Saturday, 25 February 2017

सामान्य काल का ८ वा रविवार




इसायाह 49, 14-15
1 कुरिथियों 4, 1-5
मत्ती 6, 24-34
चिंता, डर और ख्याल हर किसी की जिंदगी का एक भाग है। छोटी से छोटी समस्या भी हमें परेशान कर देती हैं। ये हमसे हमारा चैनो-सकून छीन लेती हैं। चिंता हमारे मन में कडवाहट, गुस्सा क्रोध एवं चिडचिडापन लाती हैं और दूसरों के साथ हमारे संबंधों को कमजोर बनाती हैं। लालच एक दूसरी मानवीय कमज़ोरी है, जो हमारे जीवन से खुशियों को नदारद कर देती है। अधिक से अधिक हासिल करने की लालसा इंसान को ऐसी चीज़ों के लिए बांवरा होने को मजबूर कर देती है जो उसके जीवन के लिए वास्तव में उतनी ज़रूरी नहीं होती।

मन में असुरक्षा की भावना उन्हें अपने उस भविष्य के लिए चीजें जमा कर के रखने को मजबूर करती हैं जो अनिश्चिताओं से भरा है। आने वाले पल मेरे साथ क्या होने वाला मैं यह नहीं जानता फिर भी उस पल को संवारने के लिए, उस आने वाले पल और आने वाले कल की खुशियों के लिए, मैं मेरे वर्तमान की खुशियों को कुर्बान कर देता हूँ। जो खुशियाँ, जो सुकून आज मेरी जिंदगी में है, कल मुझे मिले या न मिले पर मैं उस निश्षित कल के लिए वर्तमान में जो सुख, जो शांति, जो तस्सली है उसका भी आनन्द नहीं ले पाता। यह है हमारे जीवन की विडम्बना।

प्रभु कहते हैं खेत के फूलों और आकाश के पक्षियों से सिखो जिन्हें अपने कल की कोई चिंता नहीं, वे अपने वर्तमान को खुल की जीते हैं। प्रभु कहते हैं अपने जीवन की हद से भी ज़्यादा चिंता मत करो, न अपने भोजन की, कि क्या खायें, और न अपने शरीर की कि क्या पहनें।  प्रभु येसु हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यक्ताओं से पूरी तरह से वाकिफ़ हैं। कठोर परिश्रम करके अपनी जीविका चलाने का महत्व उन्हें भी पता है। तीस साल तक मरियम और युसूफ के साथ नाज़रेथ में रहते समय उन्होंने भी अपने पालक पिता के साथ पसीना बहाया था और अपनी रोजी रोटी कमाई थी। जब प्रभु हम से कहते हैं - ‘‘चिंता मत करो’’ तो उनका कहने का मतलब यह नहीं है कि हम हमारा काम धंधा करना, मेहनत करना, सब छोड दें और आराम से अपने-अपने घरों में बैठे रहें। और प्रभु स्वर्ग से हमारे लिए रोटियाँ बरसायेंगे। नहीं ऐसा हरगीज नहीं है। प्रभु का वचन साफ़ शब्दों में हम से कहता हैं 2 थेसलनिकियों 3,10-12 में - ‘‘जो काम नहीं करना चाहता, उसे भोजन नहीं दिया जाये। हम ऐसे लोगों से मसीह के नाम पर यह आदेश देतें हैं और उनसे अनुरोध करते हैं कि वे चुपचाप काम करते रहें और अपनी कमाई की रोटी खायें।’’

मैं आप लोग से कुछ सवाल करना चाहता हूँ। आप में से कितने लोग काम करने वाले है? नौकरी या व्यवसाय करते हैं? .................... तो अपनी रोजी रोटी का इंतज़ाम आप करते हैं? आपके पास, या आपके घर में जो कुछ है वो या तो आपका कमाया हुआ है या फिर आपके माता-पिता या पुर्वर्ज़ों की देन है। है ना?

ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों, प्रभु येसु जब हम से कहते हैं कि चिंता मत करो तो अपनी इस शिक्षा के द्वारा वे हमारी इस बहुत बडी गलत फ़हमी को दूर करना चाहते हैं कि हमारे जीवन के लिए ज़रूरी चीज़ें हम खुद जुटाते हैं, बच्चे हम पैदा करते हैं, कोई बिमार होता है तो उसका इलाज हम करवाकर उसे ठीक हम करते हैं, पढाई करके पास हम होते हैं और हम हमारी अपनी योग्यताओं के दम पर नौकरी पाते हैं और हमारे जीवन के लिए कमाई करते हैं आदि। जो कुछ दिखता है और जो वास्तविकता है उसमें बहुत फर्क है। हमारे जीवन की तमाम ज़रूरतों को पूरा करने के पीछे एक अदृष्य शक्ति दिन रात लगी रहती है जिसे देखते नहीं और नज़र अंदाज कर देते हैं।

हम इस वास्तविकता को नकारते हैं कि जो कुछ हमारे पास है वह विधाता ने दिया है और जो कुछ हमें हासिल होने वाला है वह भी विधाता ही हमें देगा। यदि इस सच्चाई को हम स्वीकार कर लेते हैं तो हमारे जीवन में कोई चिंता नहीं रहेगी। हमें चिंता इसलिए होती है कि हम हमारी क्षमताओं, और हमारे पास उपलब्ध साधनों पर भरोसा करते हैं। हमारी क्षमताएं, और योग्यताएं अपरिपक्व व सीमित होती हैं जो अनिष्चितताओं और शंकाओं को जन्म देती हैं। हम जानते हैं कि विभिन्न बिमारियों का ईलाज़ आॅपरेशन से सम्भव है। एक छोटा सा भी आॅपरेशन ही क्यों न हो, और हमारे पास आॅपरेशन के लेटेस्ट साधन और सबसे ज्यादा़ अनुभवी डाॅक्टर ही आॅपरेशन क्यों न कर रहा हो, हमारी चिंता के टावर खडे हो जाते हैं। जब तक आॅपरेशन थिएटर से मरीज़ सकुशल वापस नहीं निकलता हमारे दिल की धडकनें तेज हो जाती है और हमारी सांसें रूक सी जाती है। हमारी चिंता का विषय यह शंका होती है कि आॅपरेशन सफल होगा कि नहीं? डाॅक्टर हमारे परीजन को बचा पायेगा कि नहीं? दवाईयाँ प्रभावशाली साबित होगी या नहीं? इत्यादि। इस दुनिया व दुनिया की किसी भी चीज़ पर भरोसा करना व उस पर निर्भर रहना चिंताओं को जन्म देता है। क्योंकि जैसा कि मैंने कहा वे सीमित व अपरिपक्व है। इसलिए प्रभु येसु हमसे कहते हैं कि हम इस दुनिया की चिज़ों की चिंता करके व्यर्थ में समय व ऊर्जा नष्ट न करें बल्कि निरन्तर ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहंे, और ये चीज़ें तुम्हें यों ही मिल जायेगी। हमारा पूरा ध्यान ईश्वर पर व उसके राज्य पर केंद्रित होना चाहिए। चिंता करने से हममें से कोई अपनी आयु घडी भर भी नहीं बढा सकता। व्यर्थ चिंता करने से कोई अपना भाग्य नहीं बदल सकता। हमारे चिंता करने से हमारा ही मन विचलित हो जाता है। अशांति व बचैनी बढती है।

प्रभु कहते हैं हम इंसान ही अपने जीवन के लिए चिंतित रहते हैं। पशु-पक्षी व वनस्पती ऐसा नहीं करते। वे पूरी तरह से प्रभु पर निर्भर रहते हैं। उनके मन में कोई आशंका नहीं होती। स्तोत्र ग्रंथ 8, 6 में प्रभु का वचन कहता है कि प्रभु ने इंसान को सृष्टि के मुकुट के रूप में बनाया है। यानी इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ट कृति है। यदि ईष्वर इस दुनिया के हर जीव जंतु को सृष्टि के प्रारम्भ से संभालता आ रहा है, वह चिडियों को दाने देता और मरूभुमि में भी वनस्पिति उगाता है, तो फिर इनंसान को जिसे उसने सृष्टि के शीर्ष के रूप में बनाया है वह क्यों नहीं संभालेगा। उसने तो हमारे उद्धार के लिए अपने एकलौते बेटे तक को कृर्बान कर दिया तो फिर वह हमारी दुनियाई ज़रूरतों को पूरा क्यों नहीं करेगा। वह आज हमसे कहता है - ‘‘स्त्री अपना दुधमुहा बच्चा भुला सकती है पर मैं तुम्हें कभी नहीं भुलाऊंगा। मैंने तुम्हें अपनी हथेलियों पर अंकित किया है’’ (इसा 49,16)। जि हाँ, वह हमें कभी नहीं भुलाएगा, उन्होंने अपनी हथेली पर हमारा चेहरा अंकित किया है। जब भी नज़र हथेली पर पडती है वे हमें देखते हैं। हमारे साथ जो कुछ भी घटित होता है उसे वे देखते हैं। वे कहते हैं तुम्हारी चारदीवारी निरन्तर मेरी आंँखों के सामने है। इसलिए हम न डरें, न ही घबरायें, प्रभु पर, सिर्फ प्रभु पर अपना पूरा भरोसा बनाये रखें। वही हमें संभालता है। आमेन।



















Saturday, 18 February 2017

सामान्य काल का 7वां रविवार


लेवी 19, 1-२. 17-18
१ कुरिंथियो 3,16-23
मत्ती 5,38-48

आज का सुसमाचार पाठ बहुत ही चुनौतीपूर्ण शिक्षा हमारे सामने रखता है। प्रभु कहते हैं यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड मारे, तो दूसरा भी उसके सामने कर दो। इस बात को हमें अक्षरशः लेने की ज़रूरत नहीं। कई बार लोग प्रभु की इस शिक्षा का गलत मतलब निकालते व कई बार इस वचन का प्रयोग मज़ाक के तौर पर करते हैं। यहाँ पर बात महज दूसरा गाल दिखाने की नहीं है, प्रभु इससे भी बढकर हमें एक गहरी शिक्षा देना चाहते हैं। प्रभु यहांँ अपनी शिक्षा को एक मुहावरे के रूप में पेश करते हैं। जब कोई आराम से सोता है तो हम कहते हैं मुहावरे वाली भाषा में कहते हैं कि वह घोडे बेच कर सो रहा है। पर वास्तव में वहाँ न कोई घोडे होते हैं और न ही उन्हें कोई बेचता है। वैसे ही जब प्रभु येसु कहते हैं कि एक गाल पर मारने पर दूसरा दिखा दो। तो इसके पीछे उनका आशय यह नहीं कि बेमतलब लोगों की मार खाते रहो। जब प्रभु येसु को अन्नस और कैफस के सामने न्याय के लिए पेश किया गया था तब उनके गाल पर प्यादे ने थप्पड मारा था। याद रहे प्रभु येसु ने वहाँ उन्हें दूसरा गाल नहीं दिखाया। उन्होंने उससे पूछा - ‘‘यदि मैंने गलत कहा, तो मुझे गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो मुझे क्यों मारते हो?’’ (योहन 18, 23). प्रभु की इस शिक्षा का अर्थ यह नहीं कि हम हमारे विराधियों द्वारा किये गये हर जुल्म को मुँह बंद किये सहते रहें। जहांँ कहीं भी अन्याय होता है वहाँ हमें उसके विरुद्ध आवाज उठाना चाहिए। हमें हमारा पक्ष रखने का अधिकार है। एक गाल पे मारने पर दूसरा गाल दिखाने का सीधा सा मतलब है कि हमें हमारे विरोधीजन से बदला नहीं लेना चाहिए। बुराई का सामना हमें अच्छाई के साथ करना चाहिए। बुराई के बदले बुराई और अधिक बुराई को जन्म देगी। ईंट के बदले ईंट और ऑंख के बदले आँख, खून खराबा, हिंसा व अशांति ही लाएंगे। प्रभु का वचन कहता है रोमियो 12, 19-20 में - ‘‘बुराई के बदले बुराई नहीं करें।. . .जहांँ तक हो सके सबो के साथ मेल-मिलाप बनाये रखें। प्रिय भाईयों! आप स्वयं बदला न चुकायें, बल्कि उसे ईश्वर के प्रकोप पर छोड दें; क्योंकि लिखा है - प्रतिशोध मेरा अधिकार है, मैं ही बदला चुहाऊँगा।’’ प्रभु हमें मेल-मिलाप व सुलह का रास्ता दिखाते हैं। नकारात्मक भावनाओं और विचारों का तोड नकारत्कता नहीं है। ‘तुम को देख लुँगा’ वाली भावना आपसी रिशते को खत्म कर देती है। जिस दिन हमारे मन में किसी के प्रति ऐसी भावना आती है, उस दिन से हम शैतान को हमारे अंदर निमंत्रण देते हैं। फिर वह हमारे अंदर रहकर हमें हमारी इस सोच को कार्य रूप में परिणित करने के लिए, उकसाता रहता है। यह नकारात्मकता जो एक साधारण गुस्से से प्रारम्भ होकर बैर में तब्दिल हो जाती है, और मन का बैर एक जहर बनकर दुश्मनी को जन्म देता है। प्रभु का वचन कहता है - अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जिस तरह सूरज की भीषण गर्मी जल स्रोतों को सुखा देती है वैसे ही मन में बैर की भावना हमारे दिलों से प्रेम को सुखा देती है। इसलिए यदि हमारे भाई बहनों से तू तू-मैं मैं हो जाये, झगडा लडाई हो जाये तो इसकी नकारात्मकता लंबे समय तक हमारे दिलों में नहीं होनी चाहिए। वचन कहता है - ‘‘यदि आप क्रूध हो जाये तो इसके कारण पाप न करें। सूरज डूबने तक अपना क्रोध कायम नहीं रहने दें'' (एफेसियों 4, 26)। हमारी नकारात्मक भावनाओं का सबसे अच्छा उपचार प्यार है। इसीलिए प्रभु हमसे कहते हैं अपने दुष्मनों से प्यार करो। हमारे दुश्मन कौन हैं? चीनी? पाकिस्तानी? ज़रूरी नहीं। हमारे दुष्मन वे सभी हैं जो हमें पसन्द नहीं करते। हमारे दुष्मन वे हैं जो हमें गुस्सा दिलाते हैं। हमारे दुष्मन वे हैं जो हमें चिढाते हैं, दूसरों के सामने हमारी बुराई व निंदा करते हैं, जो हमें गिराने के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो हमारी उन्नती को देखकर जलते हैं। प्रभु न कवल ऐसे लोगों से प्रेम करने के लिए बल्कि उनके लिए प्रार्थना करने के लिए भी कहते हैं। प्रभु ने स्वयं यह किया। सूली पर से अपने दुष्मनों को न केवल क्षमा दी पर उनके लिए प्रार्थना की। संत स्टीफन ने जब यहूदियों ने उन्हें पत्थरों से मारा तब मरने से पहले यही कहा - हे प्रभु यह पाप इन पर न लगा। वासना की आग में जलते हुए एलेक्ज़ांन्ड्रो को जब फूलों सी कोमल व नादान मरिया गोरेती ने उसके पाप में भागीदार होने से इनकार किया तो एलेक्ज़न्ड्रो ने उसकी हत्या कर दी। अस्पताल में अंतिम सांसे लेते हुए मरिया गोरेते कह उठती है। मैं उसे माफ करती हूँ। जब सिस्टर रानी मरिया को उनके दुष्मन ने चाकुओं से गोद कर मरवा डाला तो उसकी बहने सि. सेलमी ने हत्यारे के खुनी हाथों पर राखी बांध कर उसे अपना भाई बना लिया। आज कहने को दुनिया मे ईसाईयों की संख्या बहुत है। पर ईसा के अनुयाईयों की संख्या बहुत कम है। महात्मा गांँधी ने इंग्लैंड में रहते हुए ईसाई धर्म का अध्ययन किया। लेकिन वे कभी एक ईसाई नहीं बनें। क्योंकि उन्होंने देखा कि जिन लोगों पर ईसाई होने के लेबल लगे हैं उनमें ईसा की झलक नहीं दिखाई देती थी, ईसा की शिक्षा ईसाईयों के कार्यों में दिखाई नहीं देती थी। वहीं महात्मा गांधी नाम से नहीं परन्तु अपने कार्यों से ईसा के अनुयायी बन गये। उन्होंने प्रभु ईसा की शिक्षा को अपने जीवन में उतारा। उसे अपने जीवन व कार्यों का सिद्धांत बना लिया। एक गाल पर थप्पड मारने पर दूसरा दिखाने का सिद्धांत महात्मा गांधि के अंहिसावाद का पर्याय बन गया। इसीलिए आज दुनिया उन्हें महान अत्मा कह कर उनका सम्मान करती है।
प्रभु की इन शिक्षाओं को सुनना तो बडा अच्छा लगता है। पर इन पर अमल करना, व अपने जीवन में इन्हें उतारना एक मुशकील काम है। क्योंकि हमारा मानवीय स्वभाव तो अपने दुष्मनों से घृणा, अपने भाईयों से प्रेम करना सिखलाता है। दुष्मनों से प्रेम करना तो ईश्वरीय स्वभाव है। और हमें यही ईष्वरीय स्वभाव प्राप्त करना है। इसीलिए प्रभु येसु आज हमसे कहते हैं - अपने पिता जैसे परिपूर्ण बनो। आईये हम आज हमारे मन की सारी कडवाहट को, सारी नकारात्मकता को, दु्शमनी व घृणा के भावों को हमारे दिलों से निकाल दें ताकि प्रभु हमारे दिलों को अपने प्रेम से भर दें। ताकि हम उनकी तरह हमारे दुशमनों व हमारी विरोधियों से भी प्रेम करे सकें। आमेन।




Saturday, 11 February 2017

समान्य काल का 6वां रविवार



ईष्वर ने इंसान की सृष्टि उनके अनंत सुख व आनन्द में भागीदार होने के लिए की थी परन्तु मानव ने आज्ञा भंग द्वारा उस ईष्वरीय उपहार को खो दिया। हमने अपने स्वर्गीय पिता के उस आरामदायक मकान को ठुकरा कर, ऐसे मकान को अपनाया जहांँ पर सारी सुविधायें होने के बाद भी शांँति व सुकून नहीं। हमारे स्वर्गीय पिता ने हमारे भरण-पौषण की सारी व्यवस्था की परन्तु हमारे आदि माता पिता ने उनकी इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं किया। उन्हें लगा कि उस भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाकर वे ईष्वर से भी ज्यादा ताकतवर व ज्ञानवान बन जायेंगे। फिर तो उन्हें किसी बात की चिंता नहीं रहेगी। जो था उससे संतुष्ट नहीं हो कर अधिक की लालच में उन्होंने अनंत जीवन को खो दिया। जीवन के सारे रहस्य जान लेने की जिज्ञासा में उन्होंने अपनी जिंदगी एक अनसुलझी पहेली बना लिया। इंसान की जिंदगी एक ऐसी जटील पहेली बन गई कि कब बात बनती कब बिगड जाती हमें पता ही नहीं चलता। सब कुछ ठीक-ठाक चलते-चलते कब मुसीबतों का पहाड टूट पडता है कुछ पता ही नहीं चलता। एक मजदूर दिन भर कडी धूप, ठंड या बारीष में काम करने के बाद रात को रूखा-सुखा खाकर चैन की नींद सोता है पर अरबों खरोबों के मालीक स्वादिष्ट-स्वादिष्ट भोजन खाकर भी तृप्ती का अहसास नहीं करते। उन्हें न रात में नींद आती है और न दिन में चैन। कुल मिलाकर जीवन में कोई स्थिरता नहीं है। अषांति, दुख, विपत्तियां, पीडायें और कष्ट ये सब पाप का परिणाम है।
परन्तु हम जानते हैं कि जीवन की ये उलझनें कुछ ही समय की हैं। जब तक हम इस संसार में हैं हमें इन सब चीज़ों से रूबरू होना पडता है। परन्तु इसके बाद हमें एक ऐसा जीवन मिलेगा जिसकी हम दुनिया में कल्पाना भी नहीं कर सकते। संत पौलुस आज के पहले पाठ में हमसे कहते हैं - ‘‘मैं उन बातों के विषय में बोलता हूँ जिनके संबंध में धर्मग्रंथ यह कहता है- ‘‘ईष्वर ने अपने भक्तों के लिए जो कुछ तैयार किया है, वह किसी ने कभी देखा नहीं, उसके विषय में किसी ने कभी सुना नहीं और कोई उसकी कल्पना कभी नहीं कर पाया।’’ उस स्वर्गीय आनन्द, खुषी एवं ईष्वर के सामिप्य की, उनके प्रांगण में निवास करने के उस अनुभव की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। कितना महान, व कितना सुखद होगा हमारा प्रभु के साथ अनन्तकाल तक निवास करना!!!
इस अनन्त सुख के भागीदार बनने के लिए ईष्वर हमें जबरदस्ती नहीं करते, जैसा कि उन्होंने आदि माता-पिता के साथ किया। आज के पहले पाठ में प्रभु का वचन हमसे कहता है - ‘‘ईष्वर के प्रति ईमानदार रहना तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है। उसने तुम्हारे सामने अग्नि और जल दोनों रख दिया, हाथ बढाकर कर उन में से एक को चुन लो। मनुष्य के सामने जीवन और मरण दोनों रखे हुए हैं। जिसे मनुष्य चुनता है, उसी वही मिलता जाता है।’’ हमारे सामने सारे विकल्प रखने के बाद प्रेमी पिता हमसे कहते हैं विधिविवरण ग्रंथ 30,19 में - ‘‘मैं तुम्हारे सामने जीवन और मृत्यु, भलाई और बुराई दोनों रख रहा हूँ। तुम लोग जीवन को चुन लो।’’ उन्होंने हमें पूर्ण स्वतंत्रता दी है। पर ये नहीं चाहते कि हम उस स्वतंत्रता का दुरउपयोग कर मृत्यु को चुनें। वे चाहतें हैं कि हम स्वतंत्र रूप से जीवन को चुनें, उस अनन्त जीवन को जिसे हमें दिलाने के लिए हमारे मुक्तिदाता प्रभु येसु इस संसार में आये हैं। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु पर्वत प्रवचन में अपने दिव्य वचनों द्वारा उस अनन्त जीवन को प्राप्त करने का मार्ग हमें बतलाते हैं। जैसा कि संत पेत्रुस कहते हैं - ‘‘प्रभु हम किसके पास जायें! आपके की शब्दों में अनन्त जीवन का संदेष है।’’ योहन 6, 68। प्रभु कहते हैं यदि हम स्वर्ग में प्रवेष पाना चाहते हैं तो हमें न केवल अपने भाई-बहनों की हत्या करने से बचना चाहिए परन्तु उनसे बैर घृणा एवं क्रोध करने से भी बचना चाहिए। किसी की हत्या करना जितना गंभीर पाप है, उतना ही गंभीर होता है उनसे क्रोध करना। प्रभु कहते हैं जो सजा हत्यारे को दी जानी चाहिए वही क्रोधी व्यक्ति को भी मिलनी चाहिए। प्रभु हमें अपने भाई बहनों के प्रति प्रेम, क्षमा व एकता बनाये रखने को कहते हैं। जब हम प्रभु की वेदी के पास आते हैं तो अपने भाई-बहनों से किसी प्रकार की कोई षिकायत हमारे अंदर नहीं होनी चाहिए। प्रभु के सम्मुख हमें शुद्ध हृदय लेकर आना चाहिए। मलीन हृदय के साथ चढाई गई भेंट प्रभु को प्रिय नहीं। याद रहे प्रभु ने काईन की भेंट के साथ क्या किया था। जो पाप बाहरी रूप से दिखता है उससे अधिक गंभीर हमारे अंदर के पाप होते हैं। हमारे बूरे विचार हमारे बूरे कर्मों से ज्यादा घातक होते हैं। बूरे कर्म तो बूरे विचारों का प्रकट रूप मात्र है। यदि हम हमारे बूरे विचारों के ऊपर नियंत्रण रख लेते हैं तो हमारे कर्म स्वतः ही अच्छे हो जायेंगे। इसलिए प्रभु कहते हैं कि यदि तुम किसी स्त्री को बुरी निगाह से देखते हो तो तुमने अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर लिया है। प्रभु कहते हैं ऐसी सभी चिजें जो हमें पाप की और खींच ले जाती है, हमें उन्हें त्याग देना, उनके होते हुए नरक में जाने से बेहतर है। आज प्रभु के वचनों को यदि हम हमारे आज की दुनिया से जोडकर देखें तो प्रभु हमसे यही कहेंगे - यदि तुम्हारा मोबाइल तुम्हारे लिए पाप का कारण बनता है तो उसे अपने से दूर रखो, यदि तुम्हारा कम्प्युटर तुम्हें पाप कराता है तो उसे त्याग दो। यदि तुम्हारे दोस्त तुम्हें पाप कराते हैं, तो उन्हें छोड दो। इन सब के साथ नरक में जाने से बेहतर है हम इनके बिना स्वर्ग में जायें।
आज हम पवित्र बालकपन का पर्व मना रहे हैं। आजकल के बच्चों को सही षिक्षा देना हर माता-पिता, षिक्षक-षिक्षिकाओं एवं सब जिम्मेदार लोगों का फर्ज है। उन्हें क्या सही है क्या गलत, कौन सी बातें व कौन सी चिजें उनके लिए लाभदायक हैं और किन चिजों से उन्हें दूर रहना चाहिए ये सब हम ही उन्हें बता सकते हैं। यदि आज हम बच्चों की नींव पवित्रता के ऊपर रखेंगे तो कल हमें एक ऐसा भविष्य मिलेगा जो ईष्वर के राज्य के मुल्यों पर आधारित होगा। जहाँ शैतान के कार्यों का दमन होगा और हमारी संतानें इस दुनिया में प्रभु के नाम व उसके सुसमाचार की एक मिसाल बनकर इस जग में उसके नाम की महिमा को प्रदर्षित करेंगी। आमेन।


Saturday, 4 February 2017

सामान्य काल का 5वां रविवार, 5 फरवरी, 2017

इसायाह 5,7-10
1 कोरिंथियो 2, 1-5
मत्ती 5,13-16
क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है कि मैं ईसाई क्यों हूँ? क्या सिर्फ इसलिए कि मैं एक ईसाई परिवार में पैदा हुआ/हुई? क्या यह एक संयोग मात्र है? प्रभु येसु के अनुयायी बनना कोई संयोग नहीं, एक बुलावा है। कई बार जो लोग ईसाई धर्म अपनाते हैं वे यह घोषणा करते हैं कि मैं बिना किसी दबाव के, अपनी पूरी मर्ज़ी व स्वेच्छा से इस धर्म को अपना रहा हूँ। कानूनी तौर पर यह कहना उचित है। परन्तु यह घोषणा वास्तविकता से काफी दूर होती है। कोई भी अपनी मर्ज़ी से ईसा का अनुयायी नहीं बन सकता। प्रभु हमें बुलाता है, हमें वो ही चुनता है। संत योहन 15, 16 में प्रभु कहते हैं - ‘‘तुमने मुझे नहीं चुना, बल्कि मैं ने तुम्हें चुना और नियुक्त किया है, कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो।’’ और योहन 6,44 में प्रभु कहते हें - ‘‘कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा, उसे आकर्षित नहीं करता।’’ हमारा ख्रीस्तीय होने का बुलावा कोई आज या कल की बात नहीं है। वचन कहता है रोमियो 8,30 में - ‘‘उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है।’’ हमारा बुलावा पहले से ही निश्चित किया गया है। हाँ उसने हमें संसार की सृष्टि से पहले से ही चुन लिया है - एफेसियों 1, 4.
इन सब से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि मेरा ईसाई होना कोई संयोग अथवा कोई इत्तफाक नहीं है। मैं सदियों पहली बनाई एक योजना के मुताबिक चुना गया हूँ। मुझे ईश्वर ने अपना अनुयायी चुन कर अलग कर लिया है। सारे ब्रह्माण्ड को बनाने व उसे चलाने वाले ईशवर ने मुझे इस जीवन के लिए चुना है। पूरे विश्व का मास्टर प्लान बनाने वाले इश्वर ने यदि मुझे चुना है तो इसके पीछे कोई न कोई उद्देष्य रहा होगा। उसने युँ ही मुझे नहीं चुना होगा! इन दिनों देश के कई राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। लोग अपना प्रतिनिधी चुनेंगे। अपने प्रतिनिधी का चुनाव करते समय लोगों के मन में कोई मकसद होता है, कई उम्मिदें रहती हैं, कई अभिलाषायें रहती हैं। जब प्रभु ने हमें अपना बनने के लिए चुना तो हमको लेकर उनके हृदय में भी कई उम्मिदें थीं, किसी विषेश मकसद को लेकर हमें चुना गया था। पर इस दुनिया की भीड में, दुनिया के मेले में, दुनिया की चकाचौंध में, दुनिया के आकर्षण में  हम उस मकसद को हमारी नज़रों से दूर कर देते हैं। आज प्रभु हमारे प्रति जो उम्मीद व आशा करते हैं उसे फिर से हमारे सामने रखते हैं। आज वे हमें याद दिलाते हैं कि उसने हमें क्यों बुलाया है, क्यों चुना है इस दुनिया की भीड मेंसे। आज प्रभु हमसे कहते हैं - ‘‘तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फ़ीका पड जाये तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फैंका और पैरों तले रौदा जाता है। ?’’ यदि हमारे ख्रीस्तीय जीवन में ख्रिस्तीयता नहीं है, हमारे जीवन में ईसाईयत का नमक नही तो हम बेकार हैं। यदि हमें देखकर, औरों को ये न लगे कि हम येसु के अनुयायी हैं। तो फिर हमारा ईसाई होना व्यर्थ है। प्रभु कहते हैं तुम संसार की ज्योति हो। तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कार्यों को देखकर तुम्हारे स्वर्गीक पिता की महिमा करें। सुसमाचारीय सदगुण हमारे आचरण में, हमारी बोल-चाल में सदैव झलकना चाहिए। हम जहांँ कहीं भी रहें, जो कुछ भी करें, हमारा जीवन एक दीपक की तरह दमकते रहना चाहिए। हम जानते हैं कि यह संसार विभिन्न प्रकार की बुराईयों एवं पाप के अंधकार से भरा हुआ है। हम उस अंधकार के भागीदार न बनें। वचन कहता है - ‘‘भाईयों और बहनों आप तो अंधकार में नहीं है. . . आप सब ज्योति की संतान हैं’’ (1थेसलनिकियों 5, 4)।  यदि हम वास्तव में ज्योति की संतानें हैं यदि हमें प्रभु ने एक ज्योति बनाकर इस संसार में भेजा है, तो फिर हमारा आचरण वास्तव में एक जलते दीपक समान होना चाहिए। अंधकार में कहीं पर भी यदि एक दीपक जल रहा हो तो वह दिखेगा ज़रूर। यदि हम प्रभु के वचनों के मुताबिक जीवन जियेंगे तो लाखों की भीड में भी हमारी अलग पहचान होगी। प्रभु कहते हैं - ‘‘तुम एक दूसरे को प्यार करो। जिस प्रकार मैं ने तुम लोगों को प्यार किया। यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो’’ (योहन 13, 34)। कुछ साल पहले डिसाइपलशिप ट्रेनिंग करके एक वर्कशोप था उसमें भाग लेने का मौका मिला। उसमें हमें एक दिन इंदौर शहर में कहीं भी जाकर किसी न किसी ज़रूरतमंद व्यक्ति की मदद करके शाम को वापस जाकर अपने अनुभव सबों के साथ साझा करना था। एम वाई हॉस्पिटल के सामने एक बुजूर्ग व्यक्ति की मदद करते समय किसी ने हम से पूछा आप लोग ईसाई हो क्या? हमने कहा - हांँ, पर आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? तो उसने उत्तर दिया वे ही ऐसा काम कर सकते हैं। जि हाँ ख्रीास्त में प्यारे भाईयों और बहनों, यदि हम इस दुनिया में ज्योति बनकर जियेंगे तो हमारे कार्यों को देखकर ही लोग हमें पहलचान जायेंगे कि हम ख्रीस्त के अनुयायी हैं। हमें किसी को हमारा बपतिस्मा सर्टिफिकेट दिखाने की ज़रूरत नहीं। हमारे कार्य हमारी और से गवाही देंगे। हर रविवार को मिस्सा में आना मात्र हमें ईसा के अनुयाई नहीं बनाता। उस मिस्सा बलिदान में जो होता है उसे हमारे रोज़ के कार्यों में परिणित करना, हमें वास्तविक ईसाई बनाता है। हर मिस्सा बलिदान में प्रभु येसु अपने आपको तोडकर हमें देते हुए कहते हैं - यह मेरा शरीर है, तुम सब इसे लो और खाओ। इसके द्वारा वे हमें सिखलाते हैं कि हमें भी औरों के लिए अपने शरीर को तोडना है। दूसरों की भलाई के लिए हमारी सुख सुविधावों मेंसे थोडा त्याग कर हमें दूसरों को देना चाहिए, जिस प्रकार से प्रभु अपना सर्वस्व हमारे लिए अर्पित करते हैं। आज के पाठ में प्रभु हमसे कहते हैं - ‘‘अपनी रोटी भूखों के साथ खाओ, बेघर दरिद्रों को अपने यहांँ ठहराओ। जो नंगा है, उसे कपडे पहनाओ और अपने भाई-बहनों से मुख मत मोडो। तब तुम्हारी ज्योति उषा की तरह फूट निकलेगी।’’ हम मेंसे कितने लोग हैं जो वास्तव में भूख लगने पर ही खाना खाते हैं। हमें समय-समय पर खाना मिल जाता है और शायद आवश्यक्ता से भी अधिक मिलता है। पर इस दुनिया में कई लोग हैं जिन्हें भूख लगने पर भी खाना नसीब नहीं होता। ऐसा ही कोई अभागा बच्चा किसी दिन  डॉक्टर के पास जाकर उनसे एक सवाल करता है जिसे सुनकर डॉक्टर की भी आंँखें भर आती है।  वह पुछता है - ’’ऐसी कोई दवाई है, डॉक्टर साहब, जिस से भूख ही न लगे।?’’ किस परिस्थिति व मज़बूरी में यह सवाल किया होगा उसने वही जानता है। भूख की ज्वाला भयानक होती है। आज के पहले पाठ में प्रभु हमें हमारे पास जो कुछ है उसे जिनके पास वास्तव में नहीं है उनके साथ बांँटने का आह्वान कर रहे हैं। क्योंकि देने में जो सुख है वह अपने पास जमा करके रखने में कभी नहीं मिलता, उससे तो बेचैनी और अशांँति ही बढती है। यहांँ देने से मतलब सिर्फ रूपये पैसे दान करने से नहीं है, पर जो कुछ भी हमारे पास है - हमारा समय, हमारा धन, हमारी प्रतिभा, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमताऐं, हमारा प्यार, हमारे संसाधन, हमारी गाडी, और हमारा भोजन, और सबसे उत्तम हमारा जीवन। ये सब हम दूसरों के साथ बांटना सिखें। तब हम गर्व के साथ कह सकेंगें कि हम प्रभु येसु के शिष्य हैं। हम उनके दिखाए मार्ग पर चलते हैं। तब हमारी उपस्थिति से ये अंधकारमय संसार जगमगा उठेगा और हम ख्रीास्त की ज्योति के राजदूत बनकर शैतान के अंधकारमय कार्यों को समाप्त कर देंगे। आमेन।  

Saturday, 28 January 2017

वर्ष का चौथा इतवार



सफन्या 2,3-3,12-13
1 कुरिंथ 1, 26-31
मत्ती 5, 1-12


इस दुनिया में हर कोई खुशी और शांति चाहता है। शांति और ख़ुशी की जुगाड में इंसान क्या-क्या नहीं करता। पढाई-लिखाई, मेहनत-मज़दूरी, नौकरी-पैशा अथवा मंदिर, मस्ज़िद और गिरजाघरों के चक्कर भी हम मन मी शांति और खुशी के लिए ही तो लगाते हैं। आजकल टी. वी. चैनलों पर तो ऐसे कई तरीकों एवं मंत्रों का प्रचार-प्रसार होता है जो क्षण भर में हमारे जीवन को बदलने एवं हमारे भाग्य को पलटने का दावा करते हैं। इंसान को धनी बनाने, नौकरी दिलाने व करोबार में सफलता दिलाकर रूपये-पैसे एवं शौहरत दिलाने के खोखले वादे करके लोगों को मोहित करने का बाज़ार आजकल बहुत ही गर्म है। कई लोग इन अंधे विज्ञापनों के जाल में फंसकर अपने जीवन में सफलता और शौहरत की तलाश करते हैं। कई लोग रातों-रातों अमीर बनने के ख्वाब देखकर, तो कई अपने आपको ऊंचाईयों पर पहुँचाने के सपने संजोकर अपना जीवन धन्य बनाने का प्रयास करते हैं। दुनिया की निगाहों में तो वे लोग धन्य व आशिषित कहे जा सकते हैं जिनके पास रूपये-पैसे, धन-दौलत, शानो-शौहरत एवं एक आरामदायक ज़िंदगी जीने के सारे साधन उपलब्ध हैं। परन्तु प्रभु का नज़रिया दुनिया के नज़रिये से भिन्न है। प्रभु की नज़रों में वह व्यक्ति धन्य है जो अपने को दीन-हीन समझता है, जो गरीब है, जो आभावों में जीता है। उसका धन, उसकी दौलत और शौहरत सब कुछ प्रभु ही है। प्रभु की निगाहों में वह व्यक्ति धन्य नहीं है जो खुद को इस समाज में अथवा इस संसार में बहुत बडा मानता हो अथवा बडा बनने का प्रयास करता हो परन्तु वह व्यक्ति प्रभु के लिए धन्य है जो विनम्र है, जो बडा होते हुए भी, बडे पद पर रहते हुए भी स्वयं को सबों का सेवक एवं सबसे छोटा मानता है।
यदि किसी के घर में, परिवार में कोई अनहोनी हो जाती है, किसी की मृत्यु हो जाती है, या फिर कोई घोर विपत्ति हमें घेर लेती है और हम हमारे दुःखों पर शोक मनाते हैं तो दुनिया कहती है - इनका भाग्य खराब है, दुर्भाग्य का पहाड इन पर टूट पडा है अथवा पता नहीं अपने किस कर्म का फल ये भुगत रहे हैं आदि। पर प्रभु कहते हैं धन्य हो तुम जो शोक करते हो, तुम्हें सान्तवना मिलेगी। हमारे दुखों में हमारा प्रभु हमारे साथ रहता है।
गौतम बुद्ध कहा करते थे इस संसार में दुःख का कारण तृष्णा है। आज की युवा पिढी में विभिन्न प्रकार की भूख एवं तृष्णा है धन-दौलत की भूख, विलासितापूर्ण जीवन की भूख, अच्छे घर, अच्छे मकान की भूख, सुख-सुविधाओं की भूख, लेटेस्ट मोबाइल एवं अन्य इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स पाने की भूख, पार्टी जाने व मौज मस्ती करने की भूख, प्यार करने व प्यार पाने की भूख। एक तृष्णा मिटती है तो दूसरी पैदा होती है। एक ज़रूरत पूरी होती है दो उसके बदल दस ज़रूरतें और खडी हो जाती है। हमारा खालीपन, जीवन का अधूरापन कभी खत्म नहीं होता। हमारे जीवन के अधूरेपन को सिर्फ प्रभु ही पूरा कर सकते हैं। हमें परिपूर्ण तृप्ति प्रभु ही दे सकते हैं। पर हम उनके लिए तरसते ही नहीं। आज की पीढी में प्रभु के लिए, और धार्मिकता के लिए भूख एवं रूची की कम होती जा रही है। प्रभु कहते हैं जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं वे तृप्त किये जायेंगे। संत मत्ती 6, 33 में प्रभु हमसे कहते हैं - तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजे़ं तुम्हें यों ही मिल जायेंगी। हम हमारे मन की शांति और दिल की तसल्ली की तलाश गलत जगहों पर करते हैं इसलिए तृप्ती नहीं मिलती। छोटों से लेकर बडों तक सब जीवन में असंतुष्ट रहते हैं। क्योंकि हम दुनियाई चीज़ों में तसल्ली ढुंढते हैं। हम अनष्वर खज़ाने को छोडकर नष्ट हो जाने वाले खज़ाने में अपना मन लगाते हैं और उसे पाने की कोशिश करते रहते हैं। इस जीवन में सच्चा सुख सिर्फ प्रभु से ही हमें मिल सकता है।
इस दुनिया में कई लोग ऐसे हैं जो किसी की चुगली करके दूसरों के सामने किसी का नाम खराब करते हैं। जलन एवं ईर्ष्या के कारण तथा अपनी स्वार्थ सिद्धी हेतु दो पक्षों में मतभेद, मनमुटाव अथवा झगडा करा देते हैं। ऐसे चापलूस जो खुद को अच्छा दिखाने के चक्कर में दूसरों के रिष्तों में दरार पैदा करते हैं वे प्रभु की संतान नहीं हो सकते। प्रभु की संतान तो वे लोग हैं जो टूटे रिष्तों को जोडने की बात करते हैं, जो मेल मिलाप कराते हैं। प्रभु कहते हैं - ‘‘धन्य है वे जो मेल-मिलाप कराते हैं वे ईशवर के पुत्र-पुत्रियां कहलायेंगे।
कलीसिया पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। कलीसिया के प्रारम्भ से ही प्रभु के भक्तों के ऊपर घोर अत्याचार किया जाता रहा है। स्वयं प्रभु येसु ने घोर अत्याचार सहा एवं सूली पर कुर्बानी दी। उनके बाद उनके शिष्यों ने भी प्रभु के नाम पर आये हर दुःख विपत्ति को खुशी-खुशी झेला और शहादत प्राप्त की। कुछ दिनों पहले सोशयल मिडिया पर एक मेसेज सरक्युलेट हो रहा था जिसमें एक वेबसाइट की लिंक थी, जिस पर जाकर उन इसाईयों को साईन करना था जो सुप्रिम कोर्ट से ईसाई मिशनरियों पर हाथ उठाने वालों को सश्रम कारावास का कानून दिलाने की मांग करते हों। दो हज़ार से भी अधिक ईसाई यह पेटिशन साईन कर चुके हैं। मैं बाइबल का कोई ज्ञाता तो नहीं हूँ पर मेरे सीमित ज्ञान से यह तो कह सकता हूँ कि पवित्र बाइबल में ऐसा करना तो कहीं नहीं सिखाया गया है। प्रभु का वचन कहता है - ‘‘अपने आप को बुद्धिमान न समझें। बुराई के बदले बुराई नहीं करें। दुनिया की दृष्टि में अच्छा आचरण करने का ध्यान रखें। जहांँ तक हो सके अपनी ओर से सबों के साथ मेल-मिलाप बनाये रखें। प्रिय भाईयों आप स्वयं बदला न चुकायें बल्कि उसे ईशवर के प्रकोप पर छोड दें, क्योंकि लिखा है प्रतिषोध मेरा अधिकार है, मैं ही बदला चुकाऊंगा’’ (रोम12, 16-19)। इसलिए धार्मिकता के कारण अत्याचार सहना हमारा दुर्भाग्य नहीं, ये तो हमारा सौभाग्य है। प्रभु कहते हैं - धन्य है वे जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं स्वर्ग राज्य उन्हीं का है। धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर झूठे दोष लगाते हैं। खुश हो और आनन्द मनाओ स्वर्ग में तुम्हें महान पुरूस्कार प्राप्त होगा।
आईये ख्रीस्त में प्यारे भाईयों और बहनों हम इस दुनिया के निमित नहीं पर प्रभु के वचनों के अनुसार अपना जीवन जियें। हम दीन-हीन बनें, विनम्र तथा दयालु बनें, मन के निर्मल एवं पवित्र बनें, अपने भाई-बहनों के बीच मेल-मिलाप एवं भाईचारे की एक कडी बनकर लोगों को प्रेम के सूत्र में बांधने की कोशीश करें। और हमेशा प्रभु की व उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहें। तथा प्रभु के नाम पर आने वाले हर कष्ट-पीडा को धैर्य एवं हिम्मत के साथ ख़ुशी-खुशी स्वीकार करें क्योंकि स्वर्ग में हमारे लिए एक महान पुरस्कार हमारा इंतज़ार कर रहा है। आमेन।


Saturday, 21 January 2017

वर्ष का तीसरा रविवार, 22 जन 2017



इसायाह 8,23.9,३
1 कुरिन्थियों 1, 10-13.17
मत्ती 4,12-23
आज के पहले पाठ में हम नबी इसायस को यह भविष्यवाणी करते सुनते हैं - अंधकार में भटकने वाले लोगों ने एक महत्ती ज्योति देखी है, अंधकारमय प्रदेष में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है। (इसायाह 9,1)। यह ज्योति क्या है? ऐसा कौन सा प्रकाष है जिसके बारे में नबी कह रहे हैं? क्या यह चंद्रमा की रोषनी है या फिर सूरज का तेज प्रकाष? हरगिज नहीं। नबी जिस रोषनी की बात कर रहे हैं वह हज़ारों सूरज की रोषनी से भी तेज है। यह एक ऐसा तेज है जिसके सामने किसी भी प्रकार का अंधकार टिक नहीं सकता है।
उत्पत्ति ग्रंथ 1,1-3 में हम पढते हैं कि प्रारम्भ में पृथ्वी उजाड और सुनसान थी। अथाह गर्त पर अंधकार छाया हुआ था और ईष्वर का आत्मा सागर पर विचरता था। ईष्वर ने कहा प्रकाष हो जाये, और प्रकाष हो गया। प्रकाष ईष्वर की पहली सृष्टि है। प्रभु ने सबसे पहले प्रकाष बनाया। पेड-पौधे और जीव-जन्तु बनाने से पहले ईष्वर ने प्रकाष बनाया क्योंकि यह हर प्रकार के जीवन के लिए एक अति आवष्यक घटक है। पूर्ण अंधकार में जीवन संभव नहीं।
विभिन्न धर्मों में प्रकाष को ईष्वर की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है। पवित्र बाइबल में ईष्वर ने कभी प्रकाष के स्तम्भ के रूप में, कभी जलती झाडी में इस्राएलियों को दर्षन दिये। तथा प्रभु येसु के आगमन के बारे में बतलाते हुए संत मत्ती कहते हैं - अंधकार में रहने वालों ने एक महत्ती ज्योति देखी, मृत्यु के अंधकारमय प्रदेष, में रहने वालों पर ज्योति का उदय हुआ है। अंधकार! अंधकार और कुछ नहीं ज्योति का अथवा प्रकाष का आभाव है। प्रकाष और अंधकार एक साथ नहीं रह सकते। जहाँ प्रकाष है वहांँ अंँधेरा नहीं टिक सकता। प्रभु येसु ख्रीस्त ने कहा है - ‘‘ससार की ज्योति मैं हूँं। जो मेरा अनुसरण करता है, वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। उसे जीवन की ज्योति प्राप्त होगी’’ (संत योहन 8,12)। जहांँ प्रभु येसु है वहांँ अंँधकार की कोई शक्ति प्रबल नहीं हो सकती। यदि कोई कहता है प्रभु येसु मुझमें है, वो मेरे साथ है और वह पाप के अंँधकार में जीवन बिताता तो वह स्वयं को धोखा देता है। क्योंकि प्रभु येसु वह ज्योति है जिसके प्रकाष में हमें स्वर्ग का मार्ग साफ-साफ दिखाई देता है। जो प्रभु की ज्योति में चलता है पापमय अंधकार में नहीं चल सकता। प्रभु का वचन वह ज्योति है जो हमें सही मार्ग दिखाता हैं।  वचन कहता है - ‘‘तेरी षिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है’’ (स्तोत्र 119,105)। इसका मतलब यह हुआ कि प्रभु येसु की ज्योति के उजाले में जो जीता है उसे क्या भला क्या बूरा, क्या पाप और क्या धार्मिकता, यह सब साफ-साफ दिखाई देता है। वह न भटकता और न ही ठोकर खाता है। हम अपने आप को ईसाई कहते तो हैं परन्तु यदि हमारा आचरण अंधकारमय है, हमारे कर्म अंधकारमय है तो हम खोखले ईसाई हैं। ईसाई होते हुए भी हम यदि इस दुनिया में अंधकार में जीवन बिताते हैं, तो हमने मसीह को व उसकी षिक्षाओं को नहीं पहचाना। हम प्रभु की ज्योति से अब भी दूर हैं। संत योहन 1,9-12 में वचन हमसे कहता है - ‘‘शब्द वह सच्ची ज्योति था, जो प्रत्येक मनुष्य का अंधकार दूर करती है। वह संसार में आ रहा था। वह संसार में था, संसार उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, किंतु संसार ने उसे नहीं पहचाना। जितनों ने उसे अपनाया, और जो उसके नाम में विष्वास करते हैं उन सब को उसने ईष्वर की संतत्ति बनने का अधिकार दिया।’’ सारे संसार को सत्य का प्रकाष देने, सारी मानवता को मुक्ति की राह दिखाने के लिए संसार की ज्योति प्रभु येसु ख्रीस्त संसार में आ चुके हैं। उनकी ज्योति में चलकर अपनी जीवन नैया पार लगाना या फिर पापमय अंधकार में चलकर अपने जीवन को हमेषा के लिए नष्ट करना ये हमारे व्यक्तिगत चुनाव के ऊपर निर्भर करता है। प्रभु हमें पूर्ण स्वतंत्रता देते हैं वे अपनी राहें, अपनी षिक्षाएं हम थोपना नहीं चाहते पर फिर भी वे यही चाहते हैं कि हम हमारी स्वतंत्रता में जीवन का चयन करें। वचन कहता है - ‘‘मैं तुम्हारे सामने जीवन और मृत्यु, भलाई और बुराई रख रहा हूँ। तुम लोग जीवन को चुन लो, जिससे तुम और तुम्हारे वंषज जीवित रह सकें’’ (विधिविवरण 30,19)। ये चयन हमारे लिए, हमारे जीवन के लिए बहुत ही ज़रूरी है। आज के सुसमाचार में हमने सुना प्रभु येसु पेत्रुस और उनके भाई अंद्रेयस, जे़बेदी के पुत्र याकूब और योहन को अपना अनुसरण करने के लिए बुलाते हैं। वे मछुवारे थे और अपनी नाव, जाल व रिष्तेदारों के साथ समुद्र से मछली पकड रहे थे। उनके सामने दो विकल्प थे - अपनी जाल व नाव के साथ अपना मछुवारे का काम जारी रखना या फिर सब कुछ पीछे छोडकर प्रभु येसु का अनुसरण करना। उन्होंने संसार की ज्योति को चुना। हमारे जीवन में हमें पग-पग यह चयन करना है। यदि हमने एक बार येसु को चुना है उनकी षिक्षाओं को चुना है तो हमें जीवन के हर पढाव में उन्हें ही चुनते रहना है। हर एक बुराई, हर एक पाप की परिस्थिति हमारे सामने दो विकल्प खडे करती है। या तो हम बुराई को चुनें या फिर प्रभु के वचनों को, प्रभु की राहों। हम दोनों नहीं चुन सकते। प्रभु कहते हैं - ‘‘कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता या तो वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा या फिर एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा’’ (मत्ती 6,24)। मैं प्रभु की संतान और शैतान की संतान एक साथ नहीं हो सकता। मैं या तो प्रभु का हूँ या फिर शैतान का, मैं या तू प्रभु की राहों पर चलता हूँ या फिर शैतान की। मैं दोनों राहों पर एक साथ नहीं चल सकता। मैं जीवन के मार्ग पर चलता हूँ या फिर मौत के मार्ग पर, धार्मिकता के मार्ग पर या फिर अधार्मिकता मार्ग पर, मैं ज्योति में चलता हूँ या फिर अंधकार में। प्रकाष और अंधकार, पाप व पूण्य, प्रभु व शैतान ये दोनों ताकतें हर पग पर हमें प्रभावित करती हैं और हमें चुनौति देती है। जो कोई पेत्रुस और अंद्रेयस, योहन और याकूब की तरह जीवन के हर पडाव में येसु को चुनेंगे उनके बारे में वचन कहता है - ‘‘ऐसे लोगों पर द्वितीय मृत्यु का कोई अधिकार नहीं है। वे ईष्वर और मसीह के पुरोहित होंगे और उनके साथ . . . राज्य करेंगे’’ (प्रकाषना 20,6)।
आईये हम अंधकार को त्यागकर संसार की ज्योति प्रभु येसु को चुनें, पाप को छोडकर धार्मिकता को चुनें, अनन्त मृत्यु छोडकर अनन्त जीवन को चुनें। आमेन।















Saturday, 14 January 2017

वर्ष का दूसरा रविवार

इसायाह 49,3-6
1 कुरिन्थियों 1-3
योहन
1,29-34

आज के सुसमाचार हमने सुना, योहन बपतिस्ता प्रभु येसु को अपनी ओर आते देख कर उनकी ईशारा करते हुए कहते हैं - ‘‘देखिए यह है ईष्वर का मेमना जो संसार के पाप हर लेता है।’’ हमारा जीवन भी ऐसा ही होना चाहिए, हमें भी अन्य लोगों के सामने प्रभु येसु की ओर ईषारा कर के बताना चाहिए कि यही है ईष्वर का मेमना, यही है उद्धारकर्ता ईष्वर, यही है जो हम सब की नैया को भव पार लगा सकता है, यही है जो हमें पिता के दर्षन करा सकता है और यही है जो हमें स्वर्ग राज्य में ले जा सकता है। प्रभु येसु के सिवा और कोई मार्ग नहीं, प्रभु येसु के सिवा और कोई परिपूर्ण सत्य नही, और उनके बिना कहीं ओर परिपूर्ण जीवन नहीं। उन्होंने कहा है योहन 14ः6 में मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ, मुझसे होकर गये बिना कोई भी पिता के पास नहीं आ सकता। और योहन 10ः10 में वचन कहता है - चोर केवल चारी करने, मारने और नष्ट करने आता है परन्तु मैं इसलिए आया हूँ कि वे जीवन प्राप्त करे और उसे परिपूर्णता में प्राप्त करे।
आज के पहले पाठ में वचन हमसे कहता है कि तुम मेरे दास हो, और आगे वचन कहता है कि तुम्हारा दास बने रहना ही काफी नहीं है। मैं तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बनाऊंगा ताकि मेरी मुक्ति पृथ्वी के सीमांतों तक फैल जाये। हममें और अन्य लोगों में, ख््रास्तीयों में व गैरख््रास्तीयों में जमीन आसमान का फर्क है। हमारे ऊपर ईष्वर के बेटे-बेटियां होने की मुहर लगी हुई है। हम अंधकार से प्रकाष में लाये हुए लोग हैं। संसार सत्य को नहीं पहचानता परन्तु हम सत्य को पहचानते हैं। और वह सत्य है ईष्वर का मेमना प्रभु येसु ख््रास्त जो हमारे उद्धार के लिए बली चढाया गया है। हां इसी नाम से आज के सुसमाचार में संत योहन बपतिस्ता उन्हें पुकारते हैं  - देखिए यह है ईष्वर का मेमना जो संसार के पाप हर लेता है। कुछ दिनों पहले हमने प्रभु येसु के देहधारण अर्थात् ख््रास्त जयंति का पर्व मनाया और हमने यह मनन चिंतन किया की प्रभु येसु हमारे लिए मनुष्य बनकर इस संसार में आये। जब प्रभु येसु हमारे लिए मनुष्य बनकर आये तो फिर आज योहन उन्हें मेमना अर्थात् भेड अथवा बकरी का बच्चा कयों कह रहे हैं?
इस बात को समझने के लिए हमें पुराने विधान एवं यहुदी जाती की मुक्ति इतिहास की गहराई में जाना होगा। जब ईष्वर ने अपनी चुनी हुई प्रजा को मिस्र की गुलामी से आज़ाद करने का निष्चय किया तब उन्होंने हर एक इस्राएली परिवार को अपने-अपने घरों में एक मेेमने का वध करने और उसका रक्त अपने दरवाजों की चौखट पर पोतने का आदेष दिया। क्योंकि उस रात प्रभु का दूत मिस्र का भ्रमण कर मिस्र के सारे पहलोटों को मारने वाला था। प्रभु के दूत ने जिन-जिन घरों की चौखट पर मेमने का रक्त देखा उनको छोड बाकी सबके घरों के पहले बेटों को मार दिया। और इस प्रकार फिराऊ राजा घबराकर उन्हें मिस्र से जाने का आदेष दे देता है। इस प्रकार उनकी धारणा थी कि मेमने के रक्त के द्वारा ईष्वर ने उनका उद्धार किया है।
इस्राएली कैलेंडर के मुताबिक सातवें महिने के दसवें दिन इस्राइली लोग योम किपुर नामक पर्व मनाते हैं। इस दिन वे उपवास एवं प्रार्थना करते हुए अपने पापों के लिए प्रायष्चित करते हैं। इस पर्व के बारे में हम लेवी ग्रंथ 16 में पढते हैं कि इस प्रायष्चित विधी में पुरोहित दो मेेमनों को लेकर आता है। उनमें से एक मेमना जनता के पापों के प्रायष्चित के लिए बली चढाया जाता है, और उसका रक्त लोगों पर छिड़का जाता था तथा दूसरे मेमने के ऊपर इस्राएलियों के सारे कुकर्मों और सब प्रकार के अपराधों को स्वीकार कर, उन्हें उसके सिर पर डाल कर उसे रेगिस्तान में पहुंचा दिया जाता है। उनका मानना था कि वह मेमना उनके पापों को लेकर ऐसे स्थान पर चला गया है जहां से वह वापस नहीं आ सकता अर्थात् वे अपने पापों से पूर्ण रूप से मुक्त हो गए हैं।
परन्तु इब्रानियों के पत्र 10ः4-5 में वचन साफ-साफ कहता है - ‘‘सांडों तथा बकरों का रक्त पाप नहीं हर सकता, इसलिए मसीह ने संसार में आकर यह कहा- ‘‘तूने न तो यज्ञ चाहा और न चढावा, बल्कि तूने मेरे लिए एक शरीर तैयार किया है। . . . ईसा मसीह के शरीर के एक ही बार बलि चढाए जाने के कारण हम ईष्वर की ईच्छा के अनुसार पवित्र किये गये हैं।’’ और इब्रानियों 9ः12 में हम पढते हैं - उन्होंने बकरों तथा बछडों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परपावन स्थान में प्रवेष किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है।’’
यह है प्रभु येसु को ईष्वर का मेमना कहे जाने का अर्थ। पुराने विधान के मेमनों का रक्त पाप हरने में असमर्थ था परन्तु प्रभु येसु का अति मुल्यवान रक्त हमारे हर गुनाह के दाग को धोने समर्थ है। प्रभु येसु इसिलिए नये विधान का मेमना बनकर बलि चढे ताकि उनके सामार्थ्यवान लहू से हमारा उद्धार हो जाये। मिस्सा बलिदान और कुछ नहीं उसी बलित मेेमने के बलिदान का स्मरण है। वही मेमना नित्य हमारे लिए अपने आपको अर्पित करता है। प्याले में अर्पित दाख का रस उसी मेमने के रक्त में तब्दिल हो जाता है और वह रोटी उसके शरीर में। जो कोई सच्चे मन व पूर्ण तैयारी के साथ मेमने के इस भोज में भाग लेता है, और प्रभु के शरीर एवं रक्त का पान करता है वह उस मुक्ति में भागीदार होता है जिसे प्रभु येसु ने हमें प्रदान किया है।
संत योहन के प्रकाषना ग्रंथ 7ः14 में यह साफ लिखा हुआ है, कि अंतिम महासंकट से अर्थात् नरक में विनाष से केवल वे ही बच सकते हैं, जिन्होंने अपने वस्त्र मेमने के रक्त से धोकर उज्वल कर लिये हैं। इसलिए आईये हम आज जब पुनः एक बार मेमने के भोज में भाग लेने आये हैं, उसके पवित्र लहू में अपने आप को भिगो लें। मुक्ति का लहू, दुनिया का सबसे शक्तिषाली डिटर्जेंट जो पाप के गहरे से गहरे दाग को भी मिटा देता है, आज हमारे लिए बहाया जा रहा है। हम उस लहू से धोकर अपने वस्त्रों को उज्वल कर लें।
आमेन।