Thursday, 17 September 2020

25 वां रविवार Year (A) 20 September, 2020



इसायाह 55: 6-9 

मत्ती 20:24-27 

दाखखबारी में मज़दूरों को काम देने वाले मालिक
के दृष्टांत में हम देखते हैं कि वह करीबन शाम के समय काम पर लगे लोगों के प्रति उदारता दिखता है और उन्हें भी उन लोगों के बराबर ही  मज़दूरी देता है जो सुबह से काम कर रहे  थे।  इस पर जो पहले आये थे वे इसपर आपत्ति उठाते हैं।  उन्हें मालिक की उदारता अन्यायपूर्ण लगती हैं। 

यह दृष्टांत मुझे ऊडाऊ पुत्र के दृष्टांत की याद दिलाता है, जहाँ पर पिता अपने छोटे वाले बेटे के प्रति बड़ी दया उदारता दिखता है।  तब बड़े बेटे को इस पर आपत्ति होती है।  इन दृष्टांतों में पहले आये मज़दूर और बड़ा बेटा दोनों धर्मी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और बाद में आये मज़दूर तथा छोटा बेटा पापियों का। दोनों ही दृष्टांतो में पापियों के प्रति मालिक या पिताजी बहुत ही उदारता दिखाते हैं।  ऐसी उदारता जिसके वे वास्तव में हकदार नहीं हैं।  उन्हें जो मिलना चाहिए था उससे अधिक उन्हें दिया जाता है।  उड़ाऊ बेटा यह सोचकर वापस जाता है कि उसका पिता उसे एक नौकर की तरह रख लें। पर पिता ने उसे अपना पुत्रत्व लौटाया, उसका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया जिसकी उसने उम्मीद ही नहीं की थी। और वे मज़दूर शाम तक चौक पर इसलिए नहीं खड़े थे कि कोई उन्हें पूरी मज़दूरी देकर काम पर लगाए।  पर उन्हें भी उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा ही वेतन मिल जाता है।

और दोनों ही दृष्टांतों में पहला बेटा और पहले आये मज़दूर जो कि धर्मियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, स्वामी की उदारता पर जलते हैं।  वे लोग  लोग ईश्वर से उनके सत्कर्मों के लिए पापियों से बड़े ईनाम की मांग करते हैं। उन्हें पापियों के प्रति ईश्वर की उदारता रास नहीं आयी।  ऐसा ही एक वाकया हम नबी योना के ग्रन्थ 4:1-2 में पढ़ते हैं, ईश्वर द्वारा निनिवे के लोगों को माफ़ करने पर योना ईश्वर पर क्रुद्ध हो जाता है।  इन सब किस्सों में हम देखते हैं कि धर्मी लोगों को पापियों का सुधार हज़म नहीं होता।   

आइये हम विचार करें - क्या ये आज की कलीसिया में नहीं देखा जाता ? क्या पुराने ख्रीस्तीय नए विश्वासियों की उन्नति व उनके जीवन में ईश्वर की आशीष व अनुग्रह की वृद्धि को हजम कर पाते हैं?  वे लोग जो  खुद को धार्मिक मानते हैं, नियमित चर्च जाते हैं, अपने घरों में भी प्रार्थना करते हैं, उनका नज़रिया उन लोगों के प्रति कैसा रहता है, जिनका अतीत पापमय रहा हो और वे  धार्मिकता से दूर रहे हों; क्या वे ईश्वर की निगाह में खुद को उन लोगों की ही बराबरी में देखना पसंद करेंगे ?

क्या हम भी उन मज़दूरों वाली मानसिकता रखते हैं, जिह्नोने दिनभर काम किया और अंत में आने वाले मज़दूरों से  से अधिक वेतन पाने की उम्मीद करते हैं?  क्या मैं यह सोचता हूँ की मेरे धार्मिकता अधिक है, इसलिए मुझे ज़्यादा अनुग्रह मिलना चाहिए, तथा जब मैं देखता हूँ कि मुझसे कम धार्मिक कोई व्यक्ति ज्यादा आशीष पाता है तो मेरे मन में क्या भाव आते हैं ? क्या मैं सोचता हूँ मेरे साथ सही नहीं हो रहा है। मैं जिसका हकदार था ओह मुझे नहीं मिला, मेरे काम के अनुसार मुझे थोड़ा ज़्यादा मिलना चाहिए था आदि ।  

प्यारे विश्वासियों, यदि ईश्वर हमारे साथ न्याय  करने लगे और हमें वही दे जिसके हम वास्तव में हक़दार हैं अथवा हम जिसके लायक हैं तो बताओ हमें क्या मिलना चाहिए ? 

गिन लो अपने सारे कामों को जो आपने बचपन  आज तक आपने किये, लगा लो हिसाब हर उस बात का जो आपके मुख से निकली, जोड़ लो हिसाब उन  विचारों का जो आपके मन में अब तक आये, और फिर बताना  कि आप कितने बड़े पुरस्कार के हकदार हो ? आपकी ज़िन्दगी भर के हर बात - काम का क्या वेतन आपको क्या मिलना चाहिए ? हम पूछें खुद से - यदि मेरे कार्यों के अनुसार प्रभु दे तो मैं किस पुरस्कार का हकदार हूँ! 

अगर ईश्वर हमारे माप दंड से न्याय करने लगे, यदि वो हम मनुष्यों की तरह न्याय करे तो ज़रा विचार कीजिये आपका  और मेरा क्या होगा ? यदि हमने पाप किया है तो वचन कहता है रोमियों 6:23 में कि पाप का वेतन तो मृत्यु है !!!

यहाँ पर हम ईश्वर के राज्य के मापदंड और दुनिया के मापदंड के बीच एक सपष्ट अंतर पाते हैं।दुनिया की धारणा यह है कि केवल धर्मी ही  ईश्वर के प्यार के हकदार हैं, पर बाइबिल का ईश्वर यह स्पष्ट करता है कि उनकी रूचि पापियों में अधिक है।   वे कहते हैं - "मैं धर्मियों को नहींपापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ।"  (लूकस 5:32) 

जैसा हम सोचते हैं ईश्वर नहीं सोचता। आज के पहले पाठ में जिसे हमने नबी इसायाह 55 से लिया है प्रभु कहते हैं - "तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।"

उसके न्याय का तरीका बिलकुल अलग है।  उसका न्याय दया व करुणा से भरा हुआ है। उसके न्यायालय में दया की जाती है दंड नहीं दिया जाता। वो मरने और नष्ट करने में नहीं पर बचने में ज़्यादा रूचि रखता है।  संत योहन 3:17 में वचन कहता है - "ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार में इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।" 

हम पर इतनी दया और करुणा दिखने वाला ईश्वर हमारी ज़िन्दगी की शाम होने तक हमारे लौटने का इंतज़ार करता है, जैसे वह स्वामी शाम के समय तक मज़दूरों का इंतज़ार करता है, और हम सब को वही पुरस्कार देने को तैयार है जिसे उन्होंने सब संतगणों को दिया है। हम बिना वक्तगंवाए हमारे जीवन की शाम ढलने के पहले   हमारे प्रभु के पास लौट आएं और उनकी उदारता से मुक्ति का उपहार प्राप्त करें क्योंकि ज़िन्दगी की रात ढलने के बाद पश्चाताप का मौका नहीं मिलने वाला। 








Thursday, 10 September 2020

वर्ष का 24 वां इतवार १३ सितंबर 2020 हिंदी प्रवचन

१३ सितंबर 

प्रवक्ता 27:33—28:29
रामियों 14:7—9
मत्ती 18:21—35
आज के वचन के द्वारा प्रभु हमें क्षमा का पाठ पढाते हैं। पहले पाठ में जो कि प्रवक्तता ग्रंथ से लिया गया है प्रभु का वचन कहता है — ''अपने पडोसी का अपराध क्षमा कर दो और प्रार्थना करने पर तुम्हारे पाप क्षमा किये जायेंगे। यदि कोई अपने मन में दूसरों पर क्रोध बनाये रखता है, तो वह प्रभु से क्षमा की आशा कैसे कर सकता है? (प्रवक्ता ग्रंथ (28:2—3)

 आज के सुसमाचार में येसु ने एक निर्दय सेवक के  बारे में बताया जो अपने स्वामी से क्षमा का उपहार प्राप्त करता तो है, लेकिन वह अपने सह- सेवक को  क्षमा करने से इंकार कर देता है। यह दृष्टान्त जहाँ एक ओर ईश्वर की क्षमाशीलता को दर्शाता है, वहीँ हमें अपने अपराधियों को क्षमा करने के लिए आह्वान करता  है। 

पाप मानव जीवन की एक कडवी सच्चाई है। रोमियों 3:23 में प्रभु का वचन कहता है — ''क्योंकि सबों ने पाप किया और सब ईश्वर की महिमा से वंचित किये गये।'' तथा 1 योहन 1:8 में वचन कहता है — '' यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं, तो हम अपने आप को धोखा देते हैं और हम में सत्य नहीं है।'' 
तो इस बात को कोई झुठला नहीं सकता कि पाप करना, गुनाह करना इंसान की एक बडी कमज़ोरी है। दुनिया के करीब—करीब सभी धर्म पाप व बुराई के अस्तित्व को मानते हैं और यह भी मानते हैं कि पाप करना गलत बात है और पाप जो हैं वो हमें हमारी मुक्ति से वंचित करता  है। याने पाप के रहते कोई भी अनन्त जीवन हासिल नहीं कर सकता। रामियों 6:23 में वचन कहता है — क्योंकि पाप का वेतन मृत्यु है। इसलिए अधि​कतर ध्रर्मों में पापों से छुटकारा पाने के अलग—अगल तरीके सुझाये गये हैं — कोई यज्ञ करके, कोई तीर्थ यात्रा करके, तो कोई पवित्र नदियों में स्नान करके अपने पाप के दाग धोने के प्रयत्न करते हैं। 
हमें हमारे पापों के लिए न कोई यज्ञ चढाने की ज़रूरत है और न किसी नदी में डूबकी लगाने की। क्योंकि वचन कहता है रोमियों 3:24 में — ''ईश्वर की कृपा से हमें मुफ्त में पापमुक्ति का वरदान मिला है।'' हमारे प्रभु येसु ने हम सब के पापों की कीमत क्रूस पर मरकर चुका दी है। ईश्वर की हम मनुष्यों को लेकर यही इच्छा है कि हम सब पाप मुक्त रहें। संत पौलुस रोमियों को लिखे पत्र 3:25 में कहते हैं — ''ईश्वर ने चाहा कि येसु अपना रक्त बहाकर पाप का प्रायश्चित करे और हम विश्वास द्वारा उसका फल प्राप्त करें।'' पाप से मुक्ति व धार्मिक बनने का और आसान रास्ता क्या हो सकता है? येसु में विश्वास करिये, अपने गुनाहों का बोझ उन्हें दीजिए, सच्चे मन व दिल से पश्चाताप कीजिए और गुनाह की राहों को छोडकर येसु का अनुसरण कीजिए।
प्यारे साथियों इसमें कोई शक नहीं की येसु हमारे सभी पापों को क्षमा करते हैं। परन्तु क्षमा पाने वाले हर एक व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह भी अपने अपराधियों को क्षमा करे। 
हमारे जीवन में हम देखते हैं कि जब हमारी बारी आती है, तो हम औरों से हमारी बड़ी से बड़ी गलती की भी क्षमा की उम्मीद करते हैं पर जब दूसरों को क्षमा देने की बात आती है तो फिर हमें, वहाँ पर न्याय चाहिए होता है। यही माविय प्रवृति है। 
आज के सुसमाचार में वह स्वामी अपने सेवक का लाखों का कर्जा माफ कर देता है। पर वह निर्दय सेवक जब अपने सहसेवक से मिलता है जो महज सौ दिनार का कर्ज़दार था उसे माफ नहीं करता है। यह दृष्टांत हमें ईश्वर की हमारे प्रति उदार दयालुता की ओर ईशारा करता हुआ हमें यह संदेश देता है कि ईश्वर ने हमारे जीवन में अब तक वाकय हमारे लाखों गुनाहों को माफ कर दिया है। हम जब कभी उनके पास एक पश्चातापी हदय लेकर जाते हैं वचन कहता है मिका 7:18 में — ''वह फिर हम पर दया करेगा, हमारे अपराध पैरों तले रौंदेगा और हमारे सभी पाप गहरे समुद्र मे फैंकेगा।'' वाकय कितना महान है हमारा ईश्वर... यदि वह हमारे असंख्य पापों के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करता तो आज कौन जीवित रहता। यदि वह हर-एक गुनाह के अनुसार हमारे साथ बर्ताव करता तो बताओ कौन उनके सामने टिक सकता जैसा के भजन संहिंता 130:3 में हम पढ़ते है -  "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?" 
लेकिन इस दृष्टांत में हमने यह भी देखा है कि जब वह सेवक अपने सह सेवक को माफ नहीं करता है तो जो दया उस पर दिखाई गई थी वो वापस उठा ली गई और जो दंड उसे मिलने वाला था जो माफ किया जा चुका था रिवर्स होकर वापस उस पर पडता है। ईश्वर की क्षमा पाने के लिए हमें औरों को माफ करने की अति आवश्चक्ता है। संत मत्त्ती 6:14 में प्रभु येसु स्पष्ट कहते हैं — ''यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। परन्तु यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा नहीं करोगे तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा नहीं करेगा।''
हम आज अपने आप से पूछें—जिस तरह से ईश्वर हमारे साथ बर्ताव करता है, हम कितना दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर पाते  हैं।  हम तो हमारी स्वार्थी प्रवृति के शिकार हैं और सिर्फ खुद का भला सोचते हैं। पर हमें याद रहे कि ऐसी प्रवृति तो सांसारिक है, और हम सांसारिक नहीं स्वर्गिक हैं। इसलिए हमारे मनोभाव स्वर्ग के मुताबिक होने चाहिए।  संत मत्ती 5:48 में येसु कहते हैं -  "इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।"   और संत लूकस इसी बात को थोड़ा सा अलग रूप में पेश करते हुए कहते हैं -  "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो।"  पूर्णता का आह्वान ईश्वर के समान उदार और प्रेममय क्षमा करने का आह्वान है। प्रभु हमें  सिर्फ पूर्णता के जीवन का आह्वान ही नहीं देते, पर इस आह्वान को अपने जीवन में साकार करने के लिए साधन भी मुहैया कराते हैं और वह साधन, निश्चित रूप से, पवित्र आत्मा है, जिसे संत पौलुस ईश्वर के प्रेम का आत्मा कहता है, जिसे ईश्वर ने हमारे दिलों में रोपित किया है।  

जब हम आत्मा से संचालित जीवन जियेंगे, तो हम हमारे स्वर्गिक पिता जैसा प्यार और क्षमा दूसरों को दिखा पाएंगे।
   

Thursday, 3 September 2020

23rd Sunday in ordinary time 06 Sept 2020

 Ez 33:7-9

Rom 13:8-10

Mathew 18:15-20


मसीह येसु में मेरे अजीज़ मित्रों भाइयों और बहनों आप सबों को मेरा प्यार भरा जय येसु। खुदावंद येसु मसीह के सामर्थी नाम में आप सबों का मैं आज के मनन चिंतन में स्वागत करता हूँ।  

आज प्रभु हमें एक बहुत ही महत्वपूर्ण ख्रीस्तीय अथवा मसीही गुण ऊपर मनन  चिंतन करेंगे, और वो गुण है - भाई का सुधार।  हम सब अपने जीवन में कभी न कभी, कुछ न खुश गलती अवश्य करते हैं।  कई बार हमें गलती का एहसास होता है तो कई बार हम अपनी गलती को पहचान नहीं पाते।  हम कई बार बुराई के अंधकार में रहते हैं।  यदि हमें अँधेरे में कुछ देखना हों तो हमें प्रकाश की ज़रूरत पड़ती है।  प्रभु येसु ने कहा है - "तुम संसार की ज्योति हो। " जब हमारा कोई भाई अंधकार में हो तो एक ज्योति बनकर उनको पाप व अंधकार से बहार लाना हमारा फ़र्ज़ है।   प्रभु येसु हमें अपने भाइयों और बहनों को सही मार्ग पे लाने के लिए चार चरण प्रस्तावित करते हैं : १. उसे अकेले ,में समझाओ।  यह बहुत ही महत्ववूर्ण कदम है।  किसी की गलती मालूम पड़ने पर हम क्या करते हैं ? पूरी दुनिया को जाकर बताते ही फलाना व्यक्ति ने  ऐसा किया है।  कई लोग दूसरों की गलतियां दूसरों के सामने बताने अथवा प्रकट करने में आनंद आता।  हम कई  बार किसी गलती के बारे में उस व्यक्ति को छोड़कर पूरी दुनिया को जा कर काबती हैं।  वचन कहता है यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो उसे  अकेले में समझाओ, दुनियाँ में जाकर ढिंढोरा मत पीटो। यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने अपने भाई को बचा लिया।  यहाँ बचा लिया से क्या आशय है ? किस चीज़ से बचा लिया ? ज़रूर यह नरकदण्ड की और इंगित करता है।  यदि हमने हमारे भाई अथवा बहन को गलत मार्ग से, अथवा अंधकार से प्रकश में आने के लिए मदद की तो वचन कहता है हमने उसे बचा लिया है।  अन्यथा वह अपने पाप में मर जायेगा।  याने उसका नर्क में विनाश होगा।  जैसा की आज पहले पाठ में नबी एजेकिएल कहते हैं - "तुम कुमार्ग छोड़ने  उसे चेतावनी नहीं दोगे, तो वह अपने पाप के कारण में जायेगा।" अब हम ये सोचेंगे कि कौन दूसरों के चक्कर में पड़े।  हम क्यों किसी की गलती बता कर अपनी उँगली जलायें।  गलती करने वाले गलती करें, और मरें तो मरने दो, मुझे तो मेरे जीवन को सुधारना है। कई बार ऐसी सोच हम में, होती है।  क्या ऐसा सोचना एक ख्रीस्तीय के लिए उचित है।  कदापि नहीं।  एक गैर ख्रीस्तीय ऐसा सोच सकता है लेकिंन ख्रीस्तीय नहीं।  नबी एजेकिएल 33:8 में प्रभु कहते है - "यदि तुम दुष्ट को कुमार्ग छोड़ने के लिए उसे चेतावनी नहीं दोगे, तो वह अपने पाप के कारण मर जायेगा, किन्तु तुम उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी होंगे। " 

तो प्रभु का वचन कहता है कि यदि एक पापी अपने पाप के कारण मरता है और में यह जानकर भी उसका सुधर नहीं करता, तो उसकी पापमय मौत के लिए ईश्वर मुझे उत्तरदाई मानेगा।  उत्त्पत्ति ग्रन्थ 4:9 में प्रभु ईश्वर ने काईन से पूछा - "तुम्हारा भाई हाबिल कहाँ है?"   इसपर उसने उत्तर दिया - "क्या मैं  मेरे भाई  का रखवाला हूँ ?" 

आज यदि प्रभु मुझसे पूछे तुम्हारा भाई तुम्हारी बहन कहाँ है ? वे किन   पाप  की राहों पर भटक  हैं , हम काईन की तरह यह नहीं  सकते क्या मैं उनका रखवाला हूँ। मैं ज़रूर अपने मैं ज़रूर अपने भाई, अपनी बहने का रखवाला हूं। प्रभु अंत में मुझसे हिसाब मांगेंगे न केवल मेरी नीजि जिंदगी का परन्तु औरों की जिंदगी को लेकर भी। मुझसे अंतिम न्याय में कहा जायेगा — ''तुमने मेरे इन भाईयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया वह तुमने मेरे लिए ही किया।''  मत्ती 25:40 । 

तो एक  मसीही को खुद बचना काफी नहीं है ,  औरों  को भी  बचाना होगा।  कोई गलत रह पर जाये तो उसे सही रह पर होगा।  यह संभव  नहीं  कि मैंने किसी को एक बार समझाया और वह तुरत  सुधर जायेगा।   व्यक्ति के  में समय लगता है।  पर हमें प्रयास रोकना नहीं।  प्रभु येसु आज  सुसमाचार में  कहते यदि वह याने जिसे आप सही राह पर लाना चाहते हो, आपकी बात नहीं मानता तो दो - एक व्यक्तियों को साथ  जाओ ताकी दो या तीन गवाहों  के सहारे सब कुछ प्रमाणित हो जाये।  याने हमें  व्यक्ति को नहीं सुधर रहा है करके छोड़ना नहीं है।  और आगे प्रभु   कहते हैं यदि वह उनकी भी नहीं उनकी भी नहीं सुनता तो उसे कलीसिया को बता दो। कलीसिया कलीसिया को बताने से क्या होगा। कलीसिया में उसके लिए प्रार्थना की जायेगी,धर्मगुरू उसे समझाएगा। और यदि वह कलीसिया की भी नहीं सुनता तो उसे यहूदी और नाकेदार जैसा समझो। किसी को यहूदी और नाकेदार जैसा समझने का आशय क्या है? पहले मैं सोचता था कि यदि वे कलीसिया की भी नहीं सुनते तो उन्हें विनाश होने के लिए यहूदी और नाकेदार जैसा समझकर छोड देना चाहिए। पर मैं ने जब इस पर गहराई से मनन चिंतन किया तो पाया कि ये तिरकृत अथवा छोडे हुए लोग नहीं पर प्रभु येसु के प्रिय लोग थे। वे उनके साथ खाते पीते थे। लोगों को इस पर आपत्ति् होने पर उन्होंने कहा था —''नीरोगियों को नहीं, रोगियों को वैद्य की ज़रूरत होती है। मैं धर्मियों को नहीं पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूं।'' तो प्रभु येसु के जीवन में हम देखते हैं कि जिन्हें लोग पापी समझते थे और उनके बारे में यह सोचते थे कि इनके सुधरने की कोई गुजाईश नहीं येसु ने उनसे दोस्ती की व उनके करीबी रिश्ता कायम कर उन्हें बचाने का पूरा प्रायास किया। तो किसी को नाकेदार जैसा मान लेने का आशय प्रभु येसु के नज़रिये से उसे छोड देना नहीं पर उसका और अधिक ख्याल रखना व उसके सुधार के लिए भरसक प्रयास करना है। 

आईये प्यारे भाईयों और बहनों आज के मनन चिंतन द्वारा हमने जो शिक्षा पायी है उसे अपने जीवन में लागु करने, अपने भाई—बहनों को गलत मार्ग से सही मार्ग पर लाने के प्रयास को हम गंभिरता से लेने के लिए प्रभु हमें आशिष व कृपा प्रदान करें। आमेन।  


Friday, 21 August 2020

21st Sunday in Ordinary time Year A : Hindi Sermon

 23 इतवार 

इसायाह 22 : 19-23 

Matthew 16:13-20

आज के पहले पाठ में हम पढ़ते हैं 22:22 में - "मैं दाऊद के घराने की कुंजी उसके कंधे पर रख दूंगा।  यदि वह खोलेगा तो कोई नहीं बंद कर सकेगा।  यदि वह बंद करेगा, तो कोई नहीं खोल सकेगा। " यहाँ पर यह बात एलियाकिम के सन्दर्भ में कही गई है जिसे तत्कालीन प्रसंग में शेबना नामक व्यक्ति के स्थान पर महल प्रपन्धक बनाया जाता है और कहा जाता है कि दाऊद के घराने की कुंजी उसके कंधे  पर राखी जाएगी। हम ताला  वहीं पर लगते हैं जहाँ मूल्यवान चीज़ हो।  और ताला लगाने का आशय होता है कि उस स्थान पर हर कोई ना जा सके।  किसी के हाथ में ऐसे स्थान की चाभी देने का अर्थ होता है उल व्यक्ति को वहां जाने का अधिकार है।    आज के वचन में एलियाकिम को ना केवल चाभी दी गयी पर उसे खोलने और बंद करने का पूर्ण अधिकार दिया गया।  उनके खोलने पर अथवा उनके द्वारा अनुमति देने पर ही कोई भीतर आ सकता है या फिर उन्होंने अनुमति नहीं दी तो कोई अंदर नहीं आ सकता।  

यह तो राजमहल में प्रवेश करने के सन्दर्भ में है।  पर ऐसी ही कुछ बात आज के सुसमाचार में प्रभु येसु अपने शिष्य पेत्रुस से कहते हैं - तुम पेत्रुस अर्थात चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाउँगा।  प्रभु येसु ने अपनी कलीसिया का निर्माण पेत्रुस रूपी चाटन पर किया है।  सबसे पहली ध्यान देने योग्य बात यह है कि कलीसिया का  निर्माण कोई पास्टर अथवा फादर नहीं करते, परन्तु प्रभु येसु स्वयं करते हैं।  और प्रभु येसु ने जिस कलीसिया निर्माण किया है वो केवल एक ही कलीसिया है जिसे उन्होने पेत्रुस रूपी चट्टान पर बनाया है, जो आज भी उसी चट्टान पर उनके उत्तराधिकारी की अगवाई में मज़बूत कड़ी है।  और वह है कैथोलिक कलीसिया।  

पेत्रुस को प्रभु  आगे कहतें है - " मै तुम्हें स्वर्ग राज्य की कुंजियाँ प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।"

नबी इसायाह के ग्रन्थ की घटना में सांसारिक राजमहल में प्रवेश की बात बताई गई है परन्तु सुसमाचार में स्वर्गराज्य में प्रवेश की बात कही गई है।  प्रभु येसु जो कि इस संसार में हम सब पापी जनों का उद्धार करने आये, उन्होंने अपने इस मुक्ति कार्य को कलवारी पर आने बलिदान द्वारा सम्पन्न किया।  और उनके द्वारा कमाए उद्दार को हॉसिल करने का ज़रिया उन्होंने कलीसिया बनाया।  उस उद्दार के जीवन में प्रवेश करने या न करने देने का अधिकार कैलिसिया के पास है जिसका उपयोग संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी संत पिता याने पोप और उनके साथ उनके उस प्रेरितिक अधिकार में सहभागि होते हुए सभी बिशप और पुरोहित गण करते हैं।  याने संत पेत्रुस को दिए गए अधिकार का उपयोग संत पिता, बिशप और पुरोहितगण करते हैं।  इसलिए आज के सुसमाचार के अनुसार स्वर्ग में प्रवेश करने की अनुमति देने व ना देने के  इस अधिकार को प्रयोग कैथोलिक कलीसिया में  पवित्र संस्कारों  व अन्य प्रार्थनाओं के माध्यम से किया जाता है।  सातों संस्कारों का उद्देश्य यही है की जो कोई उन्हें गृनहण करता है उनके लिए स्वर्ग का द्वार खुल जाये।  बपतिस्मा, पापस्वीकार, पवित्र यूखरिस्त, दृढीकरण, रोगी विलेपन, पुरोहिताई और विवाह इन सब संस्कारों में निहित कृपा हमारे लिए स्वर्ग का द्वार खोलती है।  इसलिए संस्कारों को उचित रीती से ग्रहण करना हमारी आत्मा के उद्दार के लिए बेहद ज़रूरी है।  हम यह कह सकते हैं कि संत पेत्रुस के हाथों में दी गयी चाभियाँ और कुछ नहीं पर पवित्र संस्कार ही है।  

संत पेत्रुस पेंटेकोस्ट के दिन संस्कार रूपी चाभी का उपयोग किया और 3000 लोगों को बपतिस्मा देकर  स्वर्ग का द्वार खोल दिया।  उसी प्रकार पहले तो वे गैर यहूदियों के लिए इस चाभी के उपयोग के पक्ष्य में 

उद्धार की चाभी केे पक्ष में नहीं थे परन्तु प्रेरितों की किताब 10 में पढते हें कि पेत्रुस को एक दिेव्य दर्शन देते हैं और गैर यहूदियों के उद्धार की शिक्षा का संदेश सुनाते हैं। तब पेत्रुस बोल उठता है — ''मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूं कि ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। और तब 11 में हम पढते पेत्रुस येरूसालेम की महासभा में इस बात को स्पष्ट करते हैं कि उद्धार किसी एक कौम या समुदाय के लिए नहीं परन्तु सभी  जातियों और राष्टों के लिए है। और वे उन्हें उस घटना का वर्णन करते हैं जिसमें स्वर्गदूत ने कर्नेलियुस से कहा था कि पेत्रुस को अपने घर बुलाईए ''वह जो शिक्षा सुनायेंगे उसके द्वारा आप को और सारे परिवार को मुक्ति प्राप्त होगी।''11र:14 और आगे वचन में हम पढते हैं कि जैसे ही पेत्रुस ने बोलना प्रारम्भ किया पत्रवत्र आत्मा उन लोगों पर उतरा। तो इस प्रकार से पेत्रुस ने वहां उस चाभी का उपयोग करते हुए गैर यहूदियों के लिए भी मुक्ति का द्वार खोला। और आज भी कलीसिया में पुरोहित, बिशप और संत पिता अपने इस अधिकार व शक्ति का उपयोग करते हुए हज़ारों—लाखों आत्माओं के लिए उद्धार का दरवाज़ा खोल रहे हैं। 

प्यारे विश्वासियों किसी भी प्रकार की गलत शिक्षा के शिकार बनकर सच्चे विश्वास को छोडकर कहीं और न भटक जायें। उद्धार की चाभियां प्रभु येसु ने स्वयं अपने प्रेरितों को दी है और उनके उत्तराधिकारी प्रेरितों की इसी धरोहर को जारी रखते हुए मुक्ति के कार्य को आगे बढा रहे हैं। प्रभु येसु ने दो हज़ार साल पहले एक ही सच्ची कलीसिया ठहराई थी जो प्रारम्भ से ही कैथोलिक कलीसिया के नाम से जानी जाती है। पवित्र यूखरिस्त, पवित्र पाप स्वीकार संस्कार औरपुरोहिताई जैसे संस्कार इसी कलीसिया में पाये जाते हैं जिन्हें स्वयं प्रभु येसु ने स्थापित किया है जिसका वर्णन हम पवित्र सुसमाचारों में पाते हैं। जैसा कि संत योहन 20:23 में हम पढते हैं कि किस प्रकार प्रभु ने अपने प्रेरितों को दूसरों के पाप पापस्वीकार संस्कार के द्वारा माफ करने का इन शब्दों में अधिकार दिया — ''तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।'' वैसे ही संत लूकस 22:19 में पवित्र यूखरिस्त की स्थापना की — ''उन्होंने रोटी ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, "यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो"। और प्रभु येसु ने संत योहन 6:53—54 में स्पष्ट रूप से कहा है — "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - यदि तुम मानव पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका रक्त नहीं पियोगे, तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा। जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा। शैतान हम बहकाये ना, कोई भी हमें पथभ्रष्ट ना करे, हम एक ही पवित्र, कैथोलिक, और प्रेरितिक कलीसिया से जुडे रहें और इस कलीसिया में रहते हुए और इस कलीसिया के द्वारा हमें प्रदान किये गये साधनों द्वारा याने संस्कारों द्वारा हम मुक्ति के द्वार से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करें। आमेन। 

Thursday, 13 August 2020

 

20th Sunday year A


आज के तीनों पाठों से एक विषय जो उभर के आता है वो है : ईश्वर द्वारा यहूदियों और गैर यहूदियों को ईश्वर के एक ही परिवार के रूप में एकत्रित करना। पहले पाठ में नबी इसायस से ईश्वर कहते हैं कि मेरा घर सब रष्टों के लिए एक प्रार्थना का घर होगा। और संत पौलुस कहते हैं कि वे गैर यहूदियों के लिए प्रेरित चुने गये हैं। और सुसमाचार में प्रभु येस इस्राएल से बाहर पडोसी मुल्क की जमींन पर सुसमाचार सुनाने जाते हैं। और वहाँ पर एक कनानी स्त्री याने गैर यहूदी स्त्री प्रभु को पुकारते हुए कहती है  "प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।"

आज दुभाग्यवश हमारे बहुत सारे बच्चे बूरी आत्मा, बुराई की ताकत, या फिर शैतान के द्वारा सताये जा रहे हैं। ये बुराई की आत्मायें विभिन्न रूपों में आज की युवा पीढी की जिंदगी को बरबाद कर रही हैं: कहीं विभिन्न प्रकार के नशों की आत्मा है तो कहीं पापमय रिश्तों की आत्मा; कहीं विद्रोही आत्मा है तो कहीं हिंसा की आत्मा। कहीं मोबाइल, इंटरनेट और सोश्यल मिडिया की मनोग्रस्ती की आत्मा है तो कहीं हिरो वरशिप की आत्मा। हमारे बच्चे शैतान के चंगुल में फंसते जा रहे हैं।

उस स्त्री अपनी बेटी की समस्या को पहचान लिया कि यह शैतान के वश में है। हमारे बच्चे शैतान के वश में हैं पर हम यह पहचान नहीं पा रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह स्त्री कहती हैमुझ पर दया कीजिए। वो यह नहीं कहती कि मेरी बेटी पर दया कीजिए। दूसरे शब्दों में वो कहती है मेरी सहायता कीजिए। प्रभु येसु उस नारी के विश्वास को तीन बार परखते हैं।

पहली बार उसकी प्रार्थना को नज़अंदाज करके। वे कुछ जवाब ही नहीं देते। दूसरी बार यह कह कर कि मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ। दूसरे शब्दों में कि तुम उस परिवार की सदस्य नहीं हो जिसके लिए मैं भेजा गया हूँ। और तीसरी बार यह कहकर कि बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है। अब यह सुनकर पथभ्रष्ट हो जायें कि येसु ने उस नारी से इस प्रकार की हल्की भाषा का उपयोग क्यों किया। यह उस नारी की विनम्रता की परख थी। प्रभु उसकी विनम्रता को परख रहेथे। यदि वह नारी अहंकारी होती तो येसु को सीधे जवाब देतीमैं तो यह सोचकर तुम्हारे पास आयी थी कि तुम एक धार्मिक, पवित्र और भले इंसान हो, परेशान दुखित लोगों की मदद करते हो। तुम से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। अगर तुम्हारी निगाहों में हम कुत्ते ही हैं तो नहीं चाहिए तुम्हारी मेहरबानी, नहीं चाहिए कोई चंगाई। मैं चलती हूँ। परन्तु नहीं; वह येसु की भाषा और शब्दों पर नहीं गई लेकिन उसने येसु के दिल की भाषा को समझ लिया था। वह जितनी विनम्र थी उतनी ही बुद्धिमान थी। वह जानती थी कि जो बोला गया है वह कुछ और है और जो दिल में चल रहा है वो कुछ और है। और उसने चार प्रकार से प्रभु येसु के सभी सवालों के जवाब पेश किये जिसका उपयोग आप और मैं सब अपनी प्रार्थनाओं में, अपने निवेदनों में कर सकते हैं।

पहला: वह अपनी प्रार्थना में दृढ बनी रही। उसने हार नहीं मानी। उसने अपना विश्वास और मनोबल कमजोर नहीं होने दिया। उसने उम्मीद बरकरार रखी। वह दृढ बनी रही।

हमारे विश्वास कितना बडा अथवा गहरा है? हम हमारी प्रार्थनाओं में कितने दृढ़ रहते हैं? हमारी प्रार्थनाओं का तुरन्त जवाब मिलने पर हम कितने समय तक संयम दृढता के साथ विश्वास उम्मीद बरकरार रखते हुए, प्रार्थना जारी रखते हैं। जब कोरोना महामारी शुरू हुई हम सब ने प्रारम्भ में अपनी प्रार्थओं में कितनी दृढ़ता लगन दिखाई! पर अब जब महीनों की प्रार्थओं के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, हमें हमारी प्रार्थनायें बेअसर लग रही हैं। कईयों ने तो प्रार्थना करना ही छोड दिया है। कोई प्रार्थना कर भी रहे हैं तो भी कोई खास उम्मीद से नहीं। यह कनानी नारी आज हमें चुनौती दे रही है कि प्रार्थना का जवाब आने तक बिना विचलित हुए, बिना हिम्मत हारे, बिनाहताश हुए हम प्रार्थना में लगे रहें। हमने सुसमाचार में पढा कि वह नारी प्रार्थना की सुनवाई होने तक बिना विचलित होए प्रार्थना करती रही।

दूसरा: उसने शिष्यों की मध्यस्थता ली। शिष्यों ने उसकी ओर से मध्यस्थता करते हुए कहा — "उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती रही है" शिष्य बोले प्रभु उसकी प्रार्थना सुन लीजिए, वो चुप रहने वाली नहीं है।

आज भी प्रभु के शिष्यों की मध्यस्थ प्रार्थना की अहमियत है। संतों की प्रार्थना का अपना स्था है। जैसे आज के सुसमाचार में शिष्यों ने उस स्त्री के लिए मध्यस्थता की वैसे ही मरियम ने काना के भोज में उस विवाह वाले परिवार के लिए मध्यस्थता की थी। और दोनों ही घटनाओं में हम देखते हैं प्रभु कोई चमत्कार करने की मंशा तो नहीं रखते हैं फिर भी वे अंत में दोनों घटनाओं में उनकी मदद ज़रूरकरते हैं। जरूर आज के सुसमाचार में प्रभु उस नारी की विनम्रता और गहरे विश्वास से प्रभावित होकर उसकी बेटी को चंगा करते हैं परन्तु शिष्यों की मध्यस्थता की भूमिका को सिरे से खारिज़ करना भी उचित प्रतित नहीं होता।

तीसरा: वह प्रभु के करीब आती है और झूककर उन्हें प्रणाम करती है ओर कहती है प्रभु मेरी सहायता कीजिए।

जब हम प्रार्थना करते हैं हमें प्रभु के करीब आना है।  हमें प्रभु से नज़दिकी रिश्ता कायम करते हुए विनम्रता से येसु की प्रभुता को स्वीकार करके उनकी आरधना में अपना सिर झूकाना होगा तब हमारी प्रार्थना की आशिष चंगाई का उत्तर लेकर हमारे पास लौटेगी।

 

चौथा: उसने गुस्सा दिखाया नाराज़गी, पर वह बडी नरमी से पेश आयी और कहा  "जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं"

हम पिल्ले ही सही, पर वे भी तो मालिक की मेज़ से गिरे हुए चूर के हकदार हैं। कितनीबडी  विनम्रता। वो कह रही थी कि जि हाँ, मैं नाकाबिल हूँ, इसके कि आपके लोगों जैसे आपकी  मेहरबानी की हकदार बनूँ पर, पर मुझ नाकाबिल पर आपकी रहम की एक बूँद भी गिर जाये तो वो भी मेरे लिए काफी है। कितना दृढ विश्वास और कितनी विनम्रता।

और उसके विश्वास और और उसकी विनम्रता ने सचमुच में येसु को प्रभाविता किया। और वे बोल उठे — "नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।" और उसी क्षण उसकी बेटी चंगी हो गई।

 

आईये इस कोरोना काल में हम हिम्मत हारें। हमारा विश्वास कमज़ोर हो। हम दृढ बने रहें। और प्रभु का यह वचन सुनने तक डटे रहें "तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।" जो तुमने माँगा है, तुम्हारे हर मुराद पूरी हो। आमेन।