Wednesday, 28 October 2020

30th Sunday in Ordinary Time Year A 25 Oct. 2020: #ReflectionbyFRPreetam

 

30 वां इतवार

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प्यारे विश्वासियों मनुष्य जीवन जैसा कि हम जानते हैं कि सब जीव-जुतुओं में श्रेष्ठ है। इसकी श्रेष्ठता के कई मायने हैं। जैसा कि दाषर््निक कहते हैं - मैन इस रैशनल आनिमल या मनुष्य एक तार्किक या वैचारिक प्राण है। याने इंसान में सोच विचार करने की शक्ति है। सामजषास्त्रि कहते हैं मानुष्य एक सामजिक प्राणी है। वहीं मनोवैज्ञानिक कहते हैं मनुष्य एक भावनिात्मक प्राणी है। और ये सारे विद्वावन मनुष्य की इस उद्भुत पहचान की तहकिकात करते हैं] vkSj ये पता करने का प्रयास करते हैं कि मनुष्य ऐसा है तो क्यों है। पवित्र बाइबल हमें इंसान की एक परिभाषा देती है जिसमें उससे संबंधित सारे सवालों के जवाब छिपे हैं। वह है उत्पत्ति 127 ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनया, उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया।’’ तो पवित्र बाइबल के अनुसार मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है। ईश्वर का प्रतिरूप या फिर ईश्वर का स्वरूप से क्या आषय है? यहाँ हमारे भौतिक स्वरूप की बात नहीं हो रही है। बल्कि हमारे मौलिक स्वरूप की बात हो रही है। मूल रूप से मनुष्य की सृष्टि ईश्वर के सादृष्य में की गई है, ईश्वर ds स्वभाव में हमें बनाया गया है। ईश्वरीय स्वरूप या स्वभाव क्या है? संत योहन कहते हैं ईश्वर प्रेम है संत योहन 48,16 इसी मूल स्वरूप में हम सब को बनाया गया है। एक इंसान होने की सबसे उत्तम एवं बडी पहचान है ''प्रेम'' जो निस्वार्थ रूप से दूसरों को प्यार करता है, जिसका ह्दय प्रेम से भरपूर है वह सच्चे अर्थों में एक इंसान है। 1 कुरिं. 13: 1 से लेकर आगे के वचनों में संत पौलुस कहते हैंमैं भले ही मनुष्यों तथा स्वर्गदूतों की सब भाषाएँ बोलूं; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो मैं खनखनाता घडि़याल या झनझनाती झाँझ मात्र हूँ। मुझे भले ही भविष्यवाणी का वरदान मिला हो, मैं सभी रहस्य जानता होऊँ, मुझे समस्त ज्ञान प्राप्त हो गया हो, मेरा विश्वास इतना परिपूर्ण हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव हैं, तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।

 

इसलिए आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ने प्रेम की आज्ञा को सबसे श्रेष्ठ बताया है ''अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है। दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।'' प्रभु येसु की नई आज्ञा में प्रेम के दो आयाम हैईश्वर के प्रति प्रेम और पडोसी के प्रति प्रेम। पवित्र बाइबल की यह शिक्षा अपने आप में केवल मनुष्यों के आपसी रिश्तों को परिभाषित करती है, पर यह इंसान के इस दुनिया में आने के उद्देश्य को भी स्पष्ट करती है। वास्तव में हमारे मानवीय जीवन के बहुत सारे उद्देश्य नहीं है। सिर्फ एक ही उद्देश्य है और वह हैईश्वर से प्रेम करना और मनुष्यों से प्रेम करना।

 

जिस प्रकार से हमारा प्रेम दो आयामी है याने ईश्वर के प्रति और मनुष्यों के प्रति उसी प्रकार हमारे पाप भी दो आयामी हैईश्वर के विरूद्ध और मनुरष्यों के विरूद्ध। वास्तव में पाप और कुछ नहीं सिर्फ प्रेम का आभाव है। जब ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम कम हो जाता है; जब हम ईश्वर को  अपनी सारी बुद्धी, शक्ति, आत्मा और दिल से प्यार नहीं करते तो हम उनके विरूद्ध पाप करते हैं। और जब हम अपने पडोसी को अपने समान प्यार नहीं कर पाते तब हम उनके विरूद्ध पाप करने लग जाते हैं।

 हम जानते हैं प्यार ka रिश्ता बहुत ही नाजुक होता है। हम जिसे प्यार करते हैं उसे कभी भी किसी भी प्रकार से नाराज़ करना अथवा उसको ठेस पहुँचाना नहीं चाहेंगे। हम जिससे प्यार करते हैं उसे हम हमेशा खुश देखना चाहते हैं। इसलिए यदि मैं कहता हँ कि मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ तो फिर मैं अपने गलत कार्यों पापों के कारण उनको नाराज़ नहीं कर सकता। संत पौलुस कहते हैं कोल. 3:17 आप जो भी कहें या करें, वह सब प्रभु ईसा के नाम पर किया करें। और 1 कुरि. 10:31— इसलिए आप लोग चाहे खायें, या पियें, या जो कुछ भी करें, सब ईश्वर की महिमा के लिए करें। यदि मैं ईश्वर से प्रेम करने वाला हूँ तो मेरा हर काम उनके नाम पर और उनकी महिमा के लिए होगा। अगर ऐसा नहीं है तो मेरा ईश्वर के प्रति प्रेम सच्चा पूर्ण नहीं है।

संत योहन 4:20 में प्रभु का वचन कहता है — ''यदि कोई यह कहता है कि मैं ईश्वर को प्यार करता हूँ और वह अपने भाई से बैर करता है, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी नहीं देखा, प्यार नहीं कर सकता। तो प्यारे विश्वासियों हमारा मसीही प्रेम सिर्फ ईश्वर तक सीमित नहीं रह सकता जो कोई सचमुच में ईश्वर को प्यार करता है तो उसके दिल से अपने पडोसि अपने भाई बहनों हर इंसान के प्रति प्रेम स्वत: ही उमड पडेगा। तो कोई यह कहकर खुद को झूठा साबित करे कि मैं ईश्वर को तो बहुत प्यार करता हूँ। मैं चर्च जाता हूँ, रोज़ प्रार्थना कर लेता हूँ, और मिस्सा में भाग लेता हूँ वगैरह पर अपने पडोसी को तो मैं देखना भी पसंद नहीं करता। वो तो पापी है और नर्क में ही जायेगा ityadi नहीं नहीं ऐसा कभी हो ही नहीं सकता, ईश्वर को प्यार करने वाला हर इंसान मनुष्यों के प्रति भी वैसा ही प्यार दिखायेगा।

लेकिन पाप शैतान के प्रभाव में आकर हमने हमारे इस प्रेम के रिश्ते को बिगाड दिया है। इस दुनिया में कई लोग तो ऐसे हैं जिनका तो ईश्वर के प्रति प्रेम है और ही मनुष्यों के प्रति। कई लोग इस प्रकार का खोखला जीवन जी रहे हैं। वे इस दुनिया में कुछ भी कर गुज़रने से नहीं हिचकते। उनके लिए हत्या, बलात्कार, लूट, चोरी, हिंसा, भ्रष्टाचार, क्रोध, ईर्ष्या, नफरत आदि सब प्रकार की बुराईयाँ पाप नहीं होती। उनके मन में ईश्वर का भय नहीं क्योंकि वे ईश्वर से प्यार नहीं करते। उनके मन में अन्य लोगों के प्रति कोई भावना नहीं होती क्योंकि उनके अंदर प्रेम नाम की चीज ही नहीं होती।

 

मसीह येसु ने हमारे इस बिगडे हुए प्रेम के रिश्ते को अपने क्रूस बलिदान द्वारा पुन: स्थापित किया है। पाप बुराई ने ईश्वर और मनुष्यों के प्रेम के रिश्ते को तहसनहस कर दिया था तो येसु मसीह ने उसे अपने क्रूस पर मरण द्वारा फिर से जोड दिया है।  क्रूस इस द्विआयामी प्रेम का चिन्ह है। क्रूस से हम सब भलीभॉंति परिचित हैं, यह दो लकडियों का बना होता हैएक खडी और दूसरी आडी। खडी लकडी जमीन से ऊपर की ओर जाती है जो मनुष्यों के ईश्वर के प्रति प्रेम को दर्शाता है और आडी लकडी मनुष्यों के आपसी प्रेम को दर्शाता है। ये दोनों लकडियाँ आपस में जुडकर धन या फिर प्लस का चिन्ह बनाती हैं। याने पवित्र क्रूस पर प्रभु येसु ने इस दो आयामी प्रेम के रिश्ते को फिर से जोड दिया है। मनुष्यों के ईश्वर के प्रति और मनुष्यों के मनुष्यों के प्रति प्रेम आपसी प्रेम को प्रभु येसु ने अपने क्रूस पर फिर से जोड दिया है।

इस संदर्भ में जब मैं आज की कोरोना वैश्विक महामारी को देखता हूँ तो पाता हूँ कि शैतान ने इस महामारी के द्वारा सीधे क्रूस पर और क्रूस के इस दो आयामी प्रेम के रिश्ते के ऊपर हमला किया है। इस महामारी ने इंसान को ईश्वर और उसके प्रेम से दूर करने का प्रयास किया है। जब से यह वाइरस फैला है करीबकरीब पूरी दुनिया में गिरजाघर बंद हो गये, मिस्सा नहीं, संस्कार नहीं। यह एक तरह से मनुष्यों के ईश्वर से संबध को कमज़ोर करने की एक चाल है। और मुझे लगता है शैतान काफी हद तक इसमें कामयाब होता नज़र रहा है क्योंकि कई स्थानों पर गिरजाघर खुल चुके हैं पर लोग अपने ईश्वर के पास लौटकर नहीं आये हैं। क्रूस का दूसरा आयाम है हमारे आपसी संबंध, आपसी रिश्ते, हमारा आपसी प्रेमउसको भी इस महामारी ने काफी हद तक प्रभावित किया है। सामाजिक दूरी रखने के चक्कर में हम व्यक्तिगत संबंधों और रिश्तों को भूलाने लगे हैं। हर किसी को आज संदेह की निगाह से देखा जाता है। अजनबी से ही नहीं हमें आज अपनों से ही डर लगता है कि कहीं उनके पास कोरोना वाइरस तो नहीं। अपने मित्रों की टोलियों में खेलने वाले बच्चे, स्कूलों और कोलेजों में विभिन्न जाती धर्म के होते हुए भी एक साथ बैठकर पढने वाले बच्चे अब अपनी चार दिवारी में ही सिमट गये हैं। उनको अपनों से बिलकुल अलग कर देने के लिए ऊपर से ओन लाइन क्लासेस। ओन लाइन क्लासेस के चलते हर बच्चे के हाथ में स्मार्ट फोन या लाप टोप है। अब उनकी जिंदगी इन गैजैटस तक ही सिमट गई है। हम नहीं जानते इस प्रकार की व्यस्था के साथ हमारे बच्चे कितने सुरक्षित हैं। हम ज़रा मंथन करें कि कहीं इन सब के पीछे शैतान की कोई चाल तो नहीं।

 

अगर hamko लगता है कि आज शैतान ने केवल कोरोना महामारी के द्वारा परन्तु अन्य तरीकों से भी इंसान को ईश्वर से और एक दूसरों के प्रति प्रेम से दूर किया है। खुद की जिंदगी में भी झाँककर देखने yadi hamko yxrk  है कि मेरा ईश्वर के प्रति प्रेम गहरा नहीं है और मैं अपने भाई बहनों को खुद के समान प्यार नहीं कर पाता हूँ तो aiye प्यारे भाई ओर बहनों हम येसु के क्रूस तले खुद की जिंदगी को एक बार फिर से लायें। पाप बुराई से दुषित, प्रेम रहित हमारे हृदयों को येसु के पवित्र लहू से धोने के लिए खोल दें। येसु के लहू से खुद को धोकर, गुनाहों के दागों को धोकर क्रूस के चिंन्ह से ईश्वर एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम के रिश्ते को हम एक बार फिर से कामय करें। क्योंकि यही हम मसीहियों की पहचान है, यही प्रेम हमें ईश्वर की संतान बनाता है जैसा कि संत योहन कहते हैं 1 योहन 4:7—8 — ''प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है। जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। आमेन।

 

Wednesday, 14 October 2020

29th Sunday in Ordinary Time Year A 18, Oct, 2020: #HindiReflectionbyFr.PreetamVasuniya


यशायाह 45: 1,4&6 
थेस. 1:1-5 
मत्ती 22:15 - 21 

आज का पहला पाठ बाबुल निर्वासन के उत्तरार्द्ध की एतिहासिक पुष्ठभूमि को हमारे सामने पेश करता है। हम जानते हैं कि अपनी निरंतर अवज्ञा व विद्रोह के चलते यहोवा ने अपनी प्रजा इस्राएल का परित्याग कर दिया था जिससे वे करीबन 70 सालों तक बाबुल निर्वासन में विदेशी राजाओं के अधीन गुलाम बनकर रहे। ये 70 साल उनके लिए आत्ममंथन का समय रहा। इन निर्वासन के सालों में कईयों ने ईश्वर के महान कार्यों के ऊपर मनन चिंतन किया जिसे उनके पूर्वजों ने अपनी आॅंखों से देखा था। वे अपनी वर्तमान परिस्तिथि को देखकर सवाल पूछते थे कि आखिरकार उनके साथ ऐसा क्यों हुआ। और वे अपने किये पर पश्चाताप करते हुए वापस अपने मुल्क लौट जाने को आतूर थे। नबियों और ​भजनकारों ने अपनी तत्कालीन रचनाओं में इसका मार्मिक वर्णन किया है जैसे कि हम भजन संहिता 79 में पढते हैं — ''प्रभु तू कब तक हम पर अप्रसन्न रहेगा? तर क्रोध कब तक हम पर अग्नि की तरह जलता रहेगा?. . .अपने नाम की महिमा के लिए हमारी सहायाता कर। अपने नाम की मर्यादा के लिए हमारा उद्धार कर, हमारे पाप क्षमा कर।

और भजन संहिता 80 में लिखा है — ''विश्वमंडल के प्रभु! हमारा उद्धार कर। हम पर दयादृष्टि कर और हम सुरक्षित रहेंगे। वचन 15 — विश्वमंडल के ईश्वर! वापस आने की कृपा कर, स्वर्ग से हम पर दयादृष्टि कर। आ कर उस दाखबारी की रक्षा कर, जिसे तेरे दाहिने हाथ ने रोपा है। 

इस पृष्ठभूमि में एक नाम उभरकर आता है, राजा साइरस या सिरूस का जिसे ईश्वर ने अपनी प्रजा को निर्वासन से छुडाकर पुन: अपने मुल्क अपने देश लौटाने के लिए एक माध्यम बनाया। 538 ईसा पूर्व फारस के राजा सिरूस ने बाबूल पर चढाई की, और बाबुल को पराजित किया तथा एक आदेश जारी कर इस्राएलियों को अपने मूल वतन लौट जाने की अनुमति प्रदान की। आज के पहले पाठ में नबी इसायाह इसी घटना का वर्णन करते हुए कहते हैं — ''प्रभु ने अपने अभिषिक्त सीरूस का दाहिना सॅंभाला है। उसने राष्टों को सीरूस के अधीन कर दिया और राजाओं के शस्त्र ले लिये।''

प्यारे साथियों जब इस्राएली प्रजा पर विपत्ति् आ पडी, तो उस संकट और विपत्ती के दिनों में उन्होंने आत्ममंथन किया। पश्चताप किया और प्रभु से प्रार्थना की। क्या हमने कोरोना संकट में आत्मा मंथन किया है? क्या हमने ये सवाल पूछा है कि आखिर 2020 में जो कुछ हुआ है उसके पीछे क्या वजह है। आज दुनिया के ऊपर जो बीत रही है आखिर ये दिन हमें क्यों देखने पड रहे हैं? क्या ये महज एक इत्फाक है या फिर कोई सबक? इस्राएली लोग बाबुल की नदियों के तट पर बैठ कर सियोन अपनी जन्मभूमि की याद में रोते थे जैसा कि स्तोत्र 137 में लिखा है — ''बाबुल की नदियों के तट पर बैठ कर हम सियोन की याद करते हुए रोते थे। आसपास खडे मजनूॅं के पेडों पर हमने अपनी वीणायें टॉंग दी थी।'' उनके मुख से आनन्द के स्वर गायब हो गये थे। उनके दिल से खुशियॉं नदारद हो गईं थीं। और हम क्या कर रहे हैं? हाथरस का दुषकर्म और गोंडा का आसिड अटैक तो महज एक सैम्पल है। हमारा देश और समाज और हमारे राजनेता घीनौने कामों लिप्त हैं। हर कोर्इ् आज अपने आप से पूछे कहीं मैं भी तो इनमें शामिल नहीं हूॅं? क्या मेरी कोरोना के पहले की जिंदगी और अब इस महासंकट का सामने करते हुए मेरी जिंदगी में कोई परिवर्तन आया है? क्या मैंने इस महासंकट से कुछ मूल्यों और जीवन के सिद्धॉंतों को पाया है? कोराना ने मुझे ईश्वर से वंचित किया है या फिर मैं इस दौरान ईश्वर के करीब आया हूॅं? मेरी आध्यात्मिकता बढी है या फिर कम हो गई है? मैं ईश्वर से दूर हो गया हूॅं या उनके करीब आ गया हूॅं या फिर मैं ईश्वर को लेकर उदासीन हो गया हूॅं याने मेरा धर्मोत्साह कम हो गया है? 

यहूदियों ने अपनी भूल मानी और ईश्वर के करीब आने की ठानी तो ईश्वर ने उन्हें तत्कालीन संकट से बचाया और अपनी पुरानी जमीन और अपना देश लौटा दिया। उनकी खुशियॉं लौटा दी, अनकी जिंदगी को एक बार फिर से पटरी पर ला दिया। 

प्रभु शीघ्र ही हमारी ज़िंदगी को भी पटरी पर वापस लाना चाहते हैं। पर शायद मनुष्य प्रभु की ओरे लौटना नहीं चाह रहा है।  क्या कैसर का है और क्या ईश्वर का है इसकी समझ हमें अभी तक नहीं आई है। आज के सुसमाचार में प्रभु कैसर याने तत्कालीन सम्राट को कर अदा करने के सवाल के संदर्भ में जवाब देते हुए कहते हैं कि जो कैसर याने संसार का है उसे संसार को दे दो और जो ईश्वर का है उसे ईश्वर को दे दो। इंसान ने बडी—बडी मंजिलें हासिल कर ली है। चॉंद और ग्रहों पर जाकर जिंदगी बसाने की योजनायें चल रहीं है पर उस अभी तक यह समझ नहीं आई है कि क्या ईश्वर का है और क्या संसार का है। इंसान सब कुछ को अपना मानता है। मैं, मरा, और मुझे के अहंकार में वह ईश्वर जो कि सब कुछ का दाता और विधाता है उसे ही भूल जाता है। हम भूल जाते हैं कि हमारी हर सफलता के पीछे, हर आविष्कार के पीछे, हर नई खोज के पीछे, हर तकनिकी और विज्ञान के पीछे ईश्वर की प्रज्ञा का हाथ है। हम सोचते हैं ये सब हमारा है, हमारी उपलब्धि है। कुछ महिनों बाद कोरोना वाइरस की वैक्सिन बाजार में आ जायेगी और इंसान इस बात का दम्भ भरेगा कि उसने इस महामारी पर विजय पाई है। अरे मिट्टी के पुतले यदि यह तेरी विजय है तो तू इसे तभी साबित कर देता जब यह महामारी शुरू हुई थी। जो ईश्वर का है उसे ईश्वर को दो। सवाल ईश्वर का क्या है? हमें ईश्वर को क्या देना है? जवाब है 2 ​इतिहास 29:11—13 — ''प्रभु! तुझे प्रताप, सामर्थ्य, महिमा, विजय और स्तुति! क्योंकि जो कुछ स्वर्ग में और पृथ्वी पर है, वह तेरा है। प्रभु! राज्याधिकार तेरा है। तू सब शासकों में महान् है। धन और सम्मान तुझ से मिलता है। तू समस्त सृष्टि का शासन करता है। तेरे हाथ में सामर्थ्य और बल है। तू लोगों को महान् और शक्तिशाली बनाता है। हमारे ईश्वर! इसलिए हम तुझे धन्वाद देते हैं और  —तेरे महिमामय नाम की स्तुति करते हैं।'' 

जि हॉं ईश्वर की ये चीजें है हमें ईश्वर को ये देना है — प्रताप, सामर्र्थ्य, विजय और ​स्तुति। 

प्रकाशना ग्रंथ 5:12—13 — वे याने स्वर्गदूत ऊँचे स्वर से कह रहे थे, "बलि चढ़ाया हुआ मेमना सामर्थ्य, वैभव, प्रज्ञा, शक्ति, सम्मान, महिमा तथा स्तुति का अधिकारी है"। तब मैंने समस्त सृष्टि को- आकाश और पृथ्वी के, पृथ्वी के नीचे और समुद्र के अन्दर के प्रत्येक जीव को- यह कहते सुना, "सिंहासन पर विराजमान को तथा मेमने को युगानुयुग स्तुति, सम्मान, महिमा तथा सामर्थ्य!"

आज के पहले पाठ में प्रभु कहते हैं — ''मैं ही प्रभु हूॅं मेरे सिवा कोई दूसरा कोई नहीं।'' 

और संत पौलुस फिलिपियों 2:9 में कहता है — इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान् बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है, जिससे येसु येसु का नाम सुन कर आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के सब निवासी घुटने टेकें और पिता की महिमा के लिए सब लोग यह स्वीकार करें कि येसु मसीह प्रभु हैं।

अंतिम दिनों में ये आवश्यक है कि हर घुटना उनके सामने झुके और हर ज़बान यह कबूल करे कि येसु ही प्रभु है। 


28th Sunday in Ordinary Time Year A October 11, 2020 #ReflectionbyFr.Preetam

 इसायाह 25ः6-10

मत्ती 22रू1.14

कोरोना के कारण भीड इक्टठा होने पर पाबम्दी लगी हुई है अन्यथा शादी-पार्टी और क्लबों में जाकर खाना-पीना और मौज मस्ती करना आज की पीढी की फैषन बन गई है। 

व्यक्ति चाहे अमीर होे या गरीब, चाहे वो किसी भी जाती या मुल्क और मज़हब का हो दूसरों को भोजन पर बुलाने का प्रचलन सब लोगों में होता है। हम भी कई बार विभिन्न अवसरों पर अपने अजीज मित्रों और संबंधियों को भोजन हेतु बुलाते हैं या फिर भोजन हेतु दूसरों के निमंत्रण पर उनके यहाॅं जाते हैं। 

आज के वचनों के माध्यम से प्रभु सारी मानवजाती को एक बहुत बडी दावत का निमंत्रण दे रहे हैं। 

नबी इसायाह के ग्रंथ 25ः6-7 में वचन कहता है -  विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7द्ध वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगाए


नबी कहते हैं कि प्रभु अपने पर्वत पर एक भोज प्रबंध करेगा जिसमें सभी राष्ट्रों के लोग आमंत्रित किये जायेंगे। 

और सुसमाचार में हम विवाह भोज का दृष्टांत सुनते हैं जिसमें राजा ने एक भोज का आयोेजन किया। जब वह आमंत्रित लोगों को बुलाने अपने सेवकों को भेजता है तो वे आने से इनकार कर देते हैं। वे सब अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे उन्हें राजा के निमंत्रण की कोई परवाह नहीं थी। 

विवाह भोज के दृष्टांत में निमंत्रण देने वाला राजा स्वयं ईष्वर है। और विवाह का भोज पवित्र यूखरिस्त जिसे जब तक हम इस दुनिया में हैं हम इसमें भाग लेते और मेमने का माॅंस और रक्त खाते और पीते हैं तथा इस दुनिया से विदा लेने के बाद स्वर्ग में सदा के लिए जिसे हम ग्रहण करने वाले हैं।  यही वह भोजन है जिसे देने की बात प्रभु ने आज के सुसमाचार में की है। 

प्रभु जिस भोज में शामिल होने के लिए हमें बुला रहे हैं वो भोज है वह है अनन्त जीवन का भोज। स्वर्गिक भोज। 

प्रभु ने इस महाभोज में भागिदार होने का सबसे पहला निमंत्रण इस्राएलियों को दिया, पर उन्होंने इस निमंत्रण को ठुकरा दिया। लेकिन प्रभु की भोजषाला में बहुत ही जगह बाकी है, वहां के स्वर्गिक भाोजन की कमी भी नहीं है। प्रभु की अपनी चुनी हुई प्रजा ने जब इस निमंत्रण को ठुकरा दिया तो प्रभु ने सब जातियों और राष्ट्रों को इसका निमंत्रण भेजा है। हम सब को स्वर्ग का यह निमंत्रण दिया गया है। प्रभु ने बिना हमारी परिस्थियों को देखे हमें इस भोज के हकदार बनाया है। हमें स्वर्गराज्य के महाभोज में शामिल होने इसलिए नहीं बुलाये गये कि हम इसके काबिल या लायक हैं। दृष्टांत में राजा ने जब निमंत्रित लोगों ने आने से मना कर दिया तो बाद में  भले-बूरे सबों को,  जो कि वास्तव मेें समाज द्वारा परित्यत, नालायक, और अयोग्य माने जाते हैं उन्हें एक ऐसे महाभोज के लिए बुलाया जाता है जो कि अपने आप में बहुत खास है। 

जि हाॅं प्यारे विष्वासियों, प्रभु के राज्य में अमीर, गरीब, बडे-छोटे, धर्मी-पापी सब बुलाये गये हैं। आप जो भी हो, आपकी पस्थिति जो भी हो, आप जिस भी अवस्था में जी रहे हो प्रभु उन सब को नज़रअंदाज करके आपको अपने राज्य में शामिल होने बुला रहे हैं। आप पापी हैं, गरीब हैं, समाज में बदनाम हैं, जाती की बिरादरी में छोटे हैं, बुद्धी से कमजोर हैं, या अनपढ हैं, प्रभु इन सब बातों को नज़रअंदाज करते हुए आपको निमंत्रण दे रहे हैं अपने स्वर्गिक भोज में सम्मिलित होने के लिए। यह मुक्ति का भोज है अनन्त जीवन का भोज है। हमारे मृत्यपरांत स्वर्ग में हमेषा के लिए मिलना वाला भोज है। यह वह भोज हैं जिसमें संत और दूत भागिदार होते हैं।  

इतने महान भोज का निमंत्रण हम जैसे नाकाबिल़ इंसानों को मिला है। इस निमंत्रण के प्रति हमारा रवैया क्या है? क्या हमने इस निमंत्रण को गंभिरता से लिया है? या फिर हम उन लोगों की तरह इसका नज़रअंदाज कर रहे हैं जो अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और राजा के निमंत्रण को ठुकरा रहे थे। कहीं हम भी दुनिया के कामों में  इतने व्यस्त तो नहीं हैं कि हम ईष्वर के निमंत्रण को ठुकरा रहे हैं? इस बात पर आज हम गंभिरता से चिंतन करें। क्या हमारी निगाहें स्वर्ग की ओर लगी हुई हैं? क्या हम स्वर्ग राज्य के भोज में सम्मिलित होने के लिए तरस रहे हैं। या फिर हमें इस बात को लेकर कोई फिक्र अथवा रूची नहीं। 

दो सप्ताह पहले के रविवारीय चिंतन में हमने संत मत्ती 21ः31 में पढा था जहाॅं प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘ मैं तुम लोगांे से कहता हूॅं नाकेदार और वैष्याएॅं तुम लोगों से पहले ईष्वर के राज्य में प्रवेष करेंगे।’’ यदि हमें रूची नहीं है, यदि हम स्वर्ग राज्य की ख्वाहिष नहीं रखते, तो बहुत सारे और लोग भी हैं, जिन्हें हो सकता है हम अयोग्य, पापी व तिरस्कृत मानते होंगे पर शायद वे हम से पहले स्वर्ग राज्य के भोज में शामिल हो जायेंगे।

दूसरी बात हमें ऐसे महान और अनन्त भोज में, ऐसी आनन्दमय दावत में जाने के लिए निमंत्रण तो मिला है पर इसके योग्य बने बिना, यदि हम वहाॅं जायेंगे तो हमें वहाॅं प्रवेष नहीं मिलेगा। हम पापी हैं फिर भी हमें स्वर्ग राज्य का निमंत्रण मिला है इसका मतलब यह नहीं कि हमें स्वर्ग राज्य में जाने का लाइसेंस मिल गया है। हम जैसे हैं उसी अवस्था में यदि हम वहाॅं जाने की जुर्रत करेंगेे तो हमें उठाकर अनंत अंधकार में याने नर्क में फैंक दिया जायेगा, जैसा कि उस व्यक्ति को फैंक दिया गया जो बिना विवाहोत्सव के वस्त्र पहने प्रवेष करने की कोषिष कर रहा था। 

प्यारे श्रोताओं, मैं और आप वास्तव में इस योग्य नहीं हैं कि हम अपने बलबूते स्वर्गराज्य के भोज के हकदार कहलायंे। क्योंकि हम जानते हैं कि हम तो पापी हैं, हम अयोग्य हैं पर ईष्वर ने अपनी अपार उदारता और दयालुता के कारण हम पर बडी कृपा की है। प्रभु चाहते हैं कि हम सब उनके स्वर्गिक भोज के हिस्सेदार बनें। पर उसके लिए हमें अपनी वर्तमान परिस्थिति से बाहर आना होगा। पापमय वस्त्रों को उतारना होगा और स्वर्गराज्य के योग्य नये धार्मिकता के वस्त्र धारण करना होगा।

संत योहन प्रकाषना ग्रंथ 7ः14 में एक दिव्य दृष्य में उन लोगों को देखते हैं जो अंत में स्वर्गिम मेेमने याने प्रभु येसु के विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिए जाते हैं उनका वर्णन स्वगदूत इन शब्दों में करते हैं - ‘‘ये वे लोग हैं जो महासंकट से निकल कर आये हैं , इन्होंने मेमने के रक्त में अपने वस्त्र धो कर उजले कर लिये हैं।’’ 

जि हाॅं दोस्तों स्वर्ग में प्रवेष के लिए बुलाये गये तो सब लोग हैं पर प्रवेष उन्हें ही मिलेगा जिनके वस्त्र मेमने याने प्रभु येसु क रक्त से धुले हुए हैं। आज के सुसमाचार के अंत में प्रभु येसु कहते हैं बुलाये गये तो बहुत हैं पर चुने हुए थोडे ही हैं। प्यारे साथियों हमारी पूरी कोषिष चुने हुए लोगों में गिने जाने की होनी चाहिए न कि सिर्फ बुलाये गये। 


Saturday, 3 October 2020

27th Sunday in Ordinary Time, (A) Hindi Reflection by Fr. Preetam Indore

 


⇑ To watch the reflection please click at the Video above.  

इसायाह 5 : 1-7 

फिलि 4:6-9 

मत्ती 21:३३-43 

क्या आपने कभी पेड लगाया है अथवा फसल बोई है? कोई भी बेवजह और बिना उम्मीद के न तो पेड लगाता है और न ही फसल बोता है। हर माली और हर किसान अपने पेडों और फसलों से अच्छे फल अथवा उत्पादन की उम्मीद करते हैं। और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वे बहुत सारे जतन करते हैं। सबसे पहले खेत को जोता जाता है, हल चलाया जाता है, मिट्टी को नरम किया जाता है, लेवल किया जाता है, फिर बीच बोया जाता है, अधिक फसल आने के लिए खाद डाला जाता है, पौधे की अच्छी बढोतरी के लिए खरपतवार अर्थात अनावश्यक  जंगली घास को उखाडने के लिए निंदाई-गुडाई की जाती है, डोरा, बखर आदि चलाया जाता है। कोई बाहरी तत्व जैसे जंगली जानवर अथवा गाय ढोर अंदर घुसकर नुकसान न पहुंचाए इसलिए चारों ओर घेरा अर्थात् बाडा या बागड बनाई जाती है। चडियों के नुकसान से बचाने के लिए काक-भगौडा बनाया जाता है। किडे मकोडों के नुकसान से बचाने के लिए कीटनाशक  दवाई क छिडकाव किया जाता है। याने अच्छी पैदावार पाने के लिए किसान बहुत ही मेहनत करता है। और इतना सब करने के बाद भी यदि उसे अच्छी फसल नहीं मिलती तो वह बहुत ही निराश  हो जाता है; वह अंदर ही अंदर टूट जाता है। कभी-कभी यह हताश  उसे आत्महत्या तक करने को मजबूर कर देती है। इस घोर निराशा  के पीछे क्या कारण है? कारण ये है कि खेत तैयार करने से लेकर फसल काटने तक किसान पग-पग पर वह कई सपने संजोता है। वह अपनी फसल को लेकर कई सारी सुखद कल्पनायें करता है। कई सारे जोड-घटाव, गुणा भाग करता है कि जब फसल बडी होगी तो उसको अच्छी पैदावार प्राप्त होगी। जब वह अपनी उगती हुई फसल, बढ़ते हुए पौधों और लहलहाते फसल को देखता है तो उसके चेहरे पर एक प्रसन्नता की लकीर उभर जाती है, और उम्मीदों का सैलाब उसके अंदर हिलोरें मारता है कि यह फसल उसको भरपूर अन्न देने जा रही है। और इन सब के बाद यदि वह अपेक्षित फल नहीं पाता तो उसका घोर निराषा में डूब जाना स्वाभाविक है। 

प्यारे विश्वासियों  आज के वचन में प्रभु खुद को एक माली के रूप में पेष करते हुए अपने मन की बात हमारे सामने रखते हैं, वो बात यह हैं कि एक माली होकर उन्होंने अपनी प्रजा को रोपा है। अच्छी फसल की उम्मीद में एक माली जो कुछ भी अपनी फसल के लिए करता है, प्रभु ने हमारे लिए किया। प्रभु ने अपनी तरफ से कोई भी कसर नहीं छोडी और उन्होंने यह उम्मीद लगाई कि हम अच्छे फल उत्पन्न करेंगे। प्रभु ने हमें यह मानव जीवन दिया, हमें ख््राीस्तीय विश्वास दिया, अपने वचन का बीज बोया, संस्कारों द्वारा उसे पोषित कियाः पाप स्वीकार के द्वारा पाप रूपी खरपतवार की सफाई की, पवित्र युखरीस्त के द्वारा आत्मा की उर्वरकता बढाई, दृढीकरण संस्कार के द्वारा हमें आत्मा द्वारा मज़बूती प्रदान की, प्रार्थनाओं, और संतों की मध्यस्थता, माता मरियम की प्रार्थनायें, द्वारा जो कुछ भी कमी घटी रही उसे पूरा किया, पुरोहितों और धर्मबहनों व अन्य प्रभु के दास दासियों की सेवकाई द्वारा समय-समय आत्मा की सिंचाई निंदाई और गुढाई की, इस प्रकार के अनेकों अनेक प्रयास ईश्वर ने हमारे लिए किये। अब हम खुद से पूछें क्या हमने अच्छे फल उत्पन्न किये? क्या मेरा मसीही जीवन ईश्वर की इच्छा के अनुरूप फल ला रहा है? जैसी ईश्वर  मेरा माली मुझसे उम्मीद रखता है, क्या मैं पौधा वैसा फल ला रहा हूँ? हमारे ख््राीस्तीय जीवन में अच्छे फल क्या है? 

पवित्र वचन कहता है मसीहियों के फल हैं आत्मा के फल जिनका वर्णन हम गलातियों 5ः22 में पाते हैं वे हैं - प्रेम, आनन्द, शान्ति,सहनशीलता, मिलनसारी, दयालुता, ईमानदारी, सौम्यता, और संयम। यहाँ पर एक गौर करने लायक बात यह है कि संत पौलुस यहां पर करीब नौ फलों का वर्णन करते हैं परन्तु वे बहुवचन की जगह एक वचन का उपयोग करते हैं। वे कहते हैं किंतु आत्मा का फल है - प्रेम और उसके बाद वे बाकी फलों का वर्णन करते हैं। मेरे मनन-चिंतन में मैंने पाया कि वास्तव में हमारे अंदर बस यह एक फल होना है काफी है। यदि हममें सच्चा प्रेम है तो बाकि सब अच्छे फल, सब अच्छाईयाँ खुद ब खुद हममें आ जायेगी। 

संत पौलुस 1 कुरिंथियों 13 में हमें सच्चे प्रेम की परिभाषा बताते हुए कहते हैं - कि प्रेम सहनशीलता और दयालु है। याने यदि मुझमें सच्चे प्रेम का फल मौजुद है, तो मैं एक सहनशील और दयालु इंसान होउंगा। मैं दूसरों के प्रति दया दिखाऊँगा, और सारे अपमान, निंदा, अत्याचार को येसु मसीह जैसे सह लूंगा।

वे आगे कहते हैं - प्रेम न तो ईर्ष्या  है न डींग मारता न घमंड करता है। याने यदि मुझमें सच्चे प्रेम का फल है तो मैं न तो ईर्ष्या करूँगा, न डिंग मारूँगा और न ही घमंड करूँगा

 प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। यदि मुझमें सच्चे प्रेम का फल होगा तो मैं खुद का स्वार्थ नहीं खोजूंगा, मैं दूसरों के हित का पहले सोचुंगा, मैं दूसरों की भलाई खोजूंगा, और ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा जो अशोभनीय है जो एक ख््राीस्तीय को शोभा नहीं देता- न अशोभनीय बातें, न काम और न ही विचार। पे्रम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है। यदि मुझमें प्रेम का फल होगा तो मैं न झुंझलाउंगा और न ही दूसरों की बुराई का लेखा लूंगा। मैं संयम के साथ दूसरों से पेश आऊँगा और दूसरों की बुराईयों को माफ करूंगा उसका लेखा नहीं रखूंगा। सच्चा प्रेम दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। वह सब - कुछ ढाँक देता है, सब कुछ पर विश्वास करता है, सब कुछ की आशा करता और सब कुछ सह लेता है। 

क्या मुझमें है ऐसा प्रेम रूपी फल? मुझे एक सुंदर भजन याद आ रहा है - प्रेम की बारी में रोपे गये हम, प्रेम की बारी में......जि हाँ प्यारे अजिजों, हम प्रेम की बारी में रोपे गये हैं, हम पे्रम के बगीचे में लगाये गये हैं। हमें लगाने वाला ईष्वर न केवल प्रेम का स्रोत है पर वह खुद प्रेम है। संत योहन 4ः16 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘ईष्वर प्रेम है।’’ उस ईष्वर ने, जो कि प्रेम है हमें अपने ही स्वरूप में गढा है। उत्पत्ति ग्रंथ 1ः27 में हम पढते हैं - ईष्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया, उसने उसे  ईश्वर का प्रतिरूप बनाया।’’ ईश्वर ने जो कि स्वयं प्रेम है हमें अपने स्वरूप में बनाया याने हम भी प्रेम हैं। ईष्वर ने अपनी प्रजा रूपी जो दाखबारी लगाई है वह प्रेम की दाखबारी है। विष्वासियों की दाखलताओं से प्रेम का फल उत्पन्न होना चाहिए। प्रभु ने जब हमको अपनी दाखबारी में रोपा तब उनके मन में यही खयाल था कि हम बढकर प्रेम का फल लाने वाले बनें। उन्होंने हम पर बहुत बडी उम्मीद रख छोडी है। संत योहन 13ः34 में प्रभु येसु कहते हैं ‘‘ मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ - तुम एक दूसरे को प्यार करो। जिस प्रकार मैं ने तुम्हें प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। प्रभु कहते हैं ‘प्रेम’ एक मसीही की पहचान बननी चाहिए। हमारे प्रेम से लोगों को यह पता चले कि हम येसु के चेले हैं। ’’संत मत्ती 7ः18 में प्रभु येसु कहते हैं - ‘‘अच्छा पेड, अच्छे फल देता है और बुरा पेड बुरे फल देता है।’’ हम येसु के द्वारा लगाई गई दाख की लता हैं। पर जब वे फल खोजने आते तो क्या पाते हैं खट्टे अंगूर। ईर्ष्या ,द्वेष , जलन, वासना, व्यभिचार,अशुद्धता, लम्पटता, मूर्तिपूजा, जादू-टोना, बैर, फूट, क्रोध, नशा की आदत, स्वार्थ, मनमुटाव, दलबंदी, रंगरलियाँ और इस प्रकार की बातें। आज के वचन में प्रभु कहते हैं - ‘‘ कौन बात ऐसी थी जो मै ने अपनी दाखबारी के लिए कर सकता थ और जिसे मैंने नहीं किया? मुझे अच्छी फसल की आषा थी, किंतु उसने खट्टे अंगूर पैदा किये’’ प्रभु की दाखबारी ने खट्टे अंगूर पैदा किये। वचन आगे कहता है - विश्वमंडल के प्रभु की यह दाखबारी इस्राएल का घराना है और इसके प्रिय पौधे यूदा की प्रजा हैं। नये विधान में हम सब विश्वासी वह दाखबारी व ईश्वर द्वारा रोपे गये पौधे हैं। वचन कहता है - प्रभु को न्याय की आशा था और भ्रष्टाचार दिखाई दिया। उसे धार्मिकता की आशा थी और अधर्म के कारण हाहाकार सुनाई दिया। प्रभु के लोगों ने बुराईयाँ उत्पन्न की। इसलिए प्रभु कहते हैं अब मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपनी दाखबारी का क्या करूँगा।  मैं उसका बाडा हटाऊँगा और पषु उसमें चरने आयेंगे। । प्रभु अपने लोगों के चारों ओर लगा सुरक्षा का बाडा हटायेगा और विनाषकारी ताकतें अंदर घुस आयेंगी। बादलों को आदेश दूंगा कि वे पानी नहीं बरसाये। प्रभु अपनी आशीष  व अनुग्रह के भंडार बंद कर देगा। यदि आज हम अपने जीवन में असुरक्षा का अनुभव कर रहे हैं; हमें ऐसा लग रहा है कि हमारे चारों ओर लगा ईश्वर का सुरक्षा का घेरा हटा लिया गया है। यदि हमारे जीवन में हम आशीष व अनुग्रह की बारिष का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं, यदि हमारे अंदर डर है,अनिश्चितताओं के बादल हमारे ऊपर मंडरा रहे हों तो ये जान लें कि हमने प्रेम का फल नहीं पैदा किया। जिस फल की ईष्वर को उम्मीद थी वह उन्हें नहीं मिला। क्योंकि जहाँ, जिस दिल में येसु का प्रेम प्रवाहित होता है वहाँ कोई भी किसी भी प्रकार का डर नहीं सकता।  1 योहन 4ः28 में प्रभु का वचन कहता है - ‘‘प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है, क्योंकि भय में दंड की आषंका रहती है, और जो डरता है, उसका प्रेम पूर्णता तक नहीं पहुँचा है।’’ 

आईये हम खुद को  ईश्वर की प्रिय दाखलता साबित करें। हम अपेक्षित फल पैदा करें। हमारा जीवन ईश्वरीय प्रेम तथा अन्य सदगुणों से भरपूर हो और हम उस ईश्वरीय प्रेम क्षमा और करूणा को बाँटने वाले बनें। आमेन।