। इस पल भर के जीवन को हर इंसान अपने तरीके से जीता है। कोई इसे बहुत ही फलदायक रूप में बिताता है तो कोई इसे यूँ ही गँवा देता है। अलग-अलग लोगों के जीने के तरीके और उद्देश्य अलग-अलग हो सकते हैं। कई लोग तो पग-पग पर अपनी दिशाएँ और उद्देश्य बदल लेते हैं। मैं एक मसीही हूँं। मेरे जीवन का उद्देश्य क्या होना चाहिए? मैं एक शिक्षक हो सकता हूँ; मैं एक समाज सेवी हो सकता हूँ; मैं एक डाॅक्टर हो सकता हूँ; इंजिनियर हो सकता हूँ; किसान हो सकता हूँ; दिहाडी मजदूर हो सकता हूँ; शायद मुझे मेरी जीविका चलाने के लिए कुछ न कुछ काम तो ज़रूर करना पडेगा। पर एक विश्वासी होने के नाते ये सब काम करते हुए मुझे एक काम अनिवार्य रूप से करना है और वो काम है सुसमाचार की घोषणा। 

जब सुसमाचार की घोषणा की बात आती है तो साधारण जनमानस यही सोचता है यह तो फादर-सिस्टर्स का काम है, यह तो समर्पितों का काम है। ज़रूर उन्होंने सुसमाचार की घोषणा हेतु खुद को समर्पित किया है और उन्हें तो यह कार्य करना ही है। परन्तु हर व्यक्ति जिसे बपतिस्मा मिला है, जो कलीसिया का सदस्य बन गया है, उसके कंधों पर सुसमाचार की घोषणा की जिम्मेदारी रखी गई है। प्रभु का यह आदेश हर एक विश्वासी के लिए है - संसार  के कोने.कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ।

प्यारे विश्वासियों आखिर हमारे प्रभु यह क्यों चाहते हैं कि सारे संसार को सुसमाचार सुनाना चाहिए। आखिर हमारे ईष्वर की वाणी क्यों हर किसी को सुनाई जानी चाहिए? जब मैं इस पर मनन-चिंतन कर रहा था तो पवित्र आत्मा ने मेरा ध्यान उत्पत्ति ग्रंथ की ओर खींचाः जहाँ पर हम पढते हैं कि ईश्वर ने अपने वचन से सब कुछ की सृष्टि की। और उत्पत्ति अध्याय 3ः9 में हम पढते हैं - ईश्वर आदम को पुकारकर कहते हैं - आदम तुम कहाँ हो? इससे ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर आदम से हर रोज़ इस तरह बातें किया करते थे। इससे हमें यह भी समझ में आता है कि ईश्वर को इंसान से बातें करने में बहुत दिलचस्पी है। वह चाहता है कि हम रोज़ उनकी वाणी सुनें और उसका प्रत्युत्तर दें। 

ईश्वर ने आदम और हेवा से कहा था  तुम  वाटिका के सभी वृक्षों के फल खा सकते हो किन्तु  भले.बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खानाय क्योंकि जिस दिन तुम उसका फल खाओगेए तुम अवश्य मर जाओगे। 

आदम और हेवा ने  वह फल खा लिया पर वे मरे नहीं। तो फिर ईश्वर कौनसी मौत की बात कर रहे थे। संत मत्ती 4ः4 -में लिखा है -   मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है। वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है।

और वि.वि. 32ः47 में लिखा है - ये तुम्हारे लिए निरे शब्द नहीं हैंए बल्कि इन पर तुम्हारा जीवन निर्भर है। 

इन वचनों में हमने सुना और समझा की सच्चा जीवन जीने हेतु ईश्वर के वचन की ज़रूरत है। जो ईश्वर का वचन नहीं खाता या नहीं सुनता उसमें जीवन नहीं है। और जिसमें जीवन नहीं है वह मृत कहलाता है। 

पाप करने के बाद आदम और हेवा ईश्वर की वाणी से दूर हो जाते हैं याने जीवन से दूर हो जाते हैं। 

हम जानते हैं कि हमारा ईष्वर एक बहुत प्रेमी, दयालु और करूणामय ईश्वर है। और वह ईश्वर हर युग में अपने वचनों द्वारा हम से बातें करना चाहते हैं। वो हम सब का प्रेमी पिता है और हम सब उनकी ही प्यारी संतांनें हैं। 

हर युग हर जमाने में वो ईश्वर इंसानों से बातें करने के लिए तरसता रहा। पवित्र बाइलब में पढते हैं कि वह ईश्वर नूह, अब्राहम, इसहाक, याकूब, जोसफ, मूसा, योशुआ, दाऊद, सुलेमान, इसायाह, यिरमियाह, योना, मिका जैसा पूर्वजों ओर नबियों के माध्यम से मनुष्यों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखता है। 

इब्रानियों 1ः1-2 में हम पढते हैं - ‘‘प्राचीन काल में ईश्वर बारम्बार और विविध रूपों में हमारे पुरखों से नबियों द्वारा बोला था। अब अंत में वह हम से पुत्र द्वारा बोला है।’’ 

प्यारे विश्वासियों यह ईश्वर के वचन का उनकी वाणी का रहस्य है। ईश्वर अपने लोगों से सदा से बातें करना चाहता है। क्योंकि वह हमें अनन्त प्रेम से प्रेम करने वाला ईश्वर है। किसी भी बडे शहर में चले जाईये और वहाँ के उद्यानों अर्थात् पार्कों में देखिए आपको कई प्रेमी युगल जहाँ-तहाँ बैठे बातें करते मिल जायेंगे। मैं यहाँ पर प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन की कावायद नहीं कर रहा हूँ पर यह बताने की कोशिश कर रहा हूँ कि यदि कोई किसी से प्यार करता है तो वह उससे मिलना और बातें करना उसके प्यार के इज़हार का एक बहुत ही अहम पहलू है। मैं किसी से प्यार करूं और उससे बातें न करूं ये शायद संभव नहीं। यही है ईश्वर की कहानी भी। वह हम से, न केवल ख््राीस्तीयों से पर हर इंसान से बेहद प्यार करता है। और वो हम सब से प्रेम भरी बातें करना चाहता है। वो यह चाहता है कि उसकी प्रेम भरी वाणी हर इंसान सुने। उसके प्रेमी वचन हर एक कान में पडे। हर एक दिल उनके दिव्य वचनों से भर जायें। इसिलिए अनादिकाल से विद्यमान वचन देह धरकर इंसान बना और हमारे बीच रहा ताकि वो हम इंसानों से इंसानों की ज़बान में बात कर सके। आज वही पवित्र बाइबल में समाहित होकर जन-जन तक पहुँचने के लिए बेताब है। पर बडा सवाल यह है कि कौन ईश्वर के इस वचन को लोगों तक ले जायेगा? कौन लोगों को बताएगा कि एक सच्चा खुदा है जो तुम्हें प्यार करता है; जिसने आपको और मुझे बनाया है; जिसने इंसानों को पाप की दासता से छुडाने के लिए मनुष्य बनना स्वीकार किया; जो हमारे उद्धार के खातीर खुद सूली पर कुर्बान हो गया; जिसने हमारे पापों का दाम खुद के लहू की कीमत से चुका दिया है; एक ईष्वर है जो आप और मुझे पाप से बचाना चाहता है; कौन पवित्र बाइबल के इन सांत्वना भरे वचनों को लोगों तक पहुँचाएगा? अपने प्रिय बच्चों से बात करने के लिए तडपता ईश्वर आज फिर से पुछ रहा है - "मैं  किसे भेजूँघ् हमारा सन्देश.वाहक कौन होगा"

नबी इसायाह की भाँति -‘‘मैं प्रस्तुत हूँ, मुझको भेज’’ कहने के लिए आज कौन तैयार है? बेजिझक, और बेबाक लहजे में येसु के वचनों को हर इंसान तक पहुंचाने का जज्बा किसमें है? आज मैं खुद से पुछूँ क्या मैं यह काम कर सकता हूँ? या फिर मुझे ऐसा करने में हिचकिचाहट होती है या फिर मैं शर्माता हूँ? संत पौलुस रोमियों 1ः16 में कहते हैं -  मुझे सुसमाचार से लज्जा नहीं।

वही पौलुस आज के वचनों मंे कहते हैं - मैं  इस पर गौरव नहीं करता कि मैं सुसमाचार का प्रचार करता हूँ। मुझे तो ऐसा करने का आदेश दिया गया है। धिक्कार मुझेए यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ! 

दूसरे शब्दों में कहें तो लानत है मुझपर यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ अथवा अगर मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ तो यह मेरे लिए शर्म की बात है। तो सुमाचार का प्रचार करना हमारे लिए शर्म का विषय नहीं हो सकता लेकिन प्रचार नहीं करना ज़रूर एक विश्वासी के लिए शर्म की बात है। संत पौलुस कहते हैं सुसमाचार का प्रचार करना किसी के लिए एक विकल्प नहीं यह ईष्वर की ओर से आदेश हैं। संत मत्ती 28ः16-20 में हम पढते हैं - मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर पूरा अधिकार मिला है। तुम लोग जा कर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ और उन्हें पिताए पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो। मैंने तुम्हें जो.जो आदेश दिये हैंए तुम.लोग उनका पालन करना उन्हें सिखलाओ और याद रखो. मैं संसार के अन्त तक सदा तुम्हारे साथ हूँ।

प्यारे विश्वासियों आज के इस टूटे, बिखरे, निराश, बिमार, धोखा खाए हुए, विभिन्न प्रकार की बेडियों से जकडे हुए, शैतान और उसकी चालों से त्रस्त इंसान से येसु बातें करना चाहता है। येसु अपना वचन सुनाना चाहता है। और आज येसु अपको और मुझे इस कार्य हेतु एक माध्यम बनाना चाहता है; आज येसु अपनी वाणी आपके मुख में रखना चाहता है जैसा कि वह नबी यिरमियाह 1ः9 में कहते हैं -  श्मैं तुम्हारे मुख में अपने शब्द रख देता हूँ। 

आईये हम सब विश्वासी भाई-बहन अपने-अपने क्षेत्र में अपने अडोस-पडोस में अपने काम की जगहों पर, यात्रा करते समय, स्कूलों में पढते-पढाते समय, हर जगह, हर समय लोगों को येसु के वचन बाँटते रहें। संत पौलुस कहते हैं 2 तिम. 4ः2 मेें - सुसमाचार सुनाओए समय.असमय लोगों से आग्रह करते रहो। बड़े धैर्य से तथा शिक्षा देने के उद्देश्य से लोगों को समझाओए डाँटो और ढारस बँधाओय हमारे जीवन का खास मकसद यही है, हम चाहे जो कुछ भी हों प्रभु हम से यही चाहते हैं। इस धरती पर से विदा लेने से पहले उनका अंतिम आदेश यही था - ‘‘संसार के कोने-कोने में सुसमाचार की घोषणा करो। आज यह जिम्मे हमें अपने हाथों में लेना होगा, येसु के वचनों वाहक हमें बनना होगा। अनन्त प्रेम से सारी मानवजाती को प्रेम करने वाले ईष्वर की वाणी लोगों को हमें सुनाना होगा। आमेन। 


Friday, 8 January 2021

प्रभु येसु का बपतिस्मा 10 January 2021 Hindi Reflection by Fr. Preetam Vasuniya

इसायाह 55:1-11

1 योहन 5:1-9

मरकुस 1:7-11

आज हम हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के बपतिस्मा का पर्व मना रहे हैं। हर साल प्रभु के बपतिस्मा के साथ ख्रीस्त जंयती काल समाप्त होता है और हम साधारण पूजनविधी में प्रवेश  करते हैं। पवित्र सुसमाचार में प्रभु के जन्म बाल्यकाल के बारे हम थोडा ही वर्णन पाते हैं। पवित्र सुसमाचार उनके बारह से तीस साल तक के जीवन के बारे में हमें कुछ भी नहीं बताता। संत लूकस इसके बारे में सिर्फ इतना कहते हैं कि ‘‘ईसा अपने माता-पिता के साथ नाज़रेत गये उनके अधीन रहे।’’ याने उन्हेंने 18 साल का अपना जीवन अपने माता-पिता के साथ बिताया, उनके अधीन रहकर, उनकी आज्ञाओं का पालन करते हुए उनके दैनिक कार्यों में उनकी मदद करते हुए। इसके बाद तीस वर्ष की आयु होने पर वे अपना घर माता-पिता को छोडकर जिस मिशन को जिस उद्देश्य को लेकर इस संसार में आये थे उसे पूरा करने के लिए चल पडते हैं। सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने स्वयं को प्रकट करने के पहले वे यर्दन नदी की ओर जाते हैं जहाँ पर योहन बपतिस्ता लोगों को पाप क्षमा का बपतिस्मा दे रहा था। प्रभु स्वयं वहाँ लागों की भीड में योहन बपतिस्ता से बपतिस्मा लेने के लिए पानी में उतरते हैं। पवित्र त्रित्व का दूसरा व्यक्ति, इस दुनिया का सृष्टीकर्ता, अनादिकाल से पिता के साथ विद्यमान  वचन आज यर्दन नदी में योहन के सामने अपना सिर झूकाकर उनसे बपतिस्मा ग्रहण कर रहा हैं। यह वही योहन बपतिस्ता है जिसने लोगों से प्रभु के विषय में कहा था कि मेरे बाद जो आने वाला है वो मुझसे इतना महान है कि मैं झूककर उसके जूते का फिता खोलने के लायक भी नहीं हूँ (मत्ती 311, योहन 127); लेकिन आज उसी योहन बपतिस्ता के सामने प्रभु अपना सिर झूकाकर बपतिस्मा ग्रहण करते हैं।

 

वास्तव में देखा जाए तो उन्हें व्यक्तिगत रूप से किसी बपतिस्मा की ज़रूरत नहीं थी। वे तो निष्पाप थे परन्तु फिर भी वे पापियों की कतार में हम सब पापियों का प्रतिनिधित्व करते हुए वहाँ खडे थे। वे अपने निजी पापों के लिए नहीं, हमारे पापों के पश्चताप हेतु वहाँ खडे थे। उन्होंने हमारे जैसा मानवीय स्वभाव धारण किया हम पापियों का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने हम सबों के पापों को अपने ऊपर ले लिया। संत योहन के सुसमाचार अध्याय 129 में जब योहन बपतिस्ता प्रभु येसु को अपनी ओर आते हुए देखता है तो अपने शिष्यों से कहता है - ‘‘देखो-ईश्वर का मेमना जो संसार के पाप हरता है।’’ जि हाँ, प्रभु येसु वह मेमना है जिसके ऊपर पिता ने सारे संसार के पापों को लाद दिया है। नबी इसायस 526 में वचन कहता है- ‘‘हम सब अपना-अपना रास्ता पकड कर भेडों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सबों के पापों का भार डाल दिया है।’’ इसलिए प्रभु यर्दन नदी के पानी में हम सब के पापों को लेकर खडे थे। उन्हांने इसके साथ अपने उस मुक्ति कार्य को प्रारम्भ किया जिसके लिए वे इस संसार में आये थे। यह बपतिस्मा तो बस एक प्रतीक शुरूआत थी उस महान मुक्ति कार्य की जिसे पूरा करने के लिए प्रभु व्याकुल थे। संत लूकस के सुसमाचार 1250 में प्रभु कहते हैं -‘‘मुझे एक (और) बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ’’ यर्दन नदी में जो प्रतिकात्मक रूप में प्रारम्भ हुआ उसे प्रभु ने कलवारी पर अपने बलिदान द्वारा पूर्ण किया। वहाँ पर सचमुच बली का एक मेमना बनकर उन्होंने हमारे पापों को अपने ऊपर  ले लिया। इसी रक्त के बपतिस्मा लिए वे व्याकुल थे। संत पेत्रुस हमसे कहते हैं कि - ‘‘वह अपने शरीर में हमारे पापों को कू्रस के काठ पर ले गये, जिससे हम पाप के लिए मृत हो कर धार्मिकता के लिए जीने लगें’’ (1पेत्रुस 224)

प्रभु ने यर्दन नदी में बपतिस्मा ग्रहण करके बपतिस्मा के जल को पवित्र कर दिया है। और हमारे लिए स्वर्ग का द्वार फिर से खोल दिया है। पुराने विधान में योशुआ के ग्रंथ में हम पढते हैं कि इस्राएली लोग मिस्र  की गुलामी से आज़ाद होकर प्रतिज्ञात देश में प्रवेश कर रहे थे उस समय उनको यर्दन नदी को पार करना था। उस समय योशुआ ने प्रभु के विधान की मंजूषाधारी पुरोहितों को नदी के बीचों-बीच खडा कर दिया और नदी का पानी एक बाँध की तरह रूक गया और इस्राएलियों ने सुखे पाँव नदी को पार किया था। आज प्रभु उसी यर्दन नदी के बीचों बीच खडे हैं नये विधान की मंजूषा बनकर। आज वो हमसे यही चाहते हैं कि हम  भी बपतिस्मा द्वारा हमारी पापमय दासता से मुक्त होकर सूखे पाँव इस लोक से स्वर्ग लोग की ओर गमन करें। जब तक सारे इस्राएली यर्दन के उस पार नहीं चले गये तब तक प्रभु के विधान की मंजूषा वहीं पर नदी के बीच में रही। प्रभु येसु नये विधान की मंजूषा के रूप में हम सब का इंतज़ार करते हुवे यर्दन नदी की बीचों बीच खडे रहते हैं नबी इसायाह के ग्रन्थ  में हमने पढ़ते  है क ईश्वर   तो थकता हिम्मत हारता है, जब तक वह पृथ्वी पर धार्मिकता की स्थापना कर दे। याने जब तक हम यर्दन के उस पार निकल जायें, जब तक हम मुक्ति प्राप्त कर लें प्रभु हमारी मुक्ति का कार्य जारी रखता है।

 

प्रभु हर एक इंसान को अपने इस मुक्ति कार्य में  सम्मिलित करना चाहता है। वे चाहते हैं कि हर कोई उद्धार पाये, मुक्ति पाये और बच जाये। प्रभु का वचन कहता है- ‘‘ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों हो, वह ईश्वर पर श्रद्धा रखकर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता है।’’ याने यर्दन पार कर प्रतिज्ञात देश में जाने के लिए, मुक्ति पाने के लिए, प्रभु के कृपापात्र बनने के लिए हमें उन पर श्रद्धा रखकर धर्माचरण करने की ज़रूरत है। आईये तो हम हमारी अधर्म की राहों को छोडें, पाप की राहों को छोडें, शैतान का उसके सारे प्रपचों का परित्याग करें, सारे कुकर्मों का परित्याग करें पवित्र त्रियेक ईश्वर पर अपने अटूट विश्वास में दृढ बने रहें  जिसे हमने हमारे बपतिस्मा के समय स्वीकार किया था। आमेन.