Friday, 10 July 2020

वर्ष का पंद्रहवाँ इतवार 15th Sunday in Ordinary Time Cycle A 12 July 2020

वर्ष का पंद्रहवाँ इतवार

इसायाह 55:10.11
रोमियों 8:18.23
मत्ती 13:1—23

आज के पहले पाठ में नबी इसायाह के वचन के सामर्थ्य के बारे में बतलाते हुए कहते हैं - ''जिस तरह पानी और बर्फ आकाश से उतर कर भूमि सींचे बिना, उसे उपजाउ बनाये और हरियाली से ढंके बिना वहाॅं नहीं लौटते, जिससे भूमि बीज बोने वाले को बीज और खाने वाले को अनाज दे सके, उसी तरह मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती है और मेरा उद्देष्य पूरा करने के बाद ही वह मेरे पास लौट आती है।''
और आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बोने वाले के दृष्टाॅंत के माचध्यम से हमें ईश्वर के उस वचन को स्वीकार करने वाले अलग-अलग प्रकार के लोगों के बारे में शिक्षा देते हैं। 
आज हम ईश्वर के वचन के ऊपर मनन चिंतन करेंगे। 

ईश्वर का वचन क्या है? ईश्वर का वचन कहाॅं मिलता है? यदि संसार की सारी बाइबलें जला दी जाये तो क्या होगा? ईश्वर का वचन समाप्त हो जायेगा?
1 पेत्रुस 1ः24-25 में लिखा है - ‘‘समस्त शरीरधारी घास के सदृष हैं और उनका सौंदर्य घास के फूलों की तरह है, घास मुरझाती है और फूल झडता है, किंतु ईश्वर का वचन युग-युगों तक बना रहता है।’’ 
हमारा साधारण अनुभव हमें यह बताता है कि इस दुनिया में सब कुछ नष्ट होने वाला है, खत्म होने वाला है। इंसान से लेकर जानवर तक और जानवर से लेकर पेड-पौधों तक सब कुछ आज हैं और कल नहीं रहेंगे, पर ईश्वर का वचन, ईश्वर का वचन हमेशा—हमेशा के लिए रहेगा। क्यों? ......
इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें पवित्र बाइबल को ही टटोल कर देखना होगा कि ईश्वर का वचन है क्या? 
संत योहन हमें बताते हैं - आदि में वचन था, वचन ईश्वर के साथ था और वचन ईश्वर था। वह आदि में ईश्वर  के साथ विद्यमान था। उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। उसमें जीवन था। 
वचन जो है, वह प्रारम्भ से ही था। दुनिया की सुष्टि के पहले वचन ईश्वर के साथ था। और यह वचन स्वयं ईश्वर था। तो अब बोलो वचन क्या है? - वचन स्वयं ईश्वर ही है। इसी वचन के द्वारा ईश्वर ने सब कुछ की सृष्टि की। इस वचन के बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ। 
उत्पत्ति ग्रंथ 1में हम पढते हैं - ‘‘प्रारम्भ में ईश्वर  ने स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टि की। अथाह गर्त पर अंधकार छाया हुआ था और ईश्वर  का आत्मा सागर पर विचरता था। ईश्वर ने कहा, ‘‘प्रकाश हो जाये, और प्रकाश हो गाया।’’ ईष्वर ने अपने मुख से वचन निकाला और जैसा उन्होंने कहा वैसा हो गया। वचन के द्वारा ईष्वर ने संसार को रचा। 

संत योहन कहते हैं उस वचन में जीवन था। ईश्वर जैसे कहते हैं वैसा क्यों हो गया - क्योंकि उस वचन में जीवन था। ईश्वर के वचन से जीवन मिलता है। 
ईश्वर के वचन में सामथ्र्य है। असंभव को संभव करने का सामर्थ्य। रोगों को चंगा करने का सामर्थ्य। पहाडों को हटाने का सामर्थ्य। स्तोत्र ग्रंथ 107ः20 - ‘‘उसने अपनी वाणी भेज कर उन्हें चंगा किया।’’ प्रज्ञा 16ः12 में लिखा है 7 ‘‘क्यांकि उसे किसी जडी-बूटी या लेप से स्वास्थ्यलाभ नहीं हुआ, बल्कि प्रभु तेरे शब्द ने उसे चंगा किया। ’’

ईश्वर के वचन के इस सामर्थ्य को देखते हुए शतपति ने प्रभु येसु से कहा था - मत्ती 8ः8 - प्रभु मैं इस योग्य नहीं कि आप मेरे यहाॅं आयें। आप एक ही शब्द कह दीजिए और मेरा नौकर चंगा हो जायेगा। येसु ने कहा - जैसा आपने विश्वास किया वैसा ही हो जाये और उसी क्षण उसका नौकर चंगा हो गया। 
संत मारकुस 4ः39 में हम पढते हैं - येसु ने वायु को डाॅंटा और समुद्र से कहा शांत हो जा! थम जा! वायु थम गई और पूर्ण शाॅंति छा गयी। 
येसु ने मृत लाज़रूस से कहा - लाजरूस! बाहर निकल आओ! और मृतक बाहर निकल आया। ईश्वर का वचन जीवन देता है। 
ईश्वर का वचन शक्तिशाली है- 
इब्रानियों 4ः12 ईश्वर का वचन जीवन्त सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से तेज हैं। 
आज के पहले पाठ में नबी इसायाह कहते हैं - ‘‘ मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती। मैं जो चाहता था, वह उसे कर देती’’ 
ईश्वर का एक भी वचन व्यर्थ नहीं जाता। यदि प्रभु के मुख से वाणी निकलती है किसी को चंगा करने के लिए, तो वह उस व्यक्ति को चंगा कर के ही लौटेगी। यदि ईश्वर की वाणी निकलती है, मूर्दों को जिलाने के लिए तो वह मूर्दे को जिला कर ही लौटेगी। यदि ईश्वर की वाणी निकलती है किसी पापी के मन फिराव के लिए तो वह उसका मन फिराकर ही लौटेगी। 
वि.वि. 32ः47 में लिखा है - ‘‘ये तुम्हारे लिए निरे शब्द नहीं हैं, बल्कि इन पर तुम्हारा पूरा जीवन निर्भर है।  
ईश्वर के वचन नीरे शब्द नहीं इस पर हमारा जीवन निर्भर है। संत मत्ती 4ः4 में येसु ने कहा है मुनष्य से सिर्फ रोटी से नहीं जीता वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है। 
क्या हम वचन खाते हैं? ईश्वर का वचन खाने की चीज हैं। जि हाॅं ईश्वर ने अपना वचन हमें हमारे आध्यात्मिक भोजन के लिए दिया है। एजेकिएल 2ः8-9 मानवपुत्र मैं जो कहने जा रहा हूॅं उसे सुनो। अपना मुॅंह खालो और मैं जो दे रहा हूॅं उसे खा लो। मैं ने आॅंखें उपर उठाकर देखा कि एक हाथ मेरी ओर बढ रहा है और उस में एक लपेटी हुई पुस्तक थी। . . . मानवपुत्र मैं जो पुस्तक दे रहा हॅंू उसे खाओ और उस से अपना पेट भर लो। मैं ने उसे खा लिया मेरे मुॅंह में उसका स्वाद मधु जैसा मीठा था। 

हमारे जीवन के दो खास पहलू हैं - 1. आत्मा और 2. शरीर। हमारे शरीर को तंदुरूस्त रखने के लिए हम भोजन करते हैं, उसे कपडों से सजाते हैं, बिमार होने पर दवाईयाॅं लेते हैं, आदि। प्यारे साथियों शरीर जो कि नष्वर है, जो मरने के बाद कुछ काम का नहीं रह जाता उसका हम इतना ख्याल करते हैं। हमारे जीवन का खास हिस्सा हम हमारे शरीर की चिंता में बिता देते हैं। पर हमारी आत्मा का क्या? हम हमारी आत्मा के भोजन को लेकर कितने गंभिर हैं। आत्मा जो कि मरती नहीं। उसकी सेहत के लिए हम उसे कितना भोजन देते हैं। आत्मा का भोजन है - ईश्वर का वचन। संत मत्ती ने इसीलिए कहा है कि मनुष्य को जीने के लिए सिर्फ रोटी नहीं ईश्वर के वचन की भी जरूरत है।
अब हम सोचेंगे कि हम तो कितने ही सालों से वचन सुनते आ रहे हैं पर फिर भी वचन के सामर्थ्य का अनुभव इतना ठोस रूप से हमें क्यों नहीं होता? क्या हमने वचन के सामर्थ्य से बिमारों को चंगा किया है? क्या हम ने वचन के सामर्थ्य से मुर्दों को जिलाया है? क्या वचन का सामर्थ्य हमारे अंदर काम कर रहा है? क्या वचन ने मेरे जीवन को बदला है? ईश्वर का वचन सुनने के बाद भी मेरे जीवन में क्यों कुछ परिर्वतन नहीं आता या फिर मैं सुसमाचार सुनने के बाद भी क्यों अपना जीवन पहले की तरह ही जीता रहता हूँं? 
आज के सुसमाचार में प्रभु बोने वाले के दृष्टाॅंत के माध्यम से इसका जवाब दते हैं कि वचन तो सुनाया जाता है, वचन तो बोया जाता है पर सुनने वाले हृदय उसे किस प्रकार से ग्रहण करते और कैसे वचन को अपने जीवन में बढने देते हैं ये उनके ऊपर निर्भर करता है। प्रभु येसु आज तीन प्रकार के वचन सुनने वालों के बारे में हमें बतलाते हैं: पहला वे जो वचन सुनते हैं पर समझते नहीं, और शैतान वचन को चुरा ले जाता है। दूसरे वे लोग हैं जो वचन प्रसन्नता से ग्रहण तो करते हैं परन्तु उसे गहराई में नहीं उतारते, वचन को जडें जमाने नहीं देते । संकट और विपत्ती आने पर ये लोग वचन का साथ छोड देते हैं, प्रभु का साथ छोड देते हैं। तीसरे वे लोग हैं जो वचन तो सुनते हैं परन्तु वचन से ज्यादा वे अपने जीवन में दुनियाई चिंता और धन दौलत को अहमियत देते हैं। इसलिए ये चीजें वचन की वृद्धी और उसके फलों को दबा देते हैं। 
कुछ लोग हैं जो वचन को सुनते और उसका पालन भी करते हैं। उनके जीवन में वचन फलदायक रहता है। वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार फल उत्पन्न करते हैं कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना।  

Friday, 3 July 2020

14 th Sunday in Ordinary Time, 5 July 2020



Zec 9:9-10
Rom 8: 9, 11-13
Mt. 11:25-30

आज के पहले हम पाठ में इस्राएल के राजा के गधे पर सवारी करने के बारे में सुनते हैं। किसी राजा का एक गधे की सवारी करना उसकी विनम्रता का प्रतीक माना जाता था।  आज के सुसमाचार में प्रभु येसु भी स्वयं को स्वाभाव से विनम्र और विनित बताते हैं। जब प्रभु येसु अपनी मृत्यु के पहले, येरुसलेम में आने वाले मसीहा वा राजा के रूप में महिमामय प्रवेश कतरे हैं, तब वे अपनी इस विनम्रता को एक गदही के बछड़े की सवारी करके प्रकट करते हैं।     
पवित्र बाइबिल में गरीब और दीन-हीन लोग प्रभु के चुने हुए व आशीषित लोग माने गए हैं।  खासकर के लूकस के सुसमाचार में प्रभु येसु के बाल्यकाल की घटनाओं में हम पाते है कि कैसे दींन - हीनों की ज़िन्दगी में प्रभु की आशीष मिलती है , जैसे: -  मरियम और ज़करियस दोनों गरीब और दुर्भाग्यवान थे; मरियम को  अपने बेटे को जन्म देने के लिए ढंग की जगह भी नहीं मिलती; बालक येसु के प्रथम दर्शन हेतु गरीब चरवाहे आते हैं; संत जोसफ बालक येसु को मंदिर में चढ़ाते समय कोई बड़ी भेंट नहीं दे पाता वह कपोतों का एक जोड़ा ही चढ़ा पाता  है, जो कि एक गरीब की भेंट मानी जाती है; मंदिर  में विधवा अन्ना और बूढ़ा सिमयोन ये सब थे गरीब व दींन -हीन पर इनकी ज़िन्दगी में बहुत ही अनुग्रह था, प्रभु की आशीष थी।  माता मरियम ने इस तथ्य की अभिव्यक्ति अपने भजन में कुछ इन शब्दों में की - "उसने घमंडियों को तितर-बितर क्र दिया है। उसने शक्तिशालियों को उनके आसानों से गिरा दिया और दिनों को महान बना दिया है। " (लूकस 1:51-52) 

 आज का दूसरा पाठ रोमियों अध्याय आठ से लिया गया है। इसमें ‘‘आत्मा‘‘ शब्द का प्रयोग बीस बार किया गया है। आज के चार वाक्यों में ‘‘आत्मा‘‘ शब्द 6 बार आया है। यह संत पौलुस की उस शिक्षा का प्रमाण है जो आध्यात्मिकता से सम्पन्न है। संत पौलुस हमें चेतावनी देते हैं कि हमें सांसारिकता से ऊपर उठकर आध्यात्मिकता को महत्व देना है, शारीरिक जीवन की तुलना में आत्मिक जीवन को प्राथमिकता देना चाहिये। अगर हम शरीर की इच्छा के अनुसार जीयें तो शरीर के कर्जदार बन जायेंगे। हम खीस्तीय बपतिस्मा स्वीकार कर चुके हैं। बपतिस्मा संस्कार में हम सबके सब पाप की ओर से मर चुके हैं। हमारा पुराना स्वभाव उन्हीं के साथ क्रूस पर चढ़ाया जा चुका है, जिससे पाप का शरीर मर जाये और हम फिर पाप के दास न बनें। इसलिये हमें आत्मा से प्रेरित होकर जीवन बिताने के लिये संत पौलुस सलाह देते हैं। 

शरीर के कुकर्मों का आशय सिर्फ दैहिक वासनाओं  की पूर्ति ही नहीं संत पौलुस इसका दायरा विस्तृत हुए गलातियों  को लिखे पत्र 5: 19 में बतलाते हैं - "शरीर के कुकर्म प्रत्यक्ष हैं - अर्थात व्यभिचार, अशुद्धता, लम्पटता, मूर्तिपूजा, जादू-टोना, बैर, फूट , ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थपरता, मनमुटाव, दलबंदी, द्वेष, मतवालापन, रंगरेलियाँ, और इस प्रकार की बातें।  याने हम जो कुछ भी अपने खुद  के स्वार्थ की पुत्री के लिए करते हैं , वे सब पापमय हैं।  

हमें इन प्रवृतियों का दास बनकर नहीं बल्कि इन से ऊपर उठाकर आत्मा से संचालित जीवन जीना है।  हमारे जीवन में  पापमय प्रवृतियों और आध्यात्मिकता के बीच एक द्वन्द युद्ध निरंतर चलता रहता है।  संत पौलुस इसके विषय में रोमियों को लिखे पत्र अध्याय 7 में वर्णन करते हुए कहते है - "हम जानते हैं कि संहिता आध्यात्मिक है, किन्तु मैं प्रकृति और पाप का का दास हूँ , मैं अपना ही आचरण नहीं समझ पाता। ... क्योंकि भलाई करने की इच्छा तो मुझमें विद्यमान है , किन्तु उसे क्रियान्वित करने की शक्ति नहीं।  मैं जो भलाई चाहता हूँ, वह कर नहीं पाता, बल्कि जो बुराई नहीं चाहता, वही कर डालता हूँ।"

क्या संत  पौलुस की तरह  हम सब भी इस आध्यात्मिक और सांसारिक द्वन्द युद्ध से रूबरू होते ? शायद रोज़ ही।  संत पौलुस की तरह यदि हम अपने पापमय स्वाभाव को येसु मसीह  के साथ क्रूस पर नहीं चढ़ाते तो  हमारा झुकाव  संसार व पाप की और ही रहेगा, शरीर  और शरीर की अभिलाषाओं, संसार  और सांसारिकता की ओर की  रहेगा।  जो अपने जीवन में पवित्र आत्मा की आवाज़ को नज़र अंदाज़ करता है, सुनकर भी अनसुना करता है धीरे -धीरे वह ईश्वरहीनता का एहसास करने लगता है और पाप का गुलाम बन के रह जाता है।  भलाई और बुराई , पाप व धार्मिकता के बीच चुनाव करने के लिए हमें येसु से सीखना है  जो आज के सुसमाचार में हमसे कहते है - "मुझसे सीखो " 

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु  कहते हैं , मेरा जुआ अपने ऊपर ले ले और मुझ से सीखो।  यहूदियों के लिए जुआ मूसा की संहिता का प्रतिक था, जिसका पालन करना  कई लोगों के लिए एक बोझ जैसा था, हालाँकि यह ईश्वर का अपनी प्रजा के प्रति प्रेम का प्रतिक व अपने लोगों को ईश्वर से जोड़ने वाली एक कड़ी था। ।  इस सन्दर्भ में प्रभु येसु कहते  हैं मेरा जुआ सहज और मेरे बोझ हल्का है।  प्रभु येसु कोई तानाशाही मालिक या गुरु नहीं थे , पर वे तो सबों के साथ सहानभूति रखने वाले कोमल और विनम्र व्यक्ति थे जिन्होंने अपना जीवन अपने अनुयायों के लिए दे दिया।  उनका जुआ कोई बाहरी कानून  नहीं वरन आत्मा का आतंरिक आवेग है, जैसा कि आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस हमसे  कहते हैं।  जो आत्मा के द्वारा संचालित है उनके लिए ईश्वर की इच्छा पूरी करना एक आनंद का विषय होता है।  यह उनके लिए कोई बोझ नहीं लेकिन  ऐसा करके वे अपने  ईश्वर के  प्रति अपना प्रेम ज़ाहिर  करते हैं।  येसु मसीह का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के जीवन में ज़रूर उसे अपना जुआ ढोकर चलना है , अपना क्रूस उठाना है।  दुःख, तकलीफ, पीड़ाये, परेशानियाँ , अत्याचार ये सब आना स्वाभाविक है।  पर जो व्यक्ति आत्मा और आत्मिक बातों को अहमियत देता है वह इन सब बातों को अपनी आत्मा के हित में एक आशीष के तौर पर ग्रहण करता है।  

प्रभु येसु का आह्वान है कि हम उनका जुआ अपने ऊपर ले लें।  याने उनका मनोभाव धारण करें।  ज़िन्दगी की हकीकत से रूबरू होने के लिए हम मसीह का नजरिया अपनाएं।  संत पौलुस फिलि 2:5 में कहते हैं - "आप अपने मनोभावों को मसीह के मनोभावों के  अनुसार बना लें। " 

इसलिए मसीह के अनुयायों को मसीह के सामान मनोभाव रख कर दूसरों के साथ व्यव्हार करना चाहिए: किसी के लिये बोझ बनकर नहीं बल्कि दूसरों का बोझ  हल्का करने बनना चाहिए।  ख्रीस्त की प्राथमिकता आत्मा की मुक्ति है। आइए हम हमारे जीवन के हरेक बोझ को इस यूखारिस्तीय समारोह में प्रभु के समक्ष लाये औरविश्वास करें की प्रभु उसेअवश्य हल्का करेंगे। हम एक-दूसरे का बोझ भी परस्पर प्रेम, भाईचारे और परोपकार के माध्यम से हल्का करते रहें व परहित में अपना जीवन बिताएं। आमेन।  

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Have a Blessed Sunday 


Thursday, 18 June 2020

प्रभु येसु ख्रीस्त के अति पवित्रतम हृदय का पर्व 19 June 2020

विधिविवरण 7:6-11

1 योहन 4: 7- 16 
मत्ती 11: 25-30 

आज हम प्रभु येसु ख्रीस्त के अति पवित्रतम हृदय का पर्व मनाते हैं। हृदय का पवित्र बाइबल में क्या महत्व अथवा स्थान है? पवित्र बाइबल में करीब 1000 से भी ज्यादा बार हृदय शब्द का प्रयोग हुआ है। कैथोलिक धर्म की धर्म शिक्षा के नम्बर 2563 (CCC2563) में हृदय  को किसी मनुष्य का छिपा हुआ केंद्र कहा गया है। केवल ईश्वर ही इसे पूरी तरह से समझ सकता है. 


यदि मुझे किसी को जानना है तो उस व्यक्ति को मेरे सामने अपना दिल को खोलना होगा। कई बार किसी बात का यकिन दिलाने के लिए हमारा कोई अजीज़ दोस्त हम से कहता हैं कि मैं तुम्हें मेरे दिल की बात बता रहा हूँ। इसका मतलब क्या हुआ? यह कि वह व्यक्ति अपनी सबसे भीतर की बात व अपनी सबसे व्यक्तिगत बात को हमारे सामने रख रहा है। और दूसरे शब्दों में यदि हम कहें तो वह अपना दिल हमारे सामने खोल रहा है; वह अपने भीतर छिपी सच्चाई को हमारे सामने रख रहा है। और भी सटीक रूप  से कहें तो वह व्यक्ति यह चाहता है कि हम उसे उस रूप में समझें जैसा वो वास्तव में है।

आज का यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि सारी कायनात के खुदा, हम सब को बनाने और हमारा अस्तित्व बनाये रखने वाले ईश्वर ने अपना दिल हमारे लिये खोला दिया है। पवित्र हृदय के प्रति हमारी भक्ति का आधार यही है। आज के पहले पाठ में प्रभु का वचन कहता है कि उन्होंने इस्राएलियों को उनकी किसी श्रेष्ठता के कारण नहीं अपनाया पर प्रभु ने उनके प्रति अपने प्रेम के खातिर उन्हें अपनी प्रजा बनाया। और आज के दूसरे पाठ में प्रभु का वचन हमें ईश्वर की परिभाषा बतलाता है।  और वो है - ईश्वर प्रेम है. ईश्वर का अस्तित्व ही प्रेम है . 

इसलिए पवित्र हृदय के प्रति भक्ति का मलतब होता है ईश्वर के अस्तित्व व उसके सार-तत्व के प्रति भक्ति। दूसरे शब्दों में पवित्र हृदय की भक्ति ईश्वर के प्रति भक्ति ही है, उस रूप में जैसा कि वह अपने आप को हम पर प्रकट करना चाहता है। पूर्व संत पिता बेनेडिक्ट सौलहंवें  कहते हैं - ‘‘उनके छिदे हुए हृदय में स्वयं ईश्वर का हृदय खोला गया है। यहाँ हम देखते हैं कि ईश्वर कौन है और ईश्वर कैसा है। अब स्वर्ग बंद नहीं रहा। ईश्वर अदृष्य से बाहर आ गया है ।’’

यदि ईश्वर अपने आप को इस रूप में प्रकट नहीं करते तो शायद हमें उन्हें जानने का मौका नहीं मिलता। हमें बस ईश्वर के इस निमंत्रण को स्वीकार करना है। येसु अपना दिल  खोलकर हमें यह बतलाना चाह रहे हैं कि ईश्वर मनुष्यों के साथ एक रिशता कायम करना चाहते हैं। हमें दिल से अपनाना चाहते हैं। दुनिया का कोई भी धर्म ईश्वर की ऐसी सुन्दर तस्वीर हमारे सामने नहीं पेश  करता है। केवल मसीहत में खुदा इंसान से इतना अधिक प्यार करता है  कि वह हम में से एक जैसा बन जाता है ताकि वह हमारे लिए अपना दिल खोल सकें और हम उनके साथ प्रेम के रिश्ते  में जुड जायें। 

 समारी स्त्री के वाकये में येसु उस स्त्री से पानी माँगता है। प्रभु प्यासा है। क्रूस से भी उन्होंने यह कहा था - ‘‘मैं प्यासा हूँ।’’ (योहन १९:२८).   हमारा ईश्वर आज भी प्यासा है, हमारे लिए। आज भी उसका दिल हमारे लिए खुला हुआ है। वह हर रोज अपना दिल खोलकर हमें अपने पास बुलाता है। आज के सुसमाचार में वो प्रभु येसु हम से कहते है - "थके मांदे  और बोझ से दबे हुए लोगों! तुम सब के सब मेरे पास आओ . मैं तुम्हें विश्राम दूंगा. मैं स्वाभाव से नम्र और विनीत हूँ. " वो अपने प्रेमी ह्रदय के करीब हम सब को बुला रहा है . वो हमें अपने प्रेम के सागर में डूबा देना चाहता है . वह हर रोज हमें यह निमंत्रण देता है कि हम उनके प्यार को  जाने, पहचानें व उसके प्रेम में दिवाने हो जायें। उसके प्रेम के रस में अपने का डुबो दें। उसके छिदे हुए हृदय से टपकते लहू व जल से हम अपने पापमय जीवन को धो लें। और अपने आप को येसु के प्रेमी हृदय में छिपा लें जो सिर्फ और सिर्फ हमारे खातिर माँस बना, ताकि एक मानवीय हृदय से ईश्वर अपने बच्चों से प्यार कर सके। आईये हम येसु के पवित्रम हृदय की तस्वीर को हमारे जेहन में लायें जो कि सारी मानवजाती के प्यार के लिए दहक रहा है। और अपने आपको व सारी मानवजाती को प्रभु येसु के अति पवित्रतम् हृदय के प्रति समर्पित करें व प्रार्थना करें जिससे  जैसा कि संत पौलुस कहते हैं - "आप लोग  येसु के प्यार की लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई, और गहराई   को समझ सकें" (ऐफेसयों 3 :18) और उनके प्रेम के निमंत्रण को स्वीकार कर उनके प्रेम में निरंतर बढते जायें। आमेन।


Sweet Heart of Jesus, 
be my love.

Happy Feast 

Wednesday, 3 June 2020

पवित्र त्रित्व का रविवार 07 June 2020


पवित्र त्रित्व का रविवार

निर्गमन 34:4-6, 8-9 22-31
2 कोरिंथि 13:11-13  
योहन 3:16-18 
आज हम पवित्र त्रिएक ईश्वर का रविवार मनाते हैं। और आज के दिन शायद प्रवचन देना सबसे मुश्किल  होता है। क्योंकि पवित्र त्रित्व का रहस्य ईश्वर के अस्तित्व का सबसे गहरा रहस्य है। ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में, या उनके देहधारण को या फिर उनके पुनरूत्थान को काफी हद तक समझा जा सकता है। परन्तु एक ही ईश्वर होते हुए भी उसमें तीन जन होना, वो भी बिना किसी भिन्नता के, बिना किसी विरोधाभास के और बिना किसी वर्गिकरण के। ऐसे एक अटूट व परिपूर्ण एकतारूपी ईश्वर के अस्तित्व को समझना साधारण व सीमित मानव बुद्धी के बस की बात नहीं।

कई लोग इसे समझाने के लिए कई ऐसे उदाहरण पेश करते हैं जिसे हम हमारी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा अनुभव कर सकते हैं और समझ सकते हैं। जैसे कई लोग पानी की तीन विभिन्न अवस्थाओं का हवाला देते हुए कहते हैं जैसे पानी का मौलिक रूप H2O है, पर वह तीन विभिन्न अवस्थाओं में पाया जाता है जैसे द्रव (तरल पानी), ठोस (बर्फ) और गैस (भाप)। इन तीनों रूपों में वह है तो वही पानी पर तीन विभिन्न अवस्थाओं में मौजूद रहता है। वैसे ही ईश्वर है तो एक ही वास्तविकता एक ही अस्तित्व पर वह तीन विविध रूपों में अपने आप को प्रकट करता है - पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।

परन्तु सच्चाई यह है कि कोई भी अनुभवजन्य ज्ञान या उदाहरण पवित्र त्रित्व को समझाने के लिए सटीक या पर्याप्त नहीं है। क्योंकि यह ‘ईश्वर’ का रहस्य है। इसायाह 55ः8-9 में वही ईश्वर हम से कहते हैं - ‘‘तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं है और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं है। जिस तरह आकाश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।’’

जब हम पवित्र त्रित्व के बारे में बात करते हैं  तो मैं इसकी शुरूआत संत योहन के पहले पत्र अध्याय 4ः8 से करना उचित समझता हूँ। जहाँ पर संत योहन ईश्वर की परिभाषा इन शब्दों में पेश  करते हैं - ‘‘ईश्वर प्रेम है।’’
हम ख्रीस्तीयों की सबसे हटकर एक पहचान है और वह है हमारी ईश्वर की समझ या ईश्वर की पहचान। ख्रीस्तीयों के लिए ईश्वर प्यार है। एक यहूदी या फिर मुस्लिम यह कहेंगे कि ईश्वर प्यार करता है। यह सच है। परन्तु ईसाईत की अलग पहचान इस बात को लेकर है कि हमारे लिए ‘ईश्वर प्यार है।’ दूसरे शब्दों में प्यार वह कोई चीज नहीं जिसे ईश्वर करता है परन्तु प्यार ईश्वर की परिभाषा है, प्यार ईश्वर की एक पहचान है। या फिर प्यार ईश्वर का अस्तित्व है। ‘ईश्वर प्यार है’ यह दावा ही पवित्र त्रित्व को समझने व पहचानने का आधार है। ईश्वर प्यार है और ईश्वर त्रित्व है ये दोनों एक ही बात की और इंगित करते हैं।

यदि हम यह कहते हैं कि ईश्वर प्यार है तो ईश्वर के अपने अस्तित्व के भीतर ही यह प्यार क्रियाशील होना चाहिए। याने ईश्वर के एक ही अस्तित्व में प्यार करने वाला, प्यार पाने वाला और प्यार स्वयं मौजूद होना चाहिए। जि हाॅं ईश्वर संसार से प्यार करता है यह सत्य है। परन्तु आदिकाल से ईश्वर की पहचान यह है कि वह प्यार है। और इसलिए हमें यह कहना उचित है कि ईश्वर प्यार है और अपने अंदर उस प्यार की तीन भूमिकायें हैं। पिता जो कि प्यार का उद्गम है, और  जो पुत्र से प्रेम  करता है और पिता पुत्र के बीच का यह प्रेम ही आत्मा है। पवित्र त्रियेक ईश्वर यह बतलाता है कि उसमें प्रेम की परिपूर्णता है। जिसमें प्रेम की परिपूर्णता है वही सच्चा और पूर्ण ईश्वर हो सकता है। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा में प्रेम की परिपूर्णता विद्यमान है। जब हम प्रेम की बात करते हैं तो हमारा अनुभव हमें यह बतलाता है कि प्यार कभी निश्छल नहीं हो सकता है परन्तु प्यार हमेशा गतिशील रहता है। यदि मुझमें किसी के प्रति प्यार है तो वह प्यार मेरे भीतर निष्क्रिय रूप में पडा नहीं रहता पर वह गतिशील  या क्रियाशील  होकर अपनी अभिव्यक्ति का रास्ता खोजता है। वह शब्दों द्वारा, उपहार द्वारा, आलिंगन द्वारा, स्पर्श द्वारा, चुंबन द्वारा या फिर मन में प्रेम भरी एक कल्पना द्वरा व्यक्त किया जाता है।

उसी प्रकार जब हम कहते हैं कि ईश्व प्यार है तो यह प्यार अपने आप में निष्क्रिय नहीं रह सकता। वह अपनी अभिव्यक्ति खोजेगा। हम यह जानते और विश्वाश करते हैं कि ईश्वर अनादिकाल से विद्यमान हैं। यदि ईश्वर अनादि काल से विद्यमान है और वह ईश्वर प्रेम है तो उस ईश्वर को त्रियेक रूप में होना आवश्यक आवश्यक  है। क्योंकि एक ही जन में, अपने आप में प्रेम की अभिव्यक्ति असंभव है। इसलिए ईश्वर जो कि प्यार है वह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के रूप में एक ही प्यार के बंधन में एक ही सह अस्तित्व में निवास करता हैं। इसलिए पवित्र त्रित्व में ही पूर्ण ईश्वर हो सकता है। अन्यथा ईश्वर में एक अधूरापन रह जाता है। और जिसमें अधूरापन है वह ईश्वर नहीं हो सकता। 

अब ये पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा अपना अलग-अलग अस्तित्व रखने वाले तीन ईश्वर नहीं वरन एक ही ईश्वर के तीन जन हैं। इनका अस्तित्व एक ही है और वह है एकमात्र ईश्वर का अस्तित्व। ये तीनों अलग-अलग अस्तित्व नहीं रख सकते। इन तीनों को एक ही अस्तित्व में परिपूर्णता से बाँधे रखने वाली शक्ति है उनका प्रेम। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच कभी विभाजित न की जा सकने वाली एकता का रहस्यह है उनका अविभाजित, कभी न तोडा जा सकने वाला और कभी न खत्म होने वाला प्यार। इसलिए प्रभु येसु संत योहन 10ः30 में कहते हैं - ‘‘मैं और पिता एक हैं।’’ और योहन 14ः9 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है।’’ और संत पेत्रुस पेंतेकोस्त के दिन अपने प्रथम भाषण में लोगों से नबी योएल के ग्रंथ का हवाला देते हुए पवित्र आत्मा के विषय में की गई भविष्यवाणी के बारे में बतलाते हैं - "मैं अंतिम दिनों सब शरीरधारियों पर अपना आत्मा उतारूँगा।’’ यहाँ पर ईश्वरअपने आत्मा के बारे में कह रहे हैं। जो आत्मा पेंतेकोस्त के दिन प्रेरितो पर उतरा वह ईश्वर से बाहर अस्तित्व रखने वाली कोई आत्मा नहीं परन्तु स्वयं ईश्वर का आत्मा था। याने पवित्र त्रित्व का तीसरा जन स्वयं ईश्वर की त्रियेक सत्ता से प्रसृत होता है।

ईश्वर का त्रिएक रूप में होना हमें क्या सिखलाता है? ईश्वर का त्रिएक अस्तित्व है याने प्रेम की परिपूर्णता का अस्तित्व है। अपने इसी स्वाभाव के कारण ईश्वर हमारी सृष्टि करता है और वही  त्रियेक ईश्वर हमें अपने इस प्रेम में भागिदार होने के लिए बुलाता है। संत योहन 14ः23 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘यदि कोई मुझे प्यार करेगा तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आकर उसमें निवास करेंगे।’’
तो यह है पवित्र त्रित्व में विश्वास करने का अंतिम उद्देश्य कि हम ईश्वर के इस असीम और अनन्त प्रेम के भागिदार बन जायें।

संत योहन 14ः1 में प्रभु येसु अपनी ख़्वाहिश इन श्ब्दों में बयाँन करते हैं - "जिससे जहाँ मैं हूँ वहाँ तुम भी रहो’’ प्रभु येसु कहाॅँ है? इसके बारे में योहन 14ः11 में येसु हमें बतलाते हैं  - ‘‘मैं पिता में हूँ ओर पिता मुझमें हैं’’ इसका आशय यह हुआ कि पवित्र त्रिएक ईश्वर हमें अपने प्रेम में एक हो जाने के लिए बुलाता है। याने हम सब पिता पुत्र और पवित्र आत्मा के एकता में भागीदार होकर एक हो जाएँ।  

येसु ख्रीस्त की शिक्षाओं पर चले बिना हम उनसे प्यार नहीं कर पायेंगे और न ही उनके प्यार के सहभागी बन पायेंगे। तो सबसे पहले हमें येसु ख्रीस्त  को पहचानना उन्हें स्वीकार करना और उनकी आज्ञाओं को मानना होगा। तब हम उनसे प्यार कर पायेंगे और स्वयं पिता हमें प्यार करेगा और पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा हममें आकर निवास करेंगे। 
आमेन।